अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल अक्टूबर में अबॉर्शन को कानूनी मंजूरी देने वाला अपना फैसला पलट दिया. लगभग 50 साल पहले औरतों के हक में आए इस फैसले को हटाने के बाद अब अमेरिकी स्टेट अपने-अपने हिसाब से सबकुछ तय करेंगे. वे चाहेंगे तो गर्भपात हो सकेगा. नहीं चाहेंगे तो औरत को बच्चे को जन्म देना ही होगा, फिर चाहे वो रेप से आया हो, या औरत की अपनी सेहत को खतरा हो. पहले से ही 13 स्टेट ऐसे हैं, जहां अबॉर्शन गैरकानूनी है. लेकिन इन सब बातों का ड्रॉप-बॉक्स से क्या ताल्लुक!
असल में ये ड्रॉप बॉक्स इसी बात का इलाज है. अमेरिकी सरकार चाहती है कि प्रेग्नेंट होने पर बच्चा इस दुनिया में जरूर आए, और अगर मां उसे पालना-पोसना नहीं चाहती तो इन खिड़कियों पर बेबी को छोड़ सकती है.
ऐसे बना कानून और आया बॉक्स
न्यूयॉर्क समेत कई राज्यों की सरकारों ने बेबी सेफ हेवन लॉ बनाया. इसका मकसद बच्चों को बचाना है. कई बार मां अपने बच्चे को लेकर सड़कों पर रहती है, कई को नशे की लत रहती है. ऐसे में बच्चा सेफ रह सके, इसलिए स्टेट्स ने साल 1999 में एबेंडन इनफेंट प्रोटेक्शन एक्ट पास किया. जिसके तहत बच्चे को किसी भी तरह के खतरे में डालना गैरकानूनी है. इसी के साथ आया सेफ बॉक्स का चलन.
किस उम्र के बच्चे छोड़े जा रहे?
यहां कुछ घंटों से लेकर 7 दिन तक के बच्चों को छोड़ा जा सकता है. कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जो महीनेभर तक के बच्चों को ड्रॉप बॉक्स में डालने की इजाजत देते हैं.
खास तरीके से डिजाइन होती है खिड़की
सोचिए, कुछ घंटों का बच्चा कितना नाजुक होता है. जरा सी लापरवाही, तापमान का ज्यादा-कम होना, या समय पर वैक्सीन न मिलना भी खतरनाक साबित हो सकता है. तो इन खिड़कियों को खूब सोच-समझकर बनाया गया.
सर्दी में गर्म, गर्मियों में ठंडा
इनमें टेंपरेचर रेगुलेटर लगा होता है. जैसे ही बच्चे को भीतर डाला जाएगा, तुरंत उस मौसम के हिसाब से तापमान एडजस्ट हो जाएगा. साथ में सेंसर लगा होगा, जो इमारत के स्टाफ को अलर्ट करेगा कि कोई नया बच्चा आया है. अगर पांच मिनट के भीतर बच्चे को विंडो से उठाकर घर के अंदर नहीं लिया गया, तो इमरजेंसी अलार्म बजने लगेगा.
साफ-सफाई का बेहद ध्यान रखा जाता है
लगभग पांच से छह किलोग्राम का बेबी कंफर्टेबल होकर रह सके, ये बॉक्स उतना बड़ा होता है. बाहर से ये स्टील का बना होता है और भीतर बच्चे के हिसाब से आरामदेह होता है. यहां तक कि इस बात का ध्यान भी रखा जाता है कि एक बच्चे के आने के बाद खिड़की का स्पेस साफ हो जाए ताकि बच्चों को किसी तरह का इंफेक्शन न हो.
क्यों पड़ी इसकी जरूरत
एक बार फिर बता दें कि अमेरिका में कम उम्र में मां बनने की घटनाएं काफी आम हैं. 10 में से 3 अमेरिकी लड़कियां 20 की उम्र तक पहुंचने से पहले प्रेग्नेंट हो जाती हैं. इस तरह से साल में साढ़े 7 लाख से ज्यादा टीन-एजर्स गर्भवती होती हैं, जिसमें से काफी सारी बच्चियां या तो दूसरे कम सख्ती वाले राज्य में जाकर गर्भपात करवाती हैं, या फिर बच्चा होने के बाद उसे कहीं छोड़ देती हैं. ये खुद बच्चियां होती हैं, जो कॉलेज में पढ़ रही होती हैं. कई बार पिता या फिर परिवार बच्चे को नहीं अपनाते, तो मांएं अपने बच्चों को ड्रॉप-बॉक्स में छोड़ने लगीं.
नया नहीं है ड्रॉप बॉक्स कंसेप्ट
वैसे तो जून में अबॉर्शन कानून बदलने के बाद पूरे अमेरिका में ये बॉक्स लगने लगे, लेकिन असल में ये काफी पुराना कंसेप्ट है. मध्यकालीन समय में चर्च के सामने लकड़ी के बॉक्स बने होते, जिनके किनारों पर घंटी लगी होती थी. मांएं अपना बच्चा छोड़कर घंटी बजाकर चली जातीं, इसके बाद चर्च के लोग बच्चे को संभालकर लौट आते थे. बाद में ये बॉक्स अस्पतालों और अनाथालयों के सामने भी झूलते दिखने लगे.
लगभग 20 सालों के भीतर ही जर्मनी और स्विटरजैंड जैसे यूरोपियन देशों ने भी बेबी-बॉक्स को अपना लिया.
क्या ये बॉक्स वाकई जान बचा रहे हैं?
साल 2000 में जर्मनी में भी सेफ बॉक्स बनने लगे. इसके बाद से वहां छूटे हुए और मृत बच्चों की संख्या तेजी से गिरी. बता दें कि इससे पहले कमउम्र की डरी हुई बच्चियां ठंडे मैदानों या जंगलों में अपने बच्चे को फेंक जाती थीं, जहां वे कभी भूख, कभी मौसम तो कभी किसी जंगली जानवर का शिकार हो जाते.
इसे निओ नेक्टिसाइड कहते हैं
पेरेंट्स जब जानबूझकर अपने नवजात को किसी खतरे में डालें ताकि उसकी मौत हो जाए. ज्यादातर मां-पिता बच्चे के जन्म के घंटेभर बाद ही उसे लावारिस छोड़ देते हैं. इसके बाद उसके जीने की संभावना एकदम कम हो जाती है.
दक्षिण कोरिया में भी है बेबी बॉक्स
यहां की सरकार तो नहीं, लेकिन यहां का एक शख्स इस प्रोग्राम को लेकर आया, जिसकी खुद की बेटी स्पेशली-एबल्ड है. ली जॉन्ग- रेक नाम के इस पिता साल 2009 में पहला ड्रॉप बॉक्स बनाया, जिसके बाद से लेकर अब तक पूरे सिओल में साढ़े 6 सौ से ज्यादा जानें बचाई जा सकी हैं.
अब बहुत से मुल्क बेबी बॉक्स रख रहे हैं. इनमें लगभग सारे यूरोपियन देशों समेत कनाडा, जापान, मलेशिया, नीदरलैंड, फिलीपींस और रूस भी शामिल हैं. भारत के तमिलनाडु में साल 1994 में पहला बेबी बॉक्स रखा गया, जिसका कंसेप्ट तत्कालीन सीएम जयललिता ने दिया. साल 2002 में दक्षिण भारत के कई राज्यों की राजधानियों में ई-क्रैडल भी लाया गया, जो अस्पतालों या अनाथालयों के बाहर रखा होता. असल में तब नवजातों को लावारिस फेंकने और आवारा कुत्तों के उन्हें नोंच खाने की घटनाएं तेजी से बढ़ी थीं. इसके बाद ही दक्षिणी राज्य इसे लेकर सतर्क हुए.