नीरो के दौर में रोम के शाही खानदान का इलाज करने वाली लॉकस्टा को दुनिया का पहला सीरियल किलर माना जाता है. इलाज के बहाने वो लोगों को मारती थी.
रोम के शासक को दी मौत
बेहद हसीन इस महिला को जड़ी-बूटियों की अच्छी-खासी जानकारी थी. इलाज करते हुए ही उसने ये भी सीख लिया कि कौन से पौधे की एक बूंद भी इंसान को तुरंत मार सकती है, या फिर धीरे-धीरे ऐसे मारेगी कि किसी को भनक नहीं लगेगी. मारे जाने वालों में पहला शख्स क्लाउडिअस था- रोम का राजा. पिता के बाद गद्दी पर बैठे नीरो ने लगभग हर दुश्मन को मारने के लिए लॉकस्टा की मदद लेनी शुरू कर दी. इस तरह से हुआ एक सीरियल किलर का जन्म.
शौक के लिए जान लेने लगी
मामूली परिवार की लॉकस्टा राजसी लोगों में उठने-बैठने लगी. धीरे-धीरे वो महल के बाहर धनी व्यापारियों और मंत्री-संत्री के भी मामले देखने लगी. लॉकस्टा अमीर लेकिन कुख्यात होती चली गई. हद तब हुई, जब वो शौक-शौक में लोगों की जान लेने लगी. कई बार पौधों का जहर जांचने के लिए वो किसी को मार देती. बहुत बाद में रोम की सीनेट ने नीरो और लॉकस्टा के खिलाफ कार्रवाई की ठानी. ये 64 AD की बात है. नीरो ने खुद ही अपनी जान ले ली, लेकिन लॉकस्टा को बेहद क्रूर ढंग से मारा गया.
साल 1908 में बनी एक फिल्म ‘ह्यूमेनिटी थ्रू द एज़ेस में लॉकस्टा’ के बारे में बताया गया है कि कैसे अपने पागलपन में उसने सैकड़ों जानें ले लीं.
वो नर्स, जिसने सैकड़ों बच्चों को गला दबाकर मार डाला
ब्रिटेन में एक नर्स हुई थी- एमिलिया डायर. 19वीं सदी के मध्य में इस महिला ने 400 से भी ज्यादा बच्चों की हत्या कर दी. बात मार्च 1896 की है, जब लोगों को थेम्स नदी के किनारे एक बच्चे की लाश मिली. उसका गला टेप से दबाया गया था. शरीर पर चोट के निशान थे. लंदन सिहर गया. लेकिन अभी बहुत कुछ जानना बाकी था.
ये रिवाज बना मौत की वजह
ये वो दौर था, जब बिना शादी के मांओं को समाज बुरी नजर से देखता. जिंदा रहने के लिए वे अपने बच्चों को बेबी- फार्मर्स को दे देतीं. यानी वे औरतें, जो अमीर भी हों, ट्रेंड भी ताकि बच्चा संभल जाए. एमिलिया ऐसी ही बेबी फार्मर थी, जो 10 से 80 पाउंड के बदले बच्चा गोद ले लेती, और घर लाकर उसकी हत्या कर देती. बच्चा ज्यादा छोटा हो, तो सीधे हत्या की बजाए वो उसे दूध देना बंद कर देती, या ठंडे कमरे में जमीन पर लिटा देती.
नदी में फेंकने लगी लाश
इतने से मन नहीं भरा तो वो डॉक्टरों से साठगांठ करके जिंदा बच्चे को मुर्दा घोषित करवाने लगी और फिर उसी बच्चे को थेम्स नदी में फेंक देती. लगभग 30 सालों के भीतर एमिलिया ने सैकड़ों जानें लीं. राज खुलने पर फास्ट ट्रैक सुनवाई हुई और जून 1896 में उसे न्यूगेट प्रिजन में फांसी दे दी गई.
इतिहास ऐसी महिला साइकोपैथ्स से भरा पड़ा है, जिन्होंने कभी किसी वजह की आड़ में, तो कभी बस शौक के लिए लोगों की हत्याएं कीं. यानी महिला साइकोपैथ भी होती हैं. नॉर्वे में डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेंसिक साइकेट्री ने अपनी स्टडी में पाया कि हत्याओं के आरोप में कैद काट लगभग 30 प्रतिशत पुरुषों में अगर साइको होने की आशंका रहती है, तो महिलाओं में ये 17 प्रतिशत है.
क्या है साइकोपैथी
ये एक तरह का पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है. इसके मरीज में दूसरों के लिए प्रेम, संवेदना नहीं होती. वो कंट्रोल करना चाहता है, और अपनी गलतियों पर किसी तरह का गिल्ट भी नहीं होता. साइकोपैथिक लोग अक्सर कानून और सामाजिक नियम तोड़ते रहते हैं. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की जेल के कैदियों पर स्टडी भी कहती है कि साइकोपैथ्स का दिमाग अलग तरह से काम करता है. इसका जिक्र प्रॉबिंग साइकोपैथिक ब्रेन्स नाम है.
कैसे पहचानें किसी साइकोपैथ महिला को
चूंकि औरतों के बारे में माना जाता है कि वे खूंखार अपराध शायद ही करती हैं, लिहाजा इसपर ज्यादा स्टडी नहीं है. हालांकि कई अमेरिकी यूनिवर्सिटीज ने इसे खंगालने की कोशिश की. मैनचेस्टर यूनवर्सिटी ने ने पाया कि पुरुष साइकोपैथ आमतौर पर आत्ममुग्ध होते हैं. वे खुद को परफेक्ट और हर मामले में सही बताते हैं, वहीं महिलाएं ज्यादा खुफिया तरीके से रहती हैं. वे नापसंदगी के बाद भी लोगों की तारीफ करती हैं. इस तरह धीरे-धीरे वे यकीन जीततीं, और इसके बाद अपनी पारी चलती हैं.
अलग है पुरुषों और महिलाओं के लक्षण
एक और लक्षण मेल और फीमेल साइकोपैथ को अलग बनाता है. पुरुष गुस्से में शारीरिक नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि महिला दिमागी हमला करती है. वे अपने शिकार को कई सारे पैतरों से घेर लेती हैं. यहां तक कि कई मामलों में पता तक नहीं लग पाता कि किसी खास महिला की वजह से कोई नुकसान हुआ है. इसके लिए वे शिकार पर लगातार नजर रखतीं या एक तरह से रिसर्च कर डालती हैं.
‘बॉर्न टू डेस्ट्रॉय’ किताब में ढेरों महिला साइकोपैथ्स का जिक्र है. इसकी लेखिका विनिफ्रेड रूल ने मनोरोगियों पर लंबी-चौड़ी रिसर्च के बाद ये किताब लिखी. रूल के मुताबिक, हत्याएं करने, या किसी के लिए जुनून की हद तक चले जाने वाली महिलाएं का बचपन आमतौर पर ट्रॉमा से भरा होता है. वे पेरेंट्स का अलगाव. मारपीट, नशा जैसी कई चीजें झेलती हैं, जिसके कारण युवा होते हुए वे दूसरों से अलग हो जाती हैं. कई बार जेनेटिक ढंग से भी हिंसा पेरेंट्स से बच्चों में आ जाती है.