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क्या MSP की कानूनी गारंटी ही है समस्या का हल? समझें- NDA और UPA सरकार में किसानों को क्या मिला

किसान लंबे वक्त से एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं. एमएसपी की सिफारिश करने वाली केंद्रीय एजेंसी सीएसीपी ने भी एमएसपी को कानूनी दायरे में लाने की सिफारिश की थी.

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किसान लंबे वक्त से एमएसपी की मांग कर रहे हैं.
किसान लंबे वक्त से एमएसपी की मांग कर रहे हैं.

Farmers Protest MSP Demand: किसान संगठनों की ओर से बुलाए गए 'दिल्ली चलो मार्च' का आज दूसरा दिन है. हालांकि, किसान अब तक दिल्ली नहीं पहुंच पाए हैं. किसान प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली की बॉर्डर सील हैं. साथ ही किसानों पर आंसू गैस और रबर बुलेट का इस्तेमाल भी किया जा रहा है.

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दिल्ली चलो मार्च का आह्वान दो किसान संगठन- संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा की ओर से किया गया था. दावा है कि इसमें 200 से ज्यादा किसान संगठनों का साथ मिला है. 

प्रदर्शन कर रहे किसानों की सबसे बड़ी मांगों में से एक एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानूनी गारंटी की भी है. किसान संगठनों का दावा है कि सरकार ने उनसे एमएसपी की गारंटी पर कानून लाने का वादा किया था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका. 

एमएसपी असल में फसल की एक गारंटीड कीमत होती है, जो किसानों को मिलती है. भले ही उस फसल की कीमत बाजार में कम ही क्यों न हो. एमएसपी सरकार की एक नीति है, जो 1960 के दशक से चली आ रही है. कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेस (CACP) फसलों पर एमएसपी तय करती है. साल 2018 में सीएसीपी ने एमएसपी को कानूनी दायरे में लाने की सिफारिश की थी. हालांकि, सिफारिश और मांग के बावजूद एमएसपी को अब तक कानून के दायरे में नहीं लाया गया है.

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क्या ऐसा हो सकता है?

एमएसपी को कानूनी दायरे में लाने का वादा पूरा करना न सिर्फ फायदेमंद है, बल्कि चुनौतीभरा भी है. अभी एमएसपी का फायदा सिर्फ 6 से 20 फीसदी किसानों को ही मिलता है, लेकिन एमएसपी के कानून बन जाने से इसका फायदा सभी किसानों को मिलने की उम्मीद है. 

लिहाजा, किसानों की ये मांग जायज लगती है. लेकिन सरकार के संसाधनों पर वित्तीय दबाव, भारत के फूड सब्सिडी बिल और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों पर होने वाले संभावित प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियां अकसर किसानों को उनकी फसलों के लिए एमएसपी की गारंटी देता है. इसका मकसद अर्थव्यवस्था की जरूरतों पर विचार करने से ज्यादा वोट बंटोरना है. इस तरह के वादों से न सिर्फ सब्सिडी पर सरकार का खर्च बढ़ने बल्कि फसलों के भंडारण और बर्बादी का सामना भी करना पड़ सकता है. 

इस साल की शुरुआत में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने इस बात पर जोर दिया था कि बीते 10 साल में गेहूं और धान की एमएसपी पर खरीद के जरिए किसानों को 18 लाख करोड़ रुपये मिले हैं. ये 2014 से पहले के दशक की तुलना में ढाई गुना ज्यादा है.

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जब बाजार में फसलों की कीमतें गिर जाती हैं, तो सरकारी एजेंसियां एमएसपी पर फसलें खरीदती हैं, जिससे किसानों को आय की गारंटी मिलती है. हालांकि, इससे मुख्य रूप से गेहूं और धान की पैदावार करने वाले किसानों को लाभ होता है, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हें ही खरीदा जाता है.

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2005 से 2015 के बीच, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में धान और गेहूं के लिए एमएसपी दोगुनी से ज्यादा बढ़ाई गई. यूपीए सरकार में धान पर एमएसपी 143 फीसदी और गेहूं पर 127 फीसदी बढ़ोतरी हुई थी. इसी बीच सरसों में 82 फीसदी की तेजी हुई थी.

वहीं, 2015 से 2024 के दौरान बीजेपी सरकार में एमएसपी में उतनी तेजी नहीं आई. धान के लिए एमएसपी 60 फीसदी और गेहूं के लिए 57 फीसदी तक बढ़ी. सरसों का एमएसपी 82 फीसदी तक बढ़ी.

यूपीए सरकार में मूंग की फसल के लिए एमएसपी में 227 फीसदी की बढ़ोतरी हुई तो वहीं एनडीए सरकार में 86 फीसदी बढ़ी.

इतना ही नहीं, आंकड़े भारत में धान की खरीद और एमएसपी भुगतान के अंतर का भी खुलासा करते हैं. धान के बाजार में पंजाब का दबदबा रहा है. पंजाब के किसानों से सरकार ने 182.11 लाख मीट्रिक धान खरीदा और इसके लिए 37,514 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान एमएसपी के जरिए किया. वहीं, गुजरात और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में सबसे कम खरीद हुई.

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सीएसीपी की सिफारिशों के आधार पर सरकार हर फसल की एक एमएसपी तय करती है. इससे किसानों को एक तरह से कमाई का भरोसा मिलता है. उन्हें उम्मीद होती है कि उनकी फसल के लिए एक गारंटीड कीमत जरूर मिलेगी. 

एमएसपी के जरिए सरकार जो अनाज खरीदती है, उसे पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम के जरिए आम जनता को सब्सिडाइज्ड रेट में बांटती है. इसके लिए लोगों से बहुत कम पैसे लिए जाते हैं. साथ ही इससे सरकार का खाद्य भंडार भी बढ़ता है.

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