Farmers Protets: किसान और सरकार फिर आमने-सामने हैं. एमएसपी की लीगल गारंटी समेत कई मांगों को लेकर किसान फिर सड़कों पर उतर आए हैं.
इस बीच रविवार को किसान नेताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों के बीच चौथे राउंड की बातचीत हुई. इस बैठक में कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय मौजूद थे.
इससे पहले केंद्र और किसानों के बीच 8, 12 और 15 फरवरी को भी बातचीत हुई थी. अब तक की बैठकें बेनतीजा ही रही हैं. हालांकि, रविवार को हुई चौथी बैठक में सरकार ने किसानों के सामने एक नया प्रस्ताव या यूं कहें कि 'फॉर्मूला' दिया है.
सरकार के इस प्रस्ताव को किसानों ने खारिज कर दिया है. किसान नेताओं का कहना है कि सरकार ने जो प्रस्ताव दिया था, उसका नाप-तोल किया जाए तो उसमें कुछ भी नहीं है. सरकार के इस प्रस्ताव को लेकर किसान नेताओं ने सोमवार को शंभू बॉर्डर पर बैठक की थी.
क्या था सरकार का वो फॉर्मूला?
चार घंटे तक चली रविवार की बैठक केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने 'सकारात्मक' बताया. उन्होंने बताया कि सरकार ने किसानों के सामने MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर एक नया प्रस्ताव रखा है.
पीयूष गोयल के मुताबिक, किसानों के सामने प्रस्ताव रखा गया है कि सरकारी एजेंसियां एमएसपी पर किसानों से दालें, मक्का और कपास खरीदेंगी. ये खरीद अगले पांच साल तक होगी.
उन्होंने बताया कि नेशनल कोऑपरेटिव कन्ज्यूमर फेडरेशन (NCCF) या नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (NAFED) जैसी कोऑपरेटिव सोसाइटियां पांच साल के लिए किसानों के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट करेंगी.
ये कॉन्ट्रैक्ट उन किसानों के साथ होगा, जो दाल और मक्का की फसल उगाते हैं. सरकारी एजेंसियां किसानों से अगले पांच साल तक एमएसपी पर दालें और मक्का खरीदेंगी.
इसके अलावा ये भी प्रस्ताव रखा गया है कि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के जरिए पांच साल तक एमएसपी पर कपास खरीदा जाएगा.
खरीद की कोई सीमा नहीं होगी
किसानों का गुस्सा शांत करने के लिए केंद्र सरकार ने जो प्रस्ताव रखा है, उसकी खास बात ये है कि इस समझौते के तहत खरीद की कोई सीमा नहीं होगी.
पीयूष गोयल ने बताया कि दालें और मक्का की खरीद की कोई सीमा नहीं होगी. यानी, सरकारी एजेंसियां जितना चाहें उतनी खरीद कर सकती हैं. इसके साथ ही इस सबके लिए एक पोर्टल भी बनाया जाएगा.
उन्होंने बताया कि इससे पंजाब की खेती बचेगी और भूमिगत जल स्तर में भी सुधार होगा. साथ ही साथ पहले से बंजर हो रही जमीन को बचाया जा सकेगा.
पहले कहा था- विचार करेंगे
किसान नेताओं ने सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. हालांकि, रविवार को बैठक के बाद किसानों का कहना था कि वो सरकार के इस प्रस्ताव पर सोच-विचार करेंगे.
सोमवार को किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने बताया कि सरकार के प्रस्ताव पर किसानों के साथ चर्चा की जाएगी. हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि एमएसपी की लीगल गारंटी की मांग से पीछे नहीं हटा जाएगा.
पंढेर ने न्यूज एजेंसी से कहा, किसानों के साथ इस प्रस्ताव पर चर्चा की जाएगी. साथ ही कृषि एक्सपर्ट और लीगल एक्सपर्ट से भी चर्चा करेंगे और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा.
वहीं, एक और किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने कहा, हम अपने आसपास के लोगