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यूरोपियन चुनाव में फ्रांस से लेकर जर्मनी तक राइट-विंग का दबदबा, क्यों उदार माने जाते यूरोप में दक्षिणपंथ की हवा?

लगभग 25 साल पहले ऑस्ट्रिया में ही जब दक्षिणपंथी दल जीतकर आया, तो पूरा यूरोप नाराज हो उठा था. डिप्लोमेटिक रिश्ते तक तोड़ने की धमकियां दी गई थीं. अब ऑस्ट्रिया समेत फ्रांस और जर्मनी जैसे बड़े देशों में भी राइट विंग की तरफ रुझान बढ़ा. यूरोपियन संसद के लिए 27 देशों में हुए चुनाव में दक्षिणपंथी मानी जाती पार्टियों को पहली बार भारी वोट मिलते दिख रहे हैं.

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यूरोपियन संसद के लिए चुनाव पूरे हो चुके. (Photo- Getty Images)
यूरोपियन संसद के लिए चुनाव पूरे हो चुके. (Photo- Getty Images)

यूरोपियन यूनियन के 27 देशों में 6 से 9 जून तक चुनाव चले ताकि यूरोपियन संसद बनाई जा सके. पांच साल तक चलने वाली इस इंटरनेशनल सभा में कई ऐसे फैसले लिए जाते हैं, जिसे दुनिया भी फॉलो करती है. हालांकि इस बार कई चुनाव के नतीजे कई बड़े बदलाव लेकर आ सकते हैं. एक्सपर्ट अनुमान लगा रहे हैं कि पारंपरिक पार्टियों को किनारे करते हुए कट्टर राइट-विंग दल आ सकते हैं. 

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अमेरिका में चुनाव से पहले ही रिपब्लिकन प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में माहौल बन रहा है. ट्रंप हालांकि हश-मनी मामले में दोषी साबित हो चुके, लेकिन उनके चाहने वालों पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कुछ ऐसी ही स्थितियां यूरोप में भी हैं. वहां एंटी-वोक पार्टियां खड़ी हो चुकीं, जो अपने देश को बाहरियों, खासकर वामपंथ से बचाने का वादा कर रही हैं. 

फ्रांस में संसद हुई भंग

फ्रांस में धुर-दक्षिणपंथी दल नेशनल रैली को ऐसी तगड़ी जीत मिली कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने देश की संसद को भंग कर दिया और जल्दी चुनाव की घोषणा कर दी. शुरुआती नतीजों से पता चला कि नेशनल रैली लगभग 32 प्रतिशत वोट जीतेगी, जो राष्ट्रपति की पार्टी से दोगुने से भी अधिक है. एग्जिट पोल के अनुमान आने के बाद मैक्रों ने संसद भंग कर दी. वहां अब जून आखिर से जुलाई के बीच चुनाव होंगे. 

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किन देशों में कैसा है माहौल

जर्मनी में सेंटर राइट और फार-राइट दल जीत की तरफ दिखाई दे रहे हैं. इटली की पीएम जियोर्जिया मेलोनी अपनी राइट-विंग सोच के लिए जानी जाती हैं, उनकी ही पार्टी फिलहाल आगे दिख रही है. ऑस्ट्रिया, हंगरी, ग्रीस और बल्गेरिया में भी यही माहौल है, जहां सेंटर-राइट और फार-राइट पार्टियां आगे दिख रही हैं. 

european union election 2024 right wing vote surge photo AP

क्या है दक्षिण और वामपंथ? 

आजकल ये दोनों ही शब्द खूब कहे जा रहे हैं. इनकी शुरुआत फ्रांस से हुई. 18वीं सदी के आखिर में वहां के 16वें किंग लुई को लेकर नेशनल असेंबली के सदस्य भिड़ गए. एक हिस्सा राजशाही के पक्ष में था, दूसरा उसके खिलाफ. जो लोग राजसत्ता के विरोध में थे, वे लेफ्ट में बैठ गए, जबकि सपोर्टर राइट में बैठ गए. विचारधारा को लेकर बैठने की जगह जो बंटी कि फिर तो चलन ही आ गया. यहीं से लेफ्ट विंग और राइट विंग का कंसेप्ट दुनिया में चलने लगा. 

काफी महीन है दोनों का फर्क

जो भी लोग कथित तौर पर उदार सोच वाले होते हैं, माइनोरिटी से लेकर नए विचारों और LGBTQ का सपोर्ट करते हैं, साथ ही अक्सर सत्ता का विरोध करते हैं, वे खुद को वामपंथी यानी लेफ्ट विंग का बोल देते हैं. इसके उलट, दक्षिणपंथी अक्सर रुढ़िवादी माने जाते हैं. वे देशप्रेम और परंपराओं की बात करते हैं. धर्म और धार्मिक आवाजाही को लेकर भी उनके मत जरा कट्टर होते हैं. यूरोप के संदर्भ में देखें तो वे वाइट सुप्रीमेसी के पक्ष में, और चरमपंथी मुस्लिमों से दूरी बरतने की बात करते हैं. 

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आम लोग क्यों हैं नाराज

यूरोप में फिलहाल सबसे ज्यादा गुस्सा सरकार की शरणार्थियों पर उदारता को लेकर है. लोगों का मानना है कि सरकार अपनी इमेज के लिए मुस्लिम देशों के रिफ्यूजियों को आने दे रही है. इससे उनपर टैक्स का भी बोझ बढ़ा. साथ ही हिंसा की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. फ्रांस में बीते साल हिंसा और जबर्दस्त आगजनी हुई, जिसके पीछे शरणार्थियों का हाथ माना गया. जर्मनी और स्कैंडिनेविया में भी कुछ पार्टियां ऐसे आरोप लगा रही हैं. 

european union election 2024 right wing vote surge photo Getty Images

कहां से आए यूरोप में मुस्लिम? 

यूरोप में मुस्लिम आबादी सीरिया, इराक और युद्ध से जूझते देशों से आती गई. शुरुआत में यहां शरणार्थियों को लेकर सरकारें काफी उदार थीं. इसमें उनका खुद का भी हित था. कम आबादी वाले देशों के पास पैसे भरपूर थे और उन्हें काम करने के लिए मैनपावर की जरूरत थी. तो इस तरह से 60 के दशक से यूरोप में मुस्लिम आबादी बढ़ने लगी. यहां तक सबकुछ बढ़िया-बढ़िया दिखता रहा. यूरोप और मुस्लिम दोनों एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करते रहे, लेकिन फिर चीजें बदलीं.

इस्लामिक रिवॉल्यूशन ने बदला तानाबाना

अस्सी के दशक के दौरान ईरान के धार्मिक नेताओं ने इस्लामिक जागरण की बात शुरू कर दी. वे अपील करते कि यूरोप जाकर खुद को यूरोपियन रंग-रूप में ढालने की बजाए मुसलमान खुद को मुस्लिम बनाए रखें. यहीं से सब बदलने लगा. मुस्लिम अपनी मजहबी पहचान को लेकर कट्टर होने लगे. पहले जो लोग फ्रांस या जर्मनी में आम लोगों के बीच घुलमिल रहे थे, वे एकदम से अलग होने लगे. इसके साथ ही उनकी बढ़ती आबादी भी यूरोप को अचानक दिखी.

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प्यू रिसर्च सेंटर की मानें तो यूरोप में जितने भी शरणार्थी हैं, उनमें 86% मुसलमान हैं. यूरोप की कुल आबादी का 5% हिस्सा उनसे है. सबसे ज्यादा 9% लोग फ्रांस में, जिसके बाद जर्मनी और स्वीडन का नंबर आता है. यूरोपियन यूनियन के तहत आने वाले साइप्रस में कुल आबादी का करीब 26 मुस्लिम ही हैं.

european union election 2024 right wing vote surge photo Getty Images

प्यू का ही डेटा कहता है कि साल 2050 से पहले ही यूरोप की पॉपुलेशन में 14% लोग शरणार्थी मुस्लिम होंगे. ये एक बड़ा नंबर है. अगर ऐसा हुआ तो स्थानीय लोगों को अपने रिसोर्स बांटने होंगे. घर से लेकर नौकरियां बटेंगी. टैक्स का बोझ बढ़ेगा. साथ ही सांस्कृतिक फर्क की वजह से तनाव भी बढ़ सकता है. यही वजहें गिनाते हुए पार्टियां अपनी जमीन तैयार कर रही हैं. 

क्या-क्या बदल सकता है

- वामपंथियों का कहना है कि अगर कट्टरपंथी पार्टियां जीतकर आईं तो वे देश की सीमाएं हर जरूरतमंद के लिए बंद कर देंगी. 

- क्लाइमेट पॉलिसीज को लेकर भी डर दिखाया जा रहा है कि ये दल ग्रीन डील (कार्बन उत्सर्जन घटाने) को खत्म कर देंगे. 

- आरोप है कि राइट-विंग रूस की तरफ झुका हुआ है, ऐसे में उनके आने पर यूक्रेन जैसे देश अकेले पड़ जाएंगे. अब तक यूरोप की तरफ से यूक्रेन को भारी मदद मिलती रही. 

- ईयू की इंडस्ट्रियल रणनीति भी बदल सकती है. फिलहाल वो अमेरिका और चीन दोनों के साथ ही पार्टनरशिप पर है, लेकिन दक्षिणपंथ कथित तौर पर इसे अपने मुताबिक तोड़ेगा-मरोड़ेगा. 

- ईयू इनलार्जमेंट की भी बात हो रही है. इसमें कई देश संसद में नए जुड़ सकते हैं. हालांकि पार्टियां बदलीं तो भी इसपर फर्क पड़ेगा. 

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