बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 20 साल पहले रैली में एक बात कही थी. उन्होंने कहा था कि मतदान के समय कई लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब होने की शिकायतें सामने आती हैं. उनका कहना था कि किसी को भी वोट देने के अधिकार से वंचित करना लोकतंत्र को कमजोर करता है.
आडवाणी ने जिस वक्त ये बात कही थी, तब वो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गृह मंत्री होने के साथ-साथ डिप्टी पीएम भी थे. उन्होंने ये बात 2004 के लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की एक रैली में कही थी.
उन्होंने ये बात ऐसे समय कही थी, जब जनवरी 2004 में ही राष्ट्रपति ने नागरिकता संशोधन कानून 2003 को मंजूरी दी थी. आडवाणी ने तब ये भी कहा था कि सभी नागरिकों के लिए एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स) होना चाहिए.
1955 में आया नागरिकता कानून पहली बार 1985 में असम अकॉर्ड के कारण संशोधित किया गया था. लेकिन 2003 का संशोधन इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसी संशोधन ने मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून की नींव रखी थी.
अब जब 2019 का नागरिकता संशोधन कानून देशभर में लागू हो गया है, तो 2003 के संशोधन पर भी नजर डालना जरूरी हो जाता है.
जब आया NRC का कॉन्सेप्ट
2003 का संशोधन पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों, खासकर कि धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत में शरण लेने वालों के लिए बड़ा बदलाव था.
2003 के संशोधन ने एक तरह से एनआरसी का कॉन्सेप्ट भी रख दिया था. इस संशोधन ने ही देश के सभी नागरिकों को नेशनल आईडी कार्ड जारी करना जरूरी कर दिया था.
स्कॉलर अनुपमा रॉय का मानना है कि 2003 के संशोधन ने ही 2019 के संशोधन और एनआरसी का रास्ता साफ किया था.
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गहलोत ने की थी संशोधन की मांग!
राजस्थान सरकार की ओर से अनुरोध के बाद ही 2003 में तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने नागरिकता संशोधन बिल संसद में पेश किया था. उस वक्त राजस्थान में कांग्रेस की सरकार थी और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे.
2003 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुए एक हलफनामे से पता चलता है कि अशोक गहलोत की ओर से बार-बार इसे लेकर अनुरोध किया गया था. गहलोत दिसंबर 2003 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे थे.
गृह मंत्रालय की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया था कि पाकिस्तान से आए अल्पसंख्यक समुदाय के शरणार्थी या विस्थापित लोगों से चर्चा करने के बाद वैधानिक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया था. उन्होंने पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को वीजा और नागरिकता हासिल करने में आने वाली परेशानियों को हल करने के लिए एसडीएम को कुछ अधिकार देने का अनुरोध किया था.
गृह मंत्रालय को लिखी चिट्ठियों में गहलोत ने अनुसूचित जाति से जुड़े हिंदू शरणार्थियों के सामने वाली कठिनाइयों का जिक्र किया था. उन्होंने राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर और जोधपुर जैसे सीमाई जिलों में रहने वाले पाकिस्तानी प्रवासियों की समस्याओं को जल्द से जल्द हल करने की वकालत की थी. 1965 और 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान से बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आए थे.
1971 का युद्ध पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में लड़ा गया था, लेकिन तब भी वहां से आने वाले शरणार्थी बड़ी संख्या में गुजरात के कच्छ और पंजाब के लोंगेवाला में बस गए थे.
इसके बाद केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन का बिल पेश किया. इस बिल के कानून के बाद राजस्थान और गुजरात के कुछ सीमावर्ती जिलों में डीएम को पाकिस्तानी प्रवासियों को लंबी अवधि के लिए वीजा जारी करने और नागरिकता देने का अधिकार दे दिया था.
क्या था 2003 का संशोधन?
भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के वक्त से ही चले आ रहे तनाव के कारण वाजपेयी सरकार ने इस संशोधन को जरूरी माना था.
संशोधन के जरिए डीएम को लॉन्ग टर्म वीजा और नागरिकता देने का अधिकार देने का मकसद, लोगों को अनिश्चितता और कानूनी उलझन से राहत देना था. शुरुआत में सिर्फ 2004 तक ही डीएम को ये अधिकार दिया गया. लेकिन बाद में 2006 तक इसे दो बार बढ़ाया गया.
धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न से बचकर पाकिस्तान से आए बड़ी संख्या में शरणार्थियों ने भारत के राजस्थान और गुजरात में शरण मांगी थी. माना जाता है कि 2003 के संशोधन ने ही पाकिस्तान और बाकी मुल्कों से आने वाले प्रवासियों या शरणार्थियों को ज्यादा राहत देने की शुरुआत की थी.
क्या है CAA?
नागरिकता संशोधन बिल पहली बार 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था. यहां से तो ये पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा में अटक गया. बाद में इसे संसदीय समिति के पास भेजा गया. और फिर चुनाव आ गए.
दोबारा चुनाव के बाद नई सरकार बनी, इसलिए दिसंबर 2019 में इसे लोकसभा में फिर पेश किया गया. इस बार ये बिल लोकसभा और राज्यसभा, दोनों जगह से पास हो गया. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 10 जनवरी 2020 से ये कानून बन गया था.
नागरिकता संशोधन कानून के जरिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी धर्म से जुड़े शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जाएगा. कानून के मुताबिक, जो लोग 31 दिसंबर 2014 से पहले आकर भारत में बस गए थे, उन्हें ही नागरिकता दी जाएगी.