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CJI की गणपति पूजा में PM मोदी, क्यों हो रही है आर्टिकल 50 की चर्चा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गणेश पूजा के मौके पर देश के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़ के घर पहुंचे तो सियासत में उबाल आ गया. बीजेपी और उसके समर्थक जहां इस मुद्दे को सामान्य मेल-मिलाप और शिष्टाचार बता रहे हैं वहीं विपक्ष का एक बड़ा तबका इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता को खतरा बता रहा है. सियासी बयानबाजियों और आरोप-प्रत्यारोप के इतर कानून के जानकारों के बीच चल रही बहस में आर्टिकल 50 की दुहाई दी जा रही है.

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आर्टिकल 50 सत्ता और अदालतों को अलग रखता है. (Photo- Reuters)
आर्टिकल 50 सत्ता और अदालतों को अलग रखता है. (Photo- Reuters)

देश में इस समय गणपति महोत्सव की धूम है. इस बीच बुधवार को पीएम नरेंद्र मोदी ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के घर पूजा समारोह में हिस्सा लिया, इसकी तस्वीरें और वीडियो वायरल है. लेकिन इसे लेकर बहस भी शुरू हो गई है और बार-बार आर्टिकल 50 की बात की जाने लगी. संविधान के इस अनुच्छेद में 'सेपरेशन ऑफ पावर' का जिक्र है. जानें क्या है ये, और क्यों ताजा मामले में इसका रेफरेंस दिया जा रहा है. 

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क्या कहना है जजों का

कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने इस भेंट को एक गलत मिसाल बताया क्योंकि उसके मुताबिक ये सत्ता के सेपरेशन और न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है. सीजेएआर जजों का एक ग्रुप है, जो जजों की जवाबदेही तय करने पर काम करता है.

ये ग्रुप कुछ पुराने उदाहरणों को उठाता है, जैसे साल 2019 में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने खुद के मामले की सुनवाई करते हुए नियमों की अनदेखी की. इसी साल की शुरुआत में कोलकाता हाई कोर्ट के जज अभिजीत गांगुली इस्तीफा देकर तुरंत एक राजनैतिक पार्टी में शामिल हो गए. रिटायरमेंट के बाद कई जज तुरंत बाद ही राज्यसभा के सदस्य हो गए. 

पीएम और चीफ जस्टिस की मुलाकात को लेकर सीजेएआर समेत विरोधी खेमा लगातार आर्टिकल 50 का हवाला दे रहा है. ये आर्टिकल कहता है कि देश अपने यहां की सार्वजनिक सेवाओं में कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग रखने के लिए कदम उठाएगा. यह धारा दोनों के बीच दूरी बनाए रखने पर जोर देती रही. 

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controversy around pm narendra modi visit to cji chandrachud what is article 50 photo PTI

कब शुरू हुई इसपर बात

ड्राफ्ट आर्टिकल 39- ए (अब आर्टिकल 50) पहले संविधान के मसौदे में शामिल नहीं था. नवंबर 1948 में इसे संविधान सभा में पेश किया गया और चर्चा हुई. इसके बाद तय हुआ कि तीन सालों के भीतर सार्वजनिक सेवाओं में कार्यपालिका और न्यायपालिका एकदम अलग हो जाएं. यहां बता दें कि ब्रिटिश पीरियड में देश के ज्यादातर हिस्सों में न्यायिक और कार्यकारी शाखाएं कनेक्टेड थीं. 

कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया की वेबसाइट कहती है कि संविधान सभा का एक सदस्य इसके खिलाफ था. उसे आशंका थी कि इससे न्यायपालिका को अनड्यू पावर मिल जाएगी. जवाब में दलील दी गई कि लोकतंत्र में न्यायिक आजादी भी उतनी ही अहम है. आखिरकार बहस खत्म हुई और संविधान सभा ने इस आर्टिकल को स्वीकार कर लिया. 

क्यों मानी गई दोनों में दूरी की जरूरत

- इसके जरिए सारी ताकत को एक जगह जमा होने से रोका जाता है. अगर न्यायिक और एग्जीक्यूटिव पावर एक ही हाथ में हों तो पक्षपात का डर बढ़ जाता है. 
- कार्यपालिका अगर मनमानी करे तो न्यायपालिका उसे टोक सकती है, इस तरह से निष्पक्षता बनी रहती है. 
- सत्ता और अदालतों के विकेंद्रीकरण के जरिए करप्शन पर लगाम कसी जा सकती है. 
- अदालतें किसी भी तरह के प्रेशर से हटकर स्वतंत्र फैसले दे सकती हैं. 

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अलग रखना अपने-आप में चुनौती

कई बार दोनों ताकतों के शीर्ष नेतृत्व आपस में भेंट-मुलाकात करते हैं, या सहज बातचीत करते दिखते हैं. ऐसे में ये तय करना मुश्किल हो सकता है कि दोनों का एक-दूसरे पर वाकई कोई असर नहीं. हालांकि अपने यहां की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट ने कई मिसालें कायम कीं, जहां उसने बड़ी शक्तियों के मामले में भी निष्पक्ष फैसले लिए. 

जब अदालत ने लिए ऐतिहासिक फैसले

इसमें भूतपूर्व पीएम इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण का जिक्र अक्सर होता है. ये सत्तर के दशक की बात है जब श्रीमती गांधी के राजनैतिक प्रतिद्वंदी राजनारायण ने रायबरेली से उनकी जीत पर सवाल उठाते हुए एक याचिका दायर की थी. उनका आरोप था कि श्रीमती गांधी ने कैंपेन के दौरान करप्शन का सहारा लिया था, सरकारी मशीनरी इस्तेमाल की थी, और उसी के जरिए जीतकर आईं. उन्होंने चुनाव निरस्त करने की मांग की. 

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मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा. जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा इसकी सुनवाई कर रहे थे. अदालत ने पाया कि जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत इंदिरा गांधी ने सरकारी संसाधनों का अपने लिए इस्तेमाल किया है. लिहाजा उन्हें 6 साल के लिए लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दे दिया. मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा लेकिन यहां भी न्यायपालिका अपने फैसले पर बनी रही. हालांकि बाद में तत्कालीन जज वीआर कृष्ण अय्यर ने हाई कोर्ट के फैसले पर आंशिक रोक लगा दी. इसके मुताबिक, भूतपूर्व पीएम संसद की कार्यवाही में हिस्सा तो ले सकती थीं, लेकिन वोट नहीं कर सकती थीं. ये बड़ा फैसला था, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है. 

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क्या कहती है सर्वोच्च अदालत

ज्यूडिशियरी और एग्जीक्यूटिव ताकतों को अलग रखने पर मई 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी बात की थी. फुल कोर्ट मीटिंग के दौरान तय हुआ था कि जजों को अपने पद की गरिमा बनाए रखते हुए कुछ हद तक अलग रहने की प्रैक्टिस करनी चाहिए. उन्हें पता होना चाहिए कि वे जनता की निगाहों में हैं और उनसे कोई ऐसी भूल या काम न हो, जो पद की गरिमा को चोट पहुंचाता हो.

हालांकि ये भी सही है कि प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश की कई बार मुलाकातें होती हैं और ये संविधान द्वारा उन्हें प्रदत्त अधिकारों और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए जरूरी होती हैं. मुख्य सतर्कता आयुक्त, सीबीआई प्रमुख जैसे कई शीर्ष पदों पर नियुक्तियां पीएम, सीजेआई और नेता प्रतिपक्ष मिलकर करते हैं, ऐसे में स्वाभाविक रूप से उन्हें सार्वजनिक कार्यक्रमों के इतर भी मिलना ही होता है.

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