दुबई में यूनाइटेड नेशन्स की बैठक COP28 में बेकाबू मौसम पर बहस चल रही है. डर जताया जा रहा है कि यही हाल रहा तो क्लाइमेट चेंज ही कयामत की वजह बनेगा. इस बीच कई कंस्पिरेसी थ्योरीज भी चल रही हैं. कई देश और मौसम एक्सपर्ट आरोप लगाते रहे कि जंगलों में आग, या दूसरी तबाहियां कुदरती नहीं, बल्कि मैन-मेड हैं ताकि लोगों में डर बैठ जाए. खासकर 15-मिनट-सिटी के बारे में कहा जा रहा है कि इस तरीके से लोग अनजाने में ही बंदी की तरह रहने लगेंगे.
कैसे काम करता है ये कंसेप्ट
इसमें किसी शहर को इस तरह बसाया जाएगा कि उसे पैदल या ज्यादा से ज्यादा साइकिल से ही पूरा नापा जा सके. यहां जरूरत की हर चीज होगी, जैसे स्कूल, अस्पताल, पार्क और दफ्तर. पार्किंग लॉट हटाकर उनकी जगह ये स्ट्रक्चर खड़े किए जा सकते हैं. साथ ही बिल्डिंगों को मल्टी यूटिलिटी बनाने की योजना है. मसलन वीकेंड पर अलग काम के लिए उसी बिल्डिंग का इस्तेमाल हो सके, जो हफ्ते भर दफ्तर या किसी और काम के लिए इस्तेमाल होती है.
क्या है इसका फायदा
15 मिनट सिटी की सबसे पहले बात साल 2015 में हुई थी. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि पॉल्यूशन कम होगा. बच्चे-बड़े सबको कम से कम दूरी पर अपनी मंजिल मिल जाएगी, इससे प्राइवेट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर बोझ कम होगा. ट्रैफिक रूल कम टूटेंगे और सड़क हादसे भी घटेंगे. एक फायदा ये भी गिनाया गया कि लोग पास-पड़ोस से मिलेंगे-घुलेंगे. इससे आपसी रिश्ते मजबूत होंगे, जबकि अभी लोग अपने पड़ोसियों को कम जानते हैं.
तब समस्या कहां है?
पर्यावरणविद इसके फायदे गिना रहे हैं, लेकिन हो उल्टा रहा है. लोग कह रहे हैं कि ये सब उन्हें एक एरिया में लॉक करने की साजिश है. मेयर या सरकारें फ्लैट नंबर के आधार पर तय कर देंगी कि आप कहां नहीं जा सकते, या आपके एरिया में कौन नहीं आ सकता. सोशल मीडिया पर तरह-तरह के हैशटैग चल रहे हैं, जिसमें कोई इसे यूनाइटेड नेशन्स तो कोई वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम का एजेंडा कहते हुए आरोप लगा रहा है.
ये भी कहा जा रहा है कि सरकार अगर चाहेगी तो किसी खास जगह को पूरा का पूरा खाली करा वहां के लोगों को कथित स्मार्ट सिटी में भेज देगी. लोगों के पास कहां रहना है, जैसी चॉइस भी नहीं रहेगी.
चीन में ऐसी जगह बसाई भी जा चुकी
अपनी अजीबोगरीब तरीकों और गोपनीयता के लिए कुख्यात चीन में ऐसा ही एक गांव है. पश्चिमी शंघाई स्थित शेंगयांग गांव इसी तर्ज पर बसा हुआ है. यहां करीब ढाई हजार लोग रहते हैं. यहां सबकुछ ज्यादा से ज्यादा 15 मिनट के फासले पर मिल जाता है. चीन इसे 15-मिनट-सिटी की बजाए हैप्पी कम्युनिटी कहता है. यहां लाइब्रेरी, रेस्त्रां और शॉपिंग मॉल तक हैं. चीन इस हैप्पी कम्युनिटी को रोल मॉडल की तरह रखता है, लेकिन दुनिया को इस बारे में इससे ज्यादा कुछ नहीं पता.
कई देश आजमाने की तरफ बढ़ रहे
अलग-अलग देशों की सरकारें इस तरफ काम शुरू कर चुकी हैं. अमेरिका के ओटावा राज्य में 15 मिनट नेबरहुट का प्रस्ताव आया हुआ है, तो ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न में 20 मिनट सिटी है. स्पेन के बार्सेलोना में इसे कार-फ्री सुपरब्लॉक कहा जा रहा है.
जंगलों की आग को भी माना जा रहा साजिश
कनाडा के साइकोलॉजिस्ट जॉर्डन पीटरसन ने इस बारे में लगातार आरोप लगाया कि ये ग्लोबल साजिश है, जिसे क्लाइमेट की आड़ में छिपाया जा रहा है. इसके जरिए लोगों को बड़े स्तर पर अलग-थलग कर दिया जाएगा. हालात यहां तक बनेंगे कि लोग आपस में ही लड़ने लगेंगे. बीते दिनों हवाई समेत कई जगहों पर जंगलों में भीषण आग लगी. इस बारे में भी माना गया कि हथियारों की मदद से आग भड़काई गई ताकि लोग जगह खाली करने पर मजबूर हो जाएं.
आरोप लगा कि केवल डायरेक्ट एनर्जी वेपन (DEW) से ही इस कदर तबाही मच सकती है. यहां बता दें कि आग से एक पूरा का पूरा शहर जल गया था और काफी कैजुएलिटी भी हुई थी.
क्या लैब-ग्रोन मीट के पीछे भी कोई कंस्पिरेसी है
कुछ समय पहले ब्लूमबर्ग में एक रिपोर्ट छपी थी, जिसमें कुछ लोगों के आरोप थे कि लैब में मीट क्लाइमेट को बचाने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को खत्म करने के लिए तैयार हो रहे हैं. यहां तक कि आरोप लगाया गया कि लैब-ग्रोन मीट में ऐसे केमिकल होते हैं, जो कैंसर पैदा करेंगे. इससे फार्मेसी कंपनियों को भी फायदा होगा.
इसके पीछे तर्क ये था कि सामान्य मीट सेल्स लगातार नहीं बढ़ती हैं, जबकि कैंसर सेल्स ही तेजी से बढ़ती हैं. तो क्लचर्ड मीट तैयार करने के लिए कैंसर-कॉजिंग कोशिकाएं जानबूझकर ली जा रही हैं. हालांकि साजिश का आरोप लगाने वालों की तरफ से कोई सबूत नहीं दिया गया.
मौसम को लेकर भी ऐसी थ्योरी
माना जा रहा है कि कई देश मौसम को कंट्रोल करके दूसरे देश पर हमला करने लगेंगे. ये वेदर वॉरफेयर है, जो कुदरती लगेगा, लेकिन होगा असल जंग से भी भयानक. सिर्फ बारिश ही नहीं, सूखा, भूकंप और सुनामी भी इसकी मदद से लाई जा सकेगी. कई देश अपने यहां आई आपदाओं का जिम्मा इसी तकनीक को दे चुके. इस बीच रिपोर्ट्स भी आ रही है कि मौसम के नियंत्रण पर तेजी से काम हो रहा है. लेकिन क्या वाकई इसपर कंट्रोल हो सका, ये कहना मुश्किल है.