दिल्ली-एनसीआर के बारे में माना जा रहा है कि यहां की हवा में सांस लेना रोज 10 या इससे ज्यादा सिगरेट पीने के बराबर है. कई इलाकों में AQI लगभग हजार तक पहुंच गया. यानी ये इलाके एक तरह से नाजी दौर का गैस चैंबर हैं. समझिए, कितनी समानताएं और क्या-क्या फर्क हैं दिल्ली की हवा और हिटलर के गैस चैंबर में.
कौन सी गैसें देखी जाती हैं?
एयर क्वालिटी इंडेक्स में खासतौर पर 6 जहरीली चीजों को देखा जाता है- कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओमोनिया और लेड. इनकी थोड़ी-बहुत मात्रा तो हर जगह है लेकिन एक निश्चित पैमाने से ऊपर जाना घातक साबित होता है. सांस के मरीजों पर तो इनका सीधा असर दिखता ही है, लेकिन ठीक सेहत वालों पर भी ऐसी हवा लॉन्ग टर्म में असर दिखाती है.
नाजी कैंपों में ऐसे हुई शुरुआत
हिटलर के गैस चैंबर में शुरुआत में कार्बन मोनोऑक्साइड का इस्तेमाल होता था. लोगों को कमरों में बंद किया जाता था, जो पूरी तरह से पैक होते. यहां नलियों के जरिए जहरीली गैस भेजी जाती. लगभग आधे से एक घंटे के भीतर लोगों की मौत हो जाती थी. समूह में लोगों को खत्म करने का ये आसान और सस्ता तरीका समझ में आया, जिसके बाद से नाजियों की क्रूरता बढ़ती ही चली गई.
इस गैस ने ढाया कहर
जाइक्लोन-बी ऐसा ही एक केमिकल था, जिसे जर्मन भाषा में साइक्लोन बी कहते हैं. 1920 में पहली बार इसका इस्तेमाल खाद में हुआ था. नीले रंग के इस केमिकल को अगर गर्म हवा के संपर्क में लाया जाए तो इससे हाइड्रोजन सायनाइड नाम की गैस निकलती है. ये बेहद घातक होती है, जो सेल्स के साथ मिलकर ऑक्सीजन की सप्लाई रोक देती है.
70 किलो वजनी शख्स के लिए इतनी सी मात्रा काफी
ये सबकुछ इतनी तेजी से होता है कि मौत में कुछ पल ही लगते हैं. जैसे 68 किलो वजन के व्यक्ति के भीतर अगर 70 मिलीग्राम गैस भी पहुंच जाए तो उसकी मौत 2 मिनट के भीतर हो जाएगी.
ऐसे काम करता था चैंबर
लोगों के कपड़े उतरवाए जाते थे, ताकि फ्यूम्स जल्दी से जल्दी असर करें. इसके बाद उन्हें कमरों में बंद कर दिया जाता था. ऊपर वेंटीलेटर की तरफ से गैस छोड़ी जाती, और पर्याप्त गैस के जाते ही वेंटीलेटर पैक कर दिया जाता था. कुछ समय बाद चैंबर खोलकर बॉडीज हटा दी जातीं और नए लोगों को डाल दिया जाता था. इस तरीके से लाखों यहूदियों की जान ली गई. माना जाता है कि जाइक्लोन-बी से रोज 6 हजार यहूदियों को मारा गया था. ये सिलसिला करीब दो सालों तक चलता रहा.
कौन करता था गैस की सप्लाई?
इसके लिए एक खास ब्यूरो था, जिसे नाम मिला- हाइजीनिक इंस्टीट्यूट. ये दावा करता था कि यहूदियों और स्पेशली-एबल्ड बच्चों को खत्म करके वो जर्मनी और उसके आसपास को एकदम साफ कर देगा. एंबुलेंस के जरिए गैस बैरक्स तक पहुंचाई जाती थी. गैस डालने के करीब आधे घंटे तक बैरक को पूरी तरह से बंद रखा जाता. इसके बाद भी भीतर जाते हुए जर्मन क्रू पूरी सावधानी बरतते थे.
दूसरा वर्ल्ड वॉर खत्म होने के बाद कई देशों ने खाद या क्लीनर के तौर पर हाइड्रोजन सायनाइड का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया. हालांकि अब भी इसका इंडस्ट्रियल उपयोग जारी है.
क्या घरों में रहना सेफ है?
दिल्ली और आसपास के इलाकों में हाई AQI के चलते ज्यादा से ज्यादा घर पर रहने की बात हो रही है. लेकिन ये भी सेफ नहीं. घर के भीतर की हवा बाहर की हवा से कई गुना ज्यादा प्रदूषित हो सकती है. इसकी वजह ये है कि घर आमतौर पर पैक होते हैं और अगर प्रदूषित हवा भीतर पहुंच जाए तो भीतर ही यहां से वहां सर्कुलेट होती रहती है. वहीं आउटडोर हवा का AQI घटना-बढ़ता रहता है.