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क्या रूस और यूक्रेन को एक ग्राउंड पर ला सकेंगे ट्रंप, क्यों मिडिल ईस्ट से पेचीदा है यहां शांति समझौता?

रूस और यूक्रेन के बीच जंग को हजार से ज्यादा दिन बीत चुके. लंबी लड़ाई का नुकसान दोनों ही पक्षों को हुआ. अब डोनाल्ड ट्रंप के आने के साथ आस बंधी है कि शायद मध्य-पूर्व में हुए अस्थाई सीजफायर की तर्ज पर यहां भी शांति आ सके, लेकिन इन दोनों देशों का मामला मिडिल ईस्ट से जरा टेढ़ा है.

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डोनाल्ड ट्रंप रूस और यूक्रेन जंग रुकवाने की कोशिश में हैं. (Photo- AP)
डोनाल्ड ट्रंप रूस और यूक्रेन जंग रुकवाने की कोशिश में हैं. (Photo- AP)

फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ. शुरुआत में एक्सपर्ट मान रहे थे कि छोटा देश होने की वजह से यूक्रेन शायद जल्दी रुक जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और खिंचते-खिंचते लड़ाई को लगभग तीन साल बीत चुके. हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के लीडरों से बात करते हुए एलान किया कि यूएस और मॉस्को जंग रोकने को लेकर 'नेगोशिएट' करेंगे. ट्रंप की छवि मजबूत ग्लोबल नेता की तो है लेकिन क्या वे वाकई मॉस्को के साथ किसी फैसले पर पहुंच सकेंगे?

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बुधवार को ट्रंप ने वॉशिंगटन और मॉस्को के बीच नेगोशिएशन की बात की. इसमें कीव का जिक्र नहीं था, जहां लड़ाई छिड़ी हुई है. यानी जाहिर तौर पर ये दो सुपर पावर्स के बीच बातचीत होगी. ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संबंध रूस-यूएस की दुश्मनी वाली छवि से अलग रहे. दोनों के बीच कई मुलाकातें भी हो चुकीं. अब वे सऊदी अरब में मिल सकते हैं. ओवल ऑफिस से ट्रंप के इस एलान पर मॉस्को ने भी मुहर लगाते हुए कहा कि अब वो समय आ चुका, जब दोनों देश मिलकर काम करें. 

तो क्या ट्रंप और पुतिन का रिश्ता रूस को लेकर दशकों से चले आ रहे वेस्टर्न भेदभाव को खत्म कर देगा?

क्या ट्रंप की पहल से रूस अपने पैर पीछे खींच लेगा और लड़ाई रोक देगा?

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अगर पीस डील हुई तो यूक्रेन के हिस्से क्या आ सकेगा?

बीच में कयास लग रहे थे कि अमेरिका शायद यूक्रेन को नाटो की सदस्यता दे दे और दूसरे पक्ष यानी रूस से कुछ पाबंदियां हटा दें. इसके बाद जंग रुक जाएगी. हालांकि यूक्रेन के इस सैन्य गुट में शामिल होने के फिलहाल कोई आसार नहीं. खुद ट्रंप प्रशासन में रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने यह बात कही. साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि यूक्रेन अगर चाहे कि वो साल 2014 से पहले के बॉर्डर को वापस पा ले, तो यह भी मुमकिन नहीं. बल्कि इस सोच से लड़ाई और लंबी खिंच सकती है. बता दें कि एक दशक पहले यूक्रेन के पास क्रीमिया प्रायद्वीप भी था, जिसे रूस ने लड़ाई में जीत के बाद अपनी सीमाओं में मिला लिया. 

donald trump committed to end ukraine russia war photo AP

ट्रंप और उनके रक्षा मंत्री के बयानों से साफ है कि वे यूक्रेन को लेकर उतनी भी संवेदना से भरे हुए नहीं हैं, जैसे पूर्व अमेरिकी सरकार थी. जो बाइडेन के कार्यकाल में कथित तौर पर यूक्रेन को तमाम सैन्य मदद मिली, जिससे वो रूस से मुकाबला कर सके. यूक्रेन के लिए ट्रंप का आना बड़ा झटका है. नाटो में सदस्यता की उसकी उम्मीद तो हल्की पड़ी ही, साथ ही पुरानी जमीन वापस पाने में भी अमेरिकी सहायता शायद ही मिल सके. कुल मिलाकर, इस बार अमेरिका रूस के साथ खड़ा दिख रहा है. इससे ग्लोबल गणित तो बदलेगा, लेकिन क्या ट्रंप की मौजूदगी युद्ध भी रोक सकती है?

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ट्रंप ने तो कह दिया लेकिन जंग रोकने में कई चुनौतियां हैं

- यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अब तक रूस के साथ ऐसे किसी समझौते पर हामी नहीं दी, जिसमें उन्हें अपनी पुरानी जमीन छोड़नी पड़े. हां, हाल में उन्होंने शांति के लिए दोनों देशों में कुछ खास इलाकों की अदला-बदली की बात जरूर की. यानी इस हाथ दे और उस हाथ ले. लेकिन रूस के लिए ये पीस डील शायद खास फायदेमंद नहीं इसलिए ही वो चुप्पी साधे हुए है. 

- जेलेंस्की यह भी चाहते हैं कि सिर्फ यूरोपियन देश ही नहीं, उनके सुरक्षा समझौते में अमेरिका की भी भागीदारी रहे. ट्रंप और यूरोप के बीच इन दिनों तनातनी साफ है. टैरिफ से लेकर नाटो को लेकर ट्रंप के सुर धमकीभरे हैं. ऐसे में दोनों का एक मंच पर आना भी मुश्किल लगता है. 

donald trump committed to end ukraine russia war photo AP

वैसे ट्रंप के आनेभर से मिडिल ईस्ट में अस्थाई शांति आ चुकी. चीन भी कुछ महीनों से चुप बैठा है. युद्धरत देशों के बीच ट्रंप की वापसी से जो उम्मीद जागी है, उसके पीछे ट्रंप का पुराना रिकॉर्ड है. पुराने कार्यकाल में उन्होंने कई समझौते करवाए. या समझौते अंजाम तक नहीं पहुंच सके तो भी उसकी कोशिश जरूर की. 

किन देशों के बीच सुलह में हाथ 

- ट्रंप ने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग से मुलाकात कर कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव को कम करने की कोशिश की. ये भेंट वैसे कोई ठोस चेहरा नहीं ले सकी लेकिन नॉर्थ कोरिया की आक्रामकता कुछ समय के लिए थमी जरूर. 

- अफगानिस्तान में संघर्ष कम करने के लिए ट्रंप प्रशासन के दौरान दोहा समझौता हुआ. इसके तहत अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से लौट आई ताकि तालिबान और स्थानीय सरकार में तालमेल बैठ सके, हालांकि ये गणित भी ठीक नहीं बैठा. 

- इजरायल और अरब देशों के बीच अब्राहम समझौता बड़ी जीत थी. इसकी वजह से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे अरब देशों के संबंध इजरायल से काफी हद तक सुधरे. कईयों ने तभी इजरायल को देश की मान्यता दी.

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नोबेल शांति पुरस्कार तक जा पहुंची थी बात 

ट्रंप की फॉरेन पॉलिसी में मिडिल ईस्ट और कोरियाई प्रायद्वीप में स्थिरता पर काफी फोकस था. यहां तक कि हरदम अमेरिका के खिलाफ आग उगलते उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग से भी ट्रंप ने तीन बार भेंट की. इन शांति वार्ताओं का एजेंडा कोरिया में स्थाई शांति लाना था. हालांकि ये हो नहीं सका लेकिन कोशिश इतनी बड़ी थी कि इसके लिए डोनाल्ड ट्रंप का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामांकित हो गया. यानी ट्रंप की कोशिशें इंटरनेशनल मंच पर असर बना चुकी थीं. हालांकि उन्हें ये पुरस्कार मिल नहीं सका.

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