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बाइडेन सरकार में 14.5% टूटा रुपया, ट्रंप 2.0 में और होगा कमजोर? समझें- रुपये और डॉलर की चाल का गणित

एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि ओबामा के दूसरे कार्यकाल यानी 2012 से 2016 के बीच रुपया लगभग 29 फीसदी तक कमजोर हो गया था. ट्रंप के पहले कार्यकाल में इसमें 11 फीसदी की गिरावट आई थी.

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डोनाल्ड ट्रंप अगले साल 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. (फाइल फोटो-PTI)
डोनाल्ड ट्रंप अगले साल 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. (फाइल फोटो-PTI)

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं. वो 2025 की 20 जनवरी को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. इसी के साथ ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू हो जाएगा. ट्रंप का अमेरिका का राष्ट्रपति बनना भारत के लिहाज से अच्छा माना जा रहा है. हालांकि, ट्रंप 2.0 में भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है.

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हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की एक रिपोर्ट आई है. इस रिपोर्ट में ट्रंप की वापसी पर भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर को लेकर अनुमान लगाया है. रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि ट्रंप 2.0 में रुपया 8 से 10 फीसदी तक टूट सकता है. अगर ऐसा हुआ तो रुपया सबसे निचले स्तर पर पहुंच जाएगा.

एसबीआई की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि ट्रंप 2.0 में एक डॉलर की तुलना में रुपये का भाव गिर सकता है. हालांकि, कुछ समय बाद रुपये में मजबूती की उम्मीद भी जताई गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में रुपया 11 फीसदी तक कमजोर हुआ था. अब दूसरे कार्यकाल में रुपया 8 से 10 फीसदी कमजोर होने का अनुमान लगाया गया है.

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और क्या कहा गया है रिपोर्ट में?

एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है कि ओबामा के दूसरे कार्यकाल यानी 2012 से 2016 के बीच रुपया लगभग 29 फीसदी तक कमजोर हो गया था. ट्रंप के पहले कार्यकाल में इसमें 11 फीसदी की गिरावट आई थी. 

बाइडेन सरकार में अब तक रुपया 14.5 फीसदी तक कमजोर हो चुका है. बाइडेन सरकार की तुलना में ट्रंप के पहले कार्यकाल में रुपया कम कमजोर हुआ था. और दूसरे कार्यकाल में ये 10 फीसदी तक कमजोर हो सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक, बाइडेन सरकार में एक डॉलर की औसत कीमत 79.3 रुपये रही. अभी एक डॉलर का भाव 84 रुपये से ज्यादा है.

ट्रंप के पहले कार्यकाल में एवरेज एक्सचेंज रेट 69.2 रुपये था. दूसरे कार्यकाल में ये 87 से 92 रुपये तक पहुंच सकता है.

लेकिन सवाल, रुपया कमजोर कैसे होता है?

डॉलर की तुलना में अगर किसी भी मुद्रा का मूल्य घटता है तो उसे मुद्रा का गिरना, टूटना या कमजोर होना कहा जाता है. अंग्रेजी में इसे 'करेंसी डेप्रिसिएशन' कहते हैं. रुपये की कीमत कैसे घटती-बढ़ती है, ये पूरा खेल अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुड़ा हुआ है. 

होता ये है कि हर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार होता है. चूंकि दुनियाभर में अमेरिकी डॉलर का एकतरफा राज है, इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर ज्यादा होता है. दुनिया में 85 फीसदी कारोबार डॉलर से ही होता है. तेल भी डॉलर से ही खरीदा जाता है. 

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डॉलर की तुलना में रुपये को मजबूत बनाए रखने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को रखना बहुत जरूरी है. आरबीआई के मुताबिक, 1 नवंबर 2024 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 589.84 अरब डॉलर था. 

अगर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में उतना डॉलर है, जितना अमेरिका के भंडार में रुपया है, तो रुपये की कीमत स्थिर रहेगी. अगर डॉलर कम हुआ तो रुपया कमजोर होगा और डॉलर ज्यादा हुआ तो रुपया मजबूत होगा.

इसको ऐसे समझिए...

अभी एक डॉलर की कीमत 84.41 रुपये है. हम इसे मोटा-मोटी 84 रुपये मान लेते हैं. अमेरिका के पास 84,000 रुपये हैं और भारत के पास 1 हजार डॉलर. यानी, अभी दोनों देशों के पास बराबर धनराशि है. अब अगर भारत को ऐसी चीज खरीदनी है, जिसका भाव 8,400 रुपये है तो इसके लिए भारत को 100 डॉलर चुकाने होंगे.

अब भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 900 डॉलर बचे, जबकि अमेरिका के पास 92,400 रुपये हो गए. अब भारत की स्थिति कमजोर हो गई और इससे रुपया भी कमजोर हो जाएगा. अब ये संतुलन बनाए रखने के लिए भारत को अमेरिका को भी 100 डॉलर की कोई चीज बेचनी होगी. 

लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है. भारत खरीदता ज्यादा है, लेकिन बेचता कम है. इस कारण रुपये की स्थिति कमजोर ही रहती है. यही वजह है कि भारत का ट्रेड बैलेंस हमेशा निगेटिव में रहता है. 2023-24 में भारत का ट्रेड डेफेसिट या व्यापार घाटा लगभग 20 लाख करोड़ रुपये था.

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रुपया और न गिरे, इसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अपने विदेशी मुद्रा भंडार से और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में उसकी मांग पूरी करने की कोशिश करता है.

क्या कभी मजबूत भी हुआ है रुपया?

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि आजादी के समय रुपये और डॉलर बराबर थे और तब एक डॉलर की कीमत एक रुपये के बराबर थी. हालांकि, ऐसा नहीं था. 1947 में एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये के बराबर थी. 1965 तक इतनी ही कीमत रही. 1966 से डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर होने लगा. 

1975 आते-आते डॉलर की कीमत हो गई 8 रुपये और 1985 में डॉलर का भाव 12 रुपये के पार चला गया. 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया तेजी से गिरने लगा. 21वीं सदी की शुरुआत होते-होते तक डॉलर 45 रुपये तक आ गया. 

आजादी के बाद से अब तक 10 बार ही ऐसा हुआ है, जब डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत हुआ है. 1977 से 1980 के बीच लगातार 4 साल तक रुपये की स्थिति में सुधार हुआ था. तब रुपया एक रुपये तक मजबूत हुआ था. इसके बाद 2003, 2004 और 2005 में भी रुपये में सुधार हुआ था. तब ढाई रुपये तक की मजबूती आई थी. इसी तरह 2007 में करीब 3 रुपये, 2010 में 4 रुपये और 2017 में 2 रुपये की मजबूती आई थी.

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