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सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया बूथ कैप्चरिंग का दौर... जानें EVM आने से देश में कितना बदला चुनाव

लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से ठीक एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में EVM-VVPAT को लेकर सुनवाई होगी. ये सुनवाई एडीआर की याचिका पर हो रही है. इससे पहले 16 अप्रैल को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बैलेट वाले दौर में कैसे बूथ कैप्चरिंग होती थी, उसे नहीं भूलना चाहिए.

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ईवीएम का सबसे पहले इस्तेमाल 1982 में हुआ था. (फाइल फोटो)
ईवीएम का सबसे पहले इस्तेमाल 1982 में हुआ था. (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट में EVM और VVPAT की पर्चियों के 100% मिलान की मांग वाली याचिका पर सुनवाई चल रही है. इस दौरान याचिकाकर्ता ने EVM की बजाय बैलेट पेपर से वोटिंग करवाने का सुझाव भी दिया. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि बैलेट पेपर के युग में कैसे बूथ कैप्चर किए जाते थे.

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दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में EVM में पड़े वोटों और VVPAT की पर्चियों के 100% क्रॉस वेरिफिकेशन की मांग को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने याचिका दाखिल की है. इस पर जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की बेंच सुनवाई कर रही है.

मंगलवार को एडीआर की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, 'भारत में चुनाव कराना बहुत बड़ा काम है. कोई भी यूरोपीय देश ऐसा नहीं कर सकता. आप जर्मनी की बात कर रहे हैं, लेकिन वहां की आबादी कितनी है. मेरे गृह राज्य बंगाल की आबादी जर्मनी से कहीं ज्यादा है. चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखिए. सिस्टम को गिराने की कोशिश मत कीजिए.'

एडीआर की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने जर्मनी का उदाहरण देते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की वकालत की थी. इस पर जस्टिस खन्ना ने बूथ कैप्चरिंग का जिक्र करते हुए कहा, 'हम सभी 60 के दशक में हैं. हमने देखा है कि जब EVM नहीं होती थी, तब क्या होता था. हमें आपको बताने की जरूरत नहीं है.'

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भारत में कैसे आई EVM?

आजादी के बाद कई सालों तक भारत में चुनाव बैलेट पेपर से करवाए जाते थे. इसमें वोटर को बैलेट पेपर दिया जाता था. फिर वोटर अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम के आगे मुहर लगाते थे और उसे बैलेट बॉक्स में डाल देते थे. 

नतीजों वाले दिन इन बैलेट बॉक्स को खोला जाता था और पर्चियों को गिना जाता था. इससे नतीजे आने में कई दिन लग जाते थे.

भारत में पहली बार चुनाव आयोग ने 1977 में सरकारी कंपनी इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (ECIL) को EVM बनाने का टास्क दिया. 1979 में ECIL ने EVM का प्रोटोटाइप पेश किया, जिसे 6 अगस्त 1980 को चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों को दिखाया.

मई 1982 में केरल की पारूर विधानसभा सीट पर उपचुनाव के दौरान पहली बार EVM का इस्तेमाल किया गया. लेकिन उस समय मशीन के इस्तेमाल को लेकर कोई कानून नहीं था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनाव को खारिज कर दिया.

1989 में रिप्रेंजेंटेटिव्स ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 में संशोधन किया गया और EVM से चुनाव कराने की बात जोड़ी गई. हालांकि, कानून बनने के बाद भी कई सालों तक EVM का इस्तेमाल नहीं हो सका. 1998 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर EVM से चुनाव कराए गए. 1999 में 45 लोकसभा सीटों पर भी EVM से वोट डाले गए. फरवरी 2000 में हरियाणा के चुनावों में भी 45 सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ.

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मई 2001 में पहली बार तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल की सभी विधानसभा सीटों पर EVM से वोट डाले गए. 2004 के लोकसभा चुनाव में सभी 543 सीटों पर EVM से वोट पड़े. तब से ही हर चुनाव में सभी सीटों पर EVM से वोट डाले जा रहे हैं.

यह भी पढ़ें: ...तो 5-6 दिन देर से आएंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे? पढ़ें- क्या है EVM-VVPAT का पूरा मामला जिसपर SC करेगा सुनवाई

ये VVPAT क्या है?

VVPAT यानी वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल. VVPAT को वही दोनों सरकारी कंपनियां बनाती हैं, जो EVM बनाती हैं.

वोटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए VVPAT को लाया गया था. ये मशीन EVM से कनेक्ट रहती है. जैसे ही वोटर वोट डालता है, वैसे ही एक पर्ची निकलती है. इस पर्ची में उस कैंडिडेट का नाम और चुनाव चिन्ह होता है, जिसे उसने वोट दिया होता है.

VVPAT की स्क्रीन पर ये पर्ची 7 सेकंड तक दिखाई देती है. ऐसा इसलिए ताकि वोटर देख सके कि उसका वोट सही उम्मीदवार को गया है. 7 सेकंड बाद ये पर्ची VVPAT के ड्रॉप बॉक्स में गिर जाती है.

VVPAT मशीनों का सबसे पहले इस्तेमाल 2013 के नागालैंड विधानसभा चुनाव के दौरान हुआ था. इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में कुछ सीटों पर भी इस मशीन को लगाया गया. बाद में 2017 के गोवा विधानसभा चुनाव में भी इनका इस्तेमाल हुआ. 

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2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार VVPAT मशीनों का इस्तेमाल देशभर में किया गया. उस चुनाव में 17.3 लाख से ज्यादा VVPAT मशीनों का इस्तेमाल किया गया था.

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EVM और VVPAT का मामला क्या है?

एडीआर ने अपनी याचिका में कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए EVM के वोटों और VVPAT की पर्चियों को क्रॉस-वेरिफाई किया जाना चाहिए. एडीआर ने सुझाव दिया है कि ये प्रक्रिया जल्दी हो सके, इसके लिए VVPAT पर बारकोड का इस्तेमाल किया जा सकता है.

हालांकि, ये पहली बार नहीं है जब EVM में दर्ज वोटों और VVPAT की पर्चियों के मिलान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई हो. 

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 21 विपक्षी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इस याचिका में विपक्षी पार्टियों ने मांग की थी कि हर लोकसभा क्षेत्र के 50% EVM वोटों को VVPAT की पर्चियों से मिलान की जाए. 

इस पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दिया था कि अगर हर लोकसभा के 50% EVM वोटों को VVPAT से मिलान किया जाएगा, तो इससे नतीजे आने में कम से कम पांच दिन का समय लग जाएगा. 

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इसके बाद 8 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि हर लोकसभा की 5 EVM और VVPAT में डाले गए वोटों को मिलान करने का आदेश दिया था. 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पहले तक चुनाव आयोग एक EVM में दर्ज वोटों को VVPAT की पर्चियों से मिलान करता था.

पिछले साल मार्च में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 100% EVM वोटों और VVPAT की पर्चियों का मिलान करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी.

EVM और VVPAT की कीमत कितनी होती है?

भारत में वोटिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाली मशीन में तीन चीजें होती हैं. पहली- कंट्रोल यूनिट (CU), दूसरी- बैलेट यूनिट (BU) और तीसरी- VVPAT.

इन तीनों की कीमत केंद्र सरकार की प्राइस नेगोशिएशन कमेटी तय करती है. चुनाव आयोग के मुताबिक, एक बैलेट यूनिट की कीमत 7,991 रुपये, कंट्रोल यूनिट की कीमट 9,812 रुपये और VVPAT की कीमत 16,132 रुपये होती है.

कैसे होती है वोटों की गिनती?

EVM के वोटों की गिनती अलग-अलग राउंड्स में होती है. हर राउंड में 14 EVM के वोट गिने जाते हैं. हर राउंड के बाद एजेंट से फॉर्म 17-C हस्ताक्षर करवाया जाता है और फिर RO को दे दिया जाता है. 

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काउंटिंग हॉल में एक ब्लैकबोर्ड भी होता है, जिसमें हर राउंड के बाद हर प्रत्याशी को कितने वोट मिले, ये लिखा जाता है. फिर लाउडस्पीकर से घोषणा की जाती है. इसे ही रूझान कहा जाता है.

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