डेनमार्क के लगभग 74 फीसदी लोग मानते हैं कि दुनिया में तकरीबन सारे लोग भरोसेमंद हैं. वे अनजान लोगों पर भी शक नहीं करते. ऐसा आपसी भरोसा किसी और देश में नहीं. यही वजह है कि इस यूरोपियन मुल्क को दुनिया का सबसे कम भ्रष्ट हिस्सा माना जा रहा है. ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की हालिया रिपोर्ट में लगातार सातवें साल इसे सबसे कम करप्ट माना गया.
करप्शन पर काम करने वाले इंटरनेशनल एनजीओ ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने मंगलवार को अपना सालाना करप्शन परसेप्शन इंडेक्स जारी किया. इसमें 180 देशों को 0 से 100 तक नंबर दिए गए. शून्य का मतलब बेहद या सबसे ज्यादा भ्रष्ट, और 100 या इसके करीब स्कोर करना मतलब साफ-सुथरा होना. इसमें 90 अंक लाते हुए डेनमार्क लगातार सातवें साल टॉप पर रहा.
दुनिया की लगभग 6.8 बिलियन आबादी ऐसे देशों में रहती है, जिन्हें 50 से कम नंबर मिले. यहां तक कि अमेरिका और ईमानदार कहलाने वाले कई यूरोपियन देशों की रैंकिंग भी नीचे आ चुकी. लोग जब-तब भ्रष्टाचार की शिकायत भी करते हैं, लेकिन दिलचस्प है कि करप्शन कोई सरकारी मर्ज नहीं, बल्कि खुद लोगों के बीच पनपी हुई आदत है. जैसे डेनिश ईमानदार होते हैं, और बाकियों पर भी भरोसा करते हैं.
कुछ ऐसा दिखता है आपसी विश्वास
वे एक-दूसरे को जबरन मुकदमों में नहीं घसीटते. वे घरों या कारों में लूट रोकने के लिए अलार्म नहीं लगाते. ज्यादातर बिजनेस में आपसी बातचीत पर भी भरोसा कर लिया जाता है, जबकि लिखित करार काफी बाद में होता है. सरकारी संस्थाओं, चाहे वो पुलिस हो, अदालतें या अस्पताल, नागरिक भरोसा करते हैं कि वे लोगों की भलाई पर ही काम करेंगी, और सही फैसले ही लेंगी. डेनमार्क की आधिकारिक वेबसाइट भी खुद को लैंड ऑफ ट्रस्ट कहती है.
डेनिश भरोसे का अंदाजा इसी बात से लगा लें कि कई बार दुकानदार यहां दुकानें खुली छोड़कर चले जाते हैं. दरवाजे पर क्यूआर कोड लगा होगा. आप स्कैन कीजिए, दरवाजा खुलेगा. भीतर से अपनी जरूरत का सामान पसंद कीजिए और काउंटर पर पैसे छोड़कर चले जाइए. कोई देखने वाला नहीं, केवल भरोसा है. इस देश के बारे में एक मजाक चलता है कि यहां पेरेंट्स अपने बच्चों को सड़क किनारे छोड़कर घूमने-फिरने चले जाएंगे और लौटेंगे तो भी बच्चा सही-सलामत मिलेगा.
तो क्या आपसी भरोसा ही डेन्स को ईमानदार बनाए हुए है?
केवल यही वजह नहीं. दरअसल ये देश दुनिया के कुछ सबसे अमीर देशों में रहा. यहां की जीडीपी ज्यादातर यूरोपियन देशों से बेहतर है. इसके अलावा सरकार भी नागरिकों के कई खर्च उठाती है. जैसे 14 सा की उम्र के बाद बच्चे आफ्टरस्कूल (efterskole) जा सकते हैं. ये एक तरह का बोर्डिंग स्कूल है, लेकिन सरकार यहां पढ़ने पर काफी छूट देती है. यूनिवर्सिटी में कोई ट्यूशन फीस नहीं. साथ ही स्टूडेंट्स को ठीकठाक आर्थिक मदद भी मिलती है.
