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यूक्रेन में नहीं हो रहा सालों से चुनाव, क्या वाकई तानाशाह हो चुके राष्ट्रपति जेलेंस्की, या कोई और वजह?

रूस और यूक्रेन के बीच जंग खत्म तो नहीं हुई, बल्कि लड़ाई रोकने की बात कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी जुबानी युद्ध में उलझ पड़े. हाल में उन्होंने यूक्रेन के लीडर वलोडिमिर जेलेंस्की पर तानाशाही का आरोप लगा दिया. ट्रंप कीव में स्थगित चुनावों को लेकर यूक्रेनी नेता को घेर रहे हैं. वहीं लोकप्रियता पर हुआ ताजा सर्वे कुछ और ही कहता है.

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यूक्रेन में साल 2024 में चुनाव प्रस्तावित था. (Photo- AP)
यूक्रेन में साल 2024 में चुनाव प्रस्तावित था. (Photo- AP)

डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन और रूस के बीच तीन सालों से चली आ रही लड़ाई को रोकने का जिम्मा लिया तो, लेकिन मामला कुछ अलग ही मोड़ लेता दिख रहा है. ट्रंप न केवल मॉस्को के साथ दिख रहे हैं बल्कि कीव को लताड़ भी रहे हैं. अब उन्होंने यूक्रेन में चुनाव न होने को लेकर वहां राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की को तानाशाह कह दिया. इस देश में पिछले 6 सालों से इलेक्शन नहीं हो सके. लेकिन युद्धरत देशों में यह कितना आम है?

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जेलेंस्की को लेकर क्या कहा ट्रंप ने

रूसी हमले के बाद जेलेंस्की ने शायद सोचा हो कि इससे ज्यादा बुरा कुछ नहीं होगा, लेकिन इस लीडर के हिस्से अभी और मुश्किलें आनी बाकी थीं. वाइट हाउस में आते ही ट्रंप ने दोनों देशों के बीच चले आ रहे युद्ध को रोकने की बात की. शुरुआत में लगा कि ट्रंप मध्यस्थता करेंगे लेकिन अब तस्वीर कुछ साफ हो चुकी. ट्रंप रूस के नेता व्लादिमीर पुतिन के साथ मिलकर तय करेंगे कि लड़ाई कब और किन शर्तों पर रोकनी है. यूक्रेन, तीन सालों में जिसकी इमारतें जमीन हो चुकीं, उसे इस पीस डील में कहीं शामिल नहीं किया जा रहा. 

बात यहीं खत्म नहीं होती. रूस के पक्षधर दिखते ट्रंप यूक्रेनी लीडर के खिलाफ बयानबाजियां तक कर रहे हैं. उन्होंने हाल में कह दिया कि जेलेंस्की बिना चुनाव वाले तानाशाह हैं. उनका कहना है कि जेलेंस्की ने केवल अपनी जिद में देश को लड़ाई में झोंक दिया और लाखों जानें ले लीं. यह आरोप सीधे-सीधे जेलेंस्की की लोकतांत्रिक वैधता पर सवाल उठाता है. लेकिन क्या इस देश में इलेक्शन केवल लड़ाई की वजह से रुका रहा, या कुछ और भी है?

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donald trump allegations on volodymyr zelenskyy over elections in ukraine photo AFP

अगर युद्ध न होता तो इलेक्शन को लेकर क्या स्थिति रहती

जेलेंस्की अप्रैल 2019 में प्रेसिडेंट चुने गए थे. यूक्रेनी संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 साल का होता है. इस हिसाब से अगला इलेक्शन पिछले साल ही हो जाना चाहिए था. हालांकि लड़ाई की वजह से मार्शल लॉ लगा हुआ है और चुनाव पर कोई बातचीत नहीं हो रही. जेलेंस्की ने खुद कहा कि जब तक लड़ाई चलेगी, चुनाव कराना सही नहीं. इससे लोगों की सुरक्षा खतरे में आ सकती है. वहीं ट्रंप का कहना है कि ये सब बहाने हैं क्योंकि असल में स्थानीय लोगों में जेलेंस्की अलोकप्रिय हो चुके हैं. 

क्या वाकई घटी है जेलेंस्की की लोकप्रियता

ट्रंप के बयानों के बीच कीव इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशियोलॉजी और आइडेंटिटी एंड बॉर्डर्स इन फ्लक्स ने ने एक सर्वे किया. नवंबर 2024 से जनवरी 2025 के बीच हुए सर्वे में 1600 लोगों ने हिस्सा लिया था. इसके अनुसार अब भी लगभग 63 फीसदी लोग जेलेंस्की को अच्छा राष्ट्रपति मानते हैं. इसमें भी 26.1 प्रतिशत लोग जेलेंस्की को पूरी तरह सही मानते हैं, वहीं बड़ा हिस्सा जेलेंस्की के फैसलों को आंशिक सहमति देता है. 

कुल मिलाकर, मौजूदा हालात की रोशनी में देखा जाए तो बड़ी यूक्रेनी आबादी अब भी जेलेंस्की से बेजार नहीं, लेकिन लड़ाई की वजह से अभी चुनाव नहीं हो पा रहे. वैसे युद्धरत देशों में इलेक्शन न होना कोई नई बात नहीं. हालांकि ये भी नहीं, कि ऐसी स्थिति में इलेक्शन होते ही न हों, खासकर जब स्थिति सिविल वॉर जैसी हो. 

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donald trump allegations on volodymyr zelenskyy over elections in ukraine photo Unsplash

मसलन, साल 1864 में बीते चार सालों से चली आ रही लड़ाई के बाद भी राष्ट्रपति चुनाव हुए. इस दौरान पूरा यूएस दो हिस्सों में बंटा हुआ था. अब्राहम लिंकन ने चुनाव जीता, जबकि दक्षिणी अमेरिका ने इसका बहिष्कार कर रखा था. ये पहला मौका था, जब किसी देश ने लंबे और तबाही मचाने वाले गृह युद्ध के दौरान भी इलेक्शन करवाया और बाद में उस फैसले को लोकतांत्रिक भी माना गया. 

खुद यूक्रेन में भी पिछले रूसी हमलों के दौरान ही राष्ट्रपति चुनाव हुए थे, जिसमें पेट्रो पोरोशेंको की जीत हुई थी. इस दौरान न केवल रूस ने क्रीमिया पर कब्जा किया था, बल्कि यूक्रेन के बड़े हिस्से में रूस को सपोर्ट करने वाले अलगाववादी बगावत भी कर रहे थे. 

दूसरी तरफ, इससे ठीक अलग स्थितियों वाले उदाहरण भी हैं, जहां युद्ध के बीच जो जहां था, वहीं फ्रीज हो गया और फिर सालोंसाल वहीं बना रहा, जब तक कि तानाशाही के चलते विद्रोह न हो गया हो. कांगो में साठ के दशक से साल 2006 तक तक इलेक्शन स्थगित रहा. 

बाहरी या अंदरुनी लड़ाई में लगे देशों में क्यों टालते हैं चुनाव

ये केवल इतनी ही बात नहीं कि चुनाव में जनता पर जोखिम हो सकता है, बल्कि इसकी कई और वजहें भी हैं. जंग की वजह से पहले ही देश में उठापटक रहती है. इस बीच कई विद्रोही समूह बन चुके होते हैं. अलगाववादी अलग आवाजें उठाने लगते हैं. इसका फायदा विदेशी ताकतें उठा सकती हैं. वे इलेक्शन में दखल देकर बड़ी आसानी से अपनी पसंद की सरकार ला सकती हैं. चुनाव से आया फैसला पहली नजर लोकतांत्रिक लगेगा, लेकिन असल में ये विदेशी ताकतों की मर्जी हो सकती है. इसी आशंका को टालने के लिए जंग में लगे देश आम चुनावों को भी टालते दिखते हैं. इसका आर्थिक पहलू तो है ही. जनरल इलेक्शन्स पर भारी पैसे खर्च होते हैं, जो लड़ाई के दौरान देश अफोर्ड भी नहीं कर सकते. 

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