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पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी जिले में एक गांव पड़ता है. नाम है- नक्सलबाड़ी. वही गांव जहां आज से 56 साल पहले एक ऐसा आंदोलन शुरू हुआ था, जिसके बाद पूरे भारत में माओवाद फैल गया.
चीन में एक कम्युनिस्ट नेता हुए. नाम था- माओ त्से तुंग. माओ ने एक बार कहा था- 'एक चिंगारी सारे जंगल में आग लगा देती है.'
माओ वही नेता थे जिन्होंने चीन में क्रांति की थी. इसी तर्ज पर आज से 56 साल पहले पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी जिले में पड़ने वाले नक्सलबाड़ी गांव में भी एक आंदोलन छिड़ा था. इसे 'नक्सलबाड़ी आंदोलन' कहा जाता है. आंदोलन के तहत, आदिवासी किसानों ने हथियार उठा लिए थे. ये वो लोग थे जो माओ की विचारधारा को मानते थे. इसलिए इन्हें माओवादी भी कहा जाता है.
इसी नक्सलबाड़ी गांव में पांच दशकों पहले जो माओवाद की 'चिंगारी' जली थी, वो कुछ ही समय में देशभर में 'आग' की तरह फैल गई. चूंकि, ये आंदोलन नक्सलबाड़ी में हुआ था इसलिए माओवादियों को 'नक्सली' भी कहा जाता है.
केंद्र सरकार 'नक्सलवाद' और 'माओवाद' को 'वामपंथी उग्रवाद' मानती है. इससे निपटने के लिए गृह मंत्रालय में अलग से डिविजन भी बना है.
कैसे शुरू हुआ था नक्सलबाड़ी आंदोलन?
बात मई 1967 की है. उस समय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेताओं ने बड़े जमींदारों के खिलाफ हथियार उठा लिए थे. इनमें मुख्य रूप से तीन नेता थे- चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल.
इस सबका मकसद था बड़े जमींदारों से जमीन छीनकर किसानों और भूमिहीन मजदूरों में बराबर बांट देना था.
तब के सिलिगुड़ी किसान सभा के अध्यक्ष जंल संथाल ने इसके लिए लोगों को एक करना शुरू किया. लेकिन, सशस्त्र संघर्ष के एक हफ्ते के भीतर ही नक्सलबाड़ी के पास बटाईदार की हत्या कर दी गई है. ये घटना 24 मई 1967 को हुई थी.
इसका कारण क्या था?
ऐसा माना जाता है कि इस नक्सल आंदोलन के पीछ अधूरे कृषि सुधार थे. बेतहाशा गरीबी, भूमिहीन किसानों का शोषण जिनमें ज्यादातर दलित और आदिवासी थे और सामाजिक न्याय से दूरी ने जनता और वामपंथी नेताओं के असंतोष को भड़का दिया था.
आजादी के बाद, कृषि सुधार के रूप में सरकार ने जमींदारी सिस्टम को खत्म कर दिया था, लेकिन जमीन का बंटवारा सही तरीके से नहीं किया था.
जमींदारी सिस्टम खत्म करने और कृषि सुधारों ने नए और अमीर किसानों को पैदा कर दिया. ये वो किसान थे जो गरीबों से अपने खेतों में मजदूरी करवाते थे लेकिन उसके साथ अपना हिस्सा साझा नहीं करते थे. जबकि असल में मेहनत ये मजदूर ही करते थे. नतीजा ये हुआ कि जमींदार अमीर होते गए और भूमिहीन मजदूर खाने को भी तरसते रहे.
पूरी तरह से खेती पर निर्भर लोगों में गरीबी का स्तर कथित तौर पर 95 फीसदी से ज्यादा हो गया था. असंतोष उबल पड़ा. नक्सलबाड़ी आंदोलन सिर्फ और सिर्फ सामाजिक-आर्थिक गुस्सा था.
विचारधारा क्या थी?
नक्सल नेताओं की सबसे बड़ी प्रेरणा चारू मजूमदार थे. चारू मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ से काफी प्रभावित थे. सत्तारूढ़ एलिट वर्ग को उखाड़ फेंकने के लिए माओ ने चीन की शोषित जनता को एक करने का काम किया था.
चारू मजूमदार ने माओ के उसी आइडिया को पश्चिम बंगाल में लागू किया. उनके आठ ऐतिहासिक दस्तावेजों ने नक्सल विचारधारा को बढ़ाया और कम समय में ही लोकप्रिय हो गए.
अगले चार-पांच सालों में नक्सलबाड़ी आंदोलन पूरे पश्चिम बंगाल में फैल गया. 'अमार बाड़ी, तोमार बाड़ी, नक्सलबाड़ी, नक्सलबाड़ी' जैसे नारे राज्यभर में सुनाई देने पड़ने लगे.
सरकार ने क्या किया?
नक्सल आंदोलन असल में आजादी के बाद से ही भड़कने लगा था. लेकिन इसे सरकार ने कमतर आंका. नक्सलबाड़ी आंदोलन के लगभग तीन हफ्ते बाद जून 1967 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री वाईबी चव्हाण ने लोकसभा में बताया था कि असल में ये स्थानीय समस्या थी और पुलिस को इससे सख्ती से निपटना चाहिए था.
हालांकि, इसके बाद सरकार का इसपर ध्यान गया. 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने माओवादी हिंसा को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया. तब से ही सरकार ने इसे कम करने के लिए बहुत कोशिश की, जिसने माओवाद प्रभाव को कम करने में मदद की.
2009 में तत्कालीन गृहमंत्री ने संसद में बताया था कि देश में माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या 223 थी. इसी साल 21 मार्च को गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि अब देश के 10 राज्यों के 70 जिलों में नक्सलवाद है.