द गार्जियन में छपी एक रिपोर्ट में एक टर्म इस्तेमाल हुई है- इमेजिन्ड सोसायटी. इसका मतलब है कि हम खुद को एक ऐसे समुदाय का हिस्सा मान सकें, जिसके लोगों से हमारी मुलाकात भी न हुई हो. ये तभी मुमकिन है, जब लोग एक-दूसरे से काफी अलग न हो, जैसे कोई बेहद अमीर या कुछ बहुत गरीब न हों. डेनमार्क का स्ट्रक्चर ऐसा ही है. यहां ज्यादातर लोग एक जैसी आर्थिक स्थिति के हैं. ये चीज भी आपसी भरोसा बढ़ाती है.
डेनमार्क की ईमानदारी के पीछे एक कारण और भी हो सकता है, वो है यहां के लोगों का कम बोलना. असल में करप्शन की मार्किंग करते हुए लोगों से कई सवाल पूछे जाते हैं, जैसे वे सरकार पर, या आपस में भरोसा करते हैं, या नहीं. वे किस बात पर नाखुश हैं. डेनिश लोग भले ही ईमानदार हों लेकिन चूंकि वे बातचीत भी कम से कम करते हैं, ऐसे में भ्रष्टाचार को लेकर वे ज्यादा खुल नहीं पाते.
कुछ समय से यहां भी बदलाव दिखने लगे
साल 2010 में यहां घेटो पॉलिसी आई. देश में कुछ ऐसे इलाके चिन्हित किए गए, जहां इमिग्रेंट्स रहते हैं, या जहां वे बसाए जा सकें. इनमें ज्यादातर गैर-पश्चिमी देशों से आए हुए और उनमें भी मुस्लिम हैं. अब तक लगभग बराबरी पर काम करते आए कोपेनहेगन के लिए ये एक नई चीज रही.
घेटो में रहने वालों के लिए अलग नियम हैं. किसी भी जुर्म पर उन्हें दोगुना जुर्माना या दोगुनी सजा काटनी पड़ सकती है. साल 2020 में एक नियम आया कि यहां रहने वाले बच्चों को हर हफ्ते लगभग 25 घंटे चाइल्डकेयर में बिताना जरूरी है ताकि वे डेनिश वैल्यू सीख सकें. हद तो तब हुई, जब यहां रहने वाले लोगों के लिए एक नेता ने रात 8 बजे के कर्फ्यू का प्रस्ताव दे दिया, हालांकि वो खारिज हो गया था.
हाल-हाल में यहां से करप्शन स्कैंडल भी सुनाई दे रहे हैं. कुछ समय पहले डेनिश संसद के 20 के करीब सदस्यों ने अपनी संपत्ति का सही लेखाजोखा नहीं दिया था. इसके अलावा, पुलिस वर्क काउंसिल के सदस्यों को इस आरोप के बाद इस्तीफा देना पड़ा कि काउंसिल के पैसों का उपयोग महंगी डिनर पार्टियों में हुआ.
करप्शन पर रिपोर्ट कितनी ईमानदार
खुद ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स के साफ-सुथरे होने पर सवाल होते रहे. टीआई की रिपोर्ट एक्सपर्ट्स और बिजनेस करने वाले समुदाय से बातचीत पर आधारित होती है. आरोप है कि इसमें करप्शन के असल ढंग को टटोलने की बजाए सिर्फ लोगों की राय पर काम होता है. टीआई पर पक्षपात का भी आरोप लगता रहा कि वो वेस्ट को कम करप्ट, जबकि विकासशील देशों को ज्यादा भ्रष्ट बताती है. यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी देशों को अक्सर हाई रैंकिंग मिलती रही, जबकि वहां बहुत से बड़े घोटाले होते रहे. एनजीओ अपने डेटा को सार्वजनिक किए बगैर बस एलान कर देता है. ये बात भी इसे कम भरोसेमंद बनाने लगी है.