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ये रिपोर्ट मान ली गई तो जीवनभर चुनाव नहीं लड़ पाएंगे कन्विक्टेड नेता... समझें- SC में क्या चल रहा

राजनीति में दागियों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट दी है. एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर किसी सांसद या विधायक को दोषी ठहराया जाता है तो फिर उसके आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगा देनी चाहिए.

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दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगाने की सिफारिश की गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
दोषी नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगाने की सिफारिश की गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

क्या किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में सजा मिलने पर उसके आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? फिलहाल तो ऐसा कानून नहीं है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से सिफारिश की गई है कि कुछ मामलों में दोषी करार दिए गए सांसद या विधायक के आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगा देनी चाहिए.

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दरअसल, सांसदों-विधायकों पर दर्ज आपराधिक मामलों से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है. एमिकस क्यूरी असल में किसी मामले को सुलझाने में अदालत की मदद करता है.

इस मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में 19वीं रिपोर्ट दाखिल की है. इसमें उन्होंने सिफारिश की है कि जनप्रतिनिधि कानून में बताए गए कुछ अपराधों में दोषी सांसदों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने पर विचार किया जाए, क्योंकि उन्हें आम लोगों की तुलना में ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है.

इस रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि 1951 के जनप्रतिनिधि कानून की धारा 8 में जो अपराध बताए गए हैं, अगर उनमें किसी सांसद या विधायक को दोषी ठहराया जाता है, तो उसके चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगा देनी चाहिए.

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ऐसा क्यों?

इस रिपोर्ट में एमिकस क्यूरी ने दलील देते हुए कहा है कि दोषी ठहराए जाने के बाद सांसद या विधायक के चुनाव लड़ने पर छह साल की रोक लगती है. छह साल बाद वो फिर से चुनावी राजनीति में आ सकता है. लिहाजा, ये संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन आपराधिक मामलों में जेल की सजा होती है, उनमें रिहाई के छह साल बाद तक अयोग्यता रहती है. इस तरह कोई व्यक्ति रिहाई के छह साल बाद फिर चुनाव लड़ सकता है. भले ही उसे दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध में ही दोषी क्यों न ठहराया गया हो.

इसमें दलील देते हुए कहा गया है कि जब कोई अधिकारी दोषी ठहराया जाता है तो उसे स्थायी रूप से अयोग्य कर दिया जाता है, लेकिन सांसद या विधायक को सीमित अवधि के लिए ही दोषी ठहराया जाता है.

अभी क्या है कानून?

1951 में जनप्रतिनिधि कानून आया था. इस कानून की धारा 8 में लिखा है कि अगर किसी सांसद या विधायक को आपराधिक मामले में दोषी ठहराया जाता है, तो रिहाई के बाद से लेकर अगले 6 साल तक वो चुनाव नहीं लड़ सकेगा. 

धारा 8(1) में उन अपराधों का जिक्र है जिसके तहत दोषी ठहराए जाने पर चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती है. इसके तहत, दो समुदायों के बीच घृणा बढ़ाना, भ्रष्टाचार, दुष्कर्म जैसे अपराधों में दोषी ठहराए जाने पर चुनाव नहीं लड़ सकते. 

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इस कानून की धारा 8(3) में लिखा है कि अगर किसी सांसद या विधायक को दो साल या उससे ज्यादा की सजा होती है तो तत्काल उसकी सदस्यता चली जाती है और अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर भी रोक लग जाती है.

इसे ऐसे समझिए कि अगर किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो साल की सजा होती है तो कुल मिलाकर उसके चुनाव लड़ने पर 8 साल तक रोक रहती है. 

याचिका में क्या है मांग?

बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इसमें उन्होंने दोषी ठहराए गए लोगों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से आजीवन वंचित करने की मांग की थी.

इसके साथ ही उपाध्याय ने जनप्रतिनिधि कानून की धारा 8 की वैधता को भी चुनौती दी थी. दलील दी गई थी कि केंद्र या राज्य सरकार के कर्मचारियों या अधिकारियों को दोषी ठहराया जाता है तो उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है. 

साल 2020 में केंद्र सरकार ने इस मामले में हलफनामा दायर कर कहा था कि सांसद-विधायक और आम नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं है. केंद्र ने ये भी कहा था कि 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 8 की वैधता को बरकरार रखा था.

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हर 10 में से 4 सांसदों पर क्रिमिनल केस 

जिस सदन में कानून बनते हैं और देश की दिशा तय होती है, अपराधी छवि के लोग वहां भी बैठे हैं. एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि दोनों सदनों में 40 फीसदी सांसद ऐसे हैं जिनपर आपराधिक मामले दर्ज हैं. 

लोकसभा के 543 में से 233 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. इनमें से 159 पर गंभीर मामले हैं. इसी तरह राज्यसभा के 233 में से 71 सांसदों पर आपराधिक मामले हैं और इनमें से ही 37 पर सीरियस क्रिमिनल केस है. 

आंकड़े ये भी बताते हैं कि राजनीति में अपराधीकरण रोकने का दावा करने के बावजूद लोकसभा में दागियों की संख्या बढ़ती जा रही है. 2009 के चुनाव में जहां लोकसभा में 162 दागी सांसद चुनकर आए थे, तो वहीं 2014 में इनकी संख्या बढ़कर 185 हो गई. जबकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में 233 दागियों की जीत हुई.

क्यों कम नहीं होता राजनीति में अपराधीकरण? 

राजनीति में अपराधीकरण पर लगाम लगाने के मकसद से फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया था. 

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि अगर कोई राजनीतिक पार्टी आपराधिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को उम्मीदवार बनाती है तो उसके सभी आपराधिक मामलों की जानकारी पार्टी को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी. 

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इसके साथ ही राजनीतिक पार्टियों को ये भी बताना होगा कि किन कारणों से आपराधिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया गया है. इसके अलावा यही जानकारी सोशल मीडिया अकाउंट और स्थानीय अखबार में भी देनी होगी. 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक पार्टियां इसकी जानकारी तो देती हैं, लेकिन कारण ये बताती हैं कि इनसे अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं है और इन पर जो भी आपराधिक मामले दर्ज हैं वो राजनीति से प्रेरित हैं. यानी कोर्ट का फैसला लागू होने के बावजूद जमीन पर उसका कोई असर नहीं दिखता.

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