डोनाल्ड ट्रंप के वाइट हाउस आते ही एक खास मकसद के लिए काम कर रही एजेंसियों के लगभग बंद होने की नौबत आ गई. DEI (डायवर्सिटी, इक्विटी और इनक्लूजन) यानी बराबरी के लिए काम कर रही सरकारी संस्थाओं को ट्रंप प्रशासन ने नोटिस भेज दिया कि कर्मचारी छुट्टी पर चले जाएं. इनकी वेबसाइट्स भी बंद हो चुकीं. लेकिन समानता पर काम कर रही संस्थाओं से ट्रंप सरकार को ऐसी क्या समस्या है, जो ये भी निशाने पर हैं?
अमेरिका में डाइवर्सिटी, इक्विटी और इनक्लूजन प्रोग्राम पर ट्रंप के आने के साथ ही खतरा पैदा हो गया. शपथ लेने के कुछ ही घंटों के भीतर नए राष्ट्रपति ने एग्जीक्यूटिव आदेश देते हुए इनपर काम करने वाली लगभग सभी एजेंसियों पर रोक लगाने की बात कर दी. बुधवार से इनके कर्मचारियों को पेड लीव पर भेज दिया गया.
डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी के नेता एलन मस्क ने भी डीईआई को रेसिज्म यानी नस्लवाद का दूसरा नाम कह दिया. ये अपने-आप में बड़ा विरोधाभासी है. डीईआई एजेंसियों पर आरोप है कि वो इसकी आड़ में नए ढंग का नस्लभेद शुरू कर चुकीं, जिसमें श्वेत या अमेरिकी लोगों को टारगेट किया जाता है. खासकर, उनको जो काबिल हों, पीछे रखा जा रहा था, ताकि अमेरिका सुपर पावर का अपना ओहदा खो दे.
कथित तौर पर नस्लभेद के खिलाफ एक्टिव इन संस्थाओं पर कैसे इसी लाइन पर काम करने का आरोप लगने लगा! ये समझने के लिए पांच साल पीछे चलते हैं.
साल 2020 की गर्मियों में मिनेसोटा राज्य में एक घटना हुई, जिसके बाद पूरी दुनिया में ब्लैक लाइव्स मैटर कैंपेन चलने लगा.
हुआ यूं कि जॉर्ज फ्लॉयड नाम का एक अश्वेत शख्स दुकान में नकली नोट देकर खरीदारी करता पकड़ा गया. भागने की कोशिश के बीच वो पकड़ा गया और एक पुलिस अधिकारी ने फ्लॉयड की गर्दन पर पैर रख दिया. यह क्रूरता उनकी मौत के साथ रुकी. फ्लॉयड के आखिरी शब्द थे- आई कान्ट ब्रीद.
आंदोलनों ने दिया DEI को नया जीवन
सड़कों पर लाखों लोग उतर गए. आंदोलनों के बीच महसूस किया गया कि केवल बोलने-लिखने से बराबरी नहीं आएगी. नस्लभेद खत्म करना है तो कंपनियों, एजेंसियों को कुछ करना होगा. कॉरपोरेट, सरकारी दफ्तरों और स्कूल-कॉलेजों में DEI यानी डायवर्सिटी, इक्विटी और इनक्लूजन को नए सिरे से लागू किया गया. या यूं भी कह सकते हैं कि इनका दोबारा जन्म हुआ. टारगेट तय हुआ और एडमिशन या नौकरियों में वाइट्स के अलावा भारी संख्या में बाकी लोग शामिल होने लगे. यही विविधता गले की फांस बनने लगी.
होने लगा राजनैतिक विरोध
देश की पहली महिला उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस तक डीईआई विरोधियों के निशाने पर आ गईं. लोग कहने लगे कि हैरिस को उनके रंग की वजह से इस पद के लिए चुना गया. यहां तक कि टैनेसी के रिपब्लिकन नेता टिम बुर्चेट ने यह बात सार्वजनिक तौर पर कह दी. इसके बाद से डीईआई पर राजनैतिक हमला आम हो गया, जबकि आम अमेरिकी पहले से ही इसपर सवाल उठा रहे थे.
आसान ढंग से समझना चाहें तो इसकी तुलना भारत के रिजर्वेशन से भी हो सकती है. दो खेमे एक-दूसरे के खिलाफ रहते हैं. एक का आरोप है कि कम योग्यता वालों को बड़ी नौकरियां मिल रही हैं, जबकि ज्यादा जानकार लोग पीछे छूट रहे हैं. यही लड़ाई अमेरिका में दिखने लगी.
प्यू रिसर्च सेंटर के हालिया सर्वे के मुताबिक, साल 2024 में अमेरिकी कर्मचारी DEI पर पिछले साल के मुकाबले ज्यादा निगेटिव थे. उनका मानना है कि ये एक फर्क को पाटने के लिए दूसरा और ज्यादा बड़ा भेदभाव शुरू करना है. कंपनियों में होते घाटे के लिए भी वे कम काबिल लेकिन इसी कंसेप्ट के तहत आए लोगों को जिम्मेदार बताने लगे.
अदालत ने भी किया DEI के नए कंसेप्ट का विरोध
अब बात करें कॉलेजों को, तो इसमें भी यही हो रहा था. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इसमें दखल देते हुए कह दिया कि कथित बराबरी और समानता के नाम पर मेरिट स्टूडेंट्स के साथ नाइंसाफी हो रही है. कोर्ट के मुताबिक, जातीय या नस्लीय कोटे का इस्तेमाल अमेरिकी सोच के खिलाफ है. इसके बाद रिपब्लिकन्स और एक्टिव हो गए. वे इसे रिवर्स रेसिज्म कहने लगे, जिसमें अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए काबिल बहुसंख्यक आबादी के साथ भेदभाव हो रहा था. अदालत ने भी कहा कि एडमिशन और नौकरियों में मेरिट को ही देखा जाना चाहिए, न कि नस्ल या जाति को.
एलन मस्क भी लगातार कहते रहे कि डीईआई असल में योग्यता को नीचे रखने का तरीका है ताकि अमेरिका भी पीछे होता चला जाए. यही वजह है कि ट्रंप के आते ही इसपर काम करने वाली एजेंसियों पर तुरंत एक्शन लिया गया. यहां तक कि इससे जुड़ी सरकारी वेबसाइट्स डाउन हो गईं. साथ ही सभी संघीय एजेंसियों को चेताया गया है कि वे 10 दिनों के भीतर इस प्रैक्टिस की रिपोर्ट दें.