डोनाल्ड ट्रंप के शपथ समारोह में एलन मस्क के एक वीडियो पर विवाद हुआ था. अपनी खुशी जताते हुए उन्होंने जो सैल्यूट किया, उसे हिटलर के नाजी सलाम से कंपेयर किया गया. मस्क ने मजाकिया अंदाज में ट्रोलर्स को ही ट्रोल कर दिया. लेकिन अब बात थोड़ी गंभीर है. उनपर जर्मनी समेत कई देशों में राजनीति को दक्षिणपंथी रुख देने का आरोप लग रहा है.
अगले कुछ दिनों में जर्मनी में आम चुनाव हैं. इस बीच वहां की एक पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) की कैंपेनिंग के दौरान मस्क की ऑनलाइन मौजूदगी दिखी. उन्होंने न केवल इस पार्टी के लिए वोट देने की अपील की, बल्कि वोटर्स से नाजी अपराध-बोध से 'मूव बियॉन्ड' करने को भी कहा. बता दें कि हिटलर के दौर के बाद से जर्मनी में वामपंथ या मध्यमार्गी रखने वाली राजनीति ही चलती रही. वहीं एएफडी राष्ट्रवादी एजेंडा पर काम करने वाला दल है, जो बीते एक दशक में लगातार मजबूत होता चला गया. अबकी चुनावों में अगर ये पार्टी जीतकर आई तो इसमें बड़ा हाथ मस्क की अपील का भी हो सकता है.
जर्मनी अकेला देश नहीं, मस्क कई ऐसे देशों में एक्टिव हैं, जहां चुनाव होने वाले हैं, या फिर जहां राइट विंग के लोग किसी भी तरह का आंदोलन कर रहे हैं. उन्होंने न्यूजीलैंड के नए पीएम क्रिस्टोफर लक्सन का खास वेलकम किया, जो कंजर्वेटिव पार्टी से हैं. इसके अलावा वे अर्जेंटिना और इटली के राइट-विंग नेताओं से लगातार मिल रहे हैं.
अमेरिकी मीडिया कंपनी एनबीसी न्यूज में एक-एक देश में मस्क के मूवमेंट के बारे में विस्तार से बताया गया है कि वे कैसे अप्रत्यक्ष रूप से देशों में दक्षिणपंथ के रास्ते मजबूत कर रहे हैं. इसमें अर्जेंटिना, ब्राजील, हंगरी, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, रोमानिया और इजरायल जैसे देश शामिल हैं. कनाडा के पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो के जाने के पीछे भी मस्क की कंपनी एक्स का बड़ा हाथ रहा, जिसपर लगातार इमिग्रेशन के खिलाफ मुहिम छिड़ी रही.
मस्क वामपंथ को सीधे-सीधे लताड़ नहीं रहे, बल्कि एक पूरे सिस्टम के जरिए उसे पीछे भेज रहे हैं. कभी वे ट्विटर पर कोई आइडिया ट्रेंड करवाते हैं, तो कभी देशों के नेताओं से पर्सनल कनेक्शन बनाते दिखते हैं. वे खासकर युवाओं को टारगेट कर रहे हैं, जिनकी उम्र 18 से 34 साल है. माना जा रहा है कि यही वो वर्ग है, जो रुढ़िवादी दलों को वापस चाहता है. जैसे जर्मनी में मस्क ने इस वर्ग से अपील करते हुए कहा कि वे अपने पेरेंट्स की गलतियों के गिल्ट से बाहर निकलें और जर्मनी को बचाएं.
राइट विंग राजनेताओं को भी इससे फायदा हो रहा है. मस्क टेस्ला और स्पेसX के सीईओ ही नहीं, एक्स पर उनकी 217 मिलियन फॉलोइंग भी है. ऐसे में वे एक फोटो पर एक छोटा सा कैप्शन भी डालें तो असर दूर तक होगा. साथ ही, मस्क के ट्रंप से अच्छे रिश्ते हैं. ऐसे में फॉरेन लीडर्स और अमेरिका के बीच मस्क पुल का काम कर सकते हैं. याद दिला दें कि इन दिनों कई नेताओं के साथ ट्रंप की मुलाकात के बीच मस्क भी दिखाई दिए, फिर चाहे वो भारत हो, या यूक्रेन और हंगरी.
मस्क की दक्षिणपंथ को प्रमोट करने की धुन पर विवाद भी हो रहे हैं. आरोप लगाए जा रहे हैं कि वे राजनैतिक विचारधारा की आड़ में अपना बिजनेस प्रमोट कर रहे हैं. अमेरिकी विपक्षी नेता क्रिस्टोफर मर्फी ने मस्क के ही प्लेटफॉर्म X पर उन्हीं को घेरते हुए ये बात कह दी. बात यहीं तक सीमित नहीं रही. फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने भी पिछले महीने मस्क पर नए इंटरनेशनल प्रतिक्रियावादी आंदोलन को शुरू करने का आरोप लगा दिया.
लेकिन मस्क धुर दक्षिणपंथी दलों को प्रमोट करें, या वामपंथ को- इसका आम लोगों पर भला क्यों असर होगा! इसका बहुत सादा-सा जवाब है- असंतोष. बीते एकाध दशक में दुनिया में बेहद तेजी से माइग्रेशन हुआ. कई युद्धरत देशों से लोगों ने दूसरे देशों में शरण ली. जहां सीधे-सीधे शरण नहीं मिली, वहां अवैध इमिग्रेशन बढ़ा. नतीजा ये हुआ कि बहुत से देशों में लोकल्स और बाहरी, ये दो खेमे हो गए. दोनों एक-दूसरे पर नाराज. राष्ट्रवादी पार्टियां इसे असंतोष को भुना रही हैं. वे दावा कर रही हैं कि उन्हें मौका मिले तो घुसपैठ एकदम रुक जाएगी, साथ ही पहले से आ चुके लोग भी बाहर भेजे जाएंगे.
ट्रंप और मस्क के अमेरिका में इसकी शुरुआत भी हो चुकी. डिपोर्टेशन के वीडियो वायरल हो रहे हैं. ये बात मस्क की कथित रिएक्शनरी मुहिम को भी मजबूती दे रही है.
दुनिया में दक्षिणपंथ की हवा के बीच एक अलग ट्रेंड ये दिख रहा है कि युवा पुरुष रुढ़िवादी दलों की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं. द स्टेट ऑफ अमेरिकन मेन- फ्रॉम कन्फ्यूजन एंड क्राइसिस टू होप के मुताबिक आधे से ज्यादा अमेरिकी युवा मानते हैं कि ये समय महिलाओं की बजाए पुरुषों के लिए ज्यादा मुश्किल है.
18 से 29 साल के पुरुष इस मुश्किल को पाटने का एक ही तरीका देख रहे हैं- दक्षिणपंथ. ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी साफ वजह अध्ययनकर्ताओं के पास भी नहीं. अंदाजा लगाया जा रहा है कि मीटू मूवमेंट के बाद से ऐसा शिफ्ट हुआ, जब पुरुषों को लगने लगा कि उन्हें गलत मामलों में भी फंसाया जा सकता है और कानून भी शायद महिलाओं के पक्ष में रहे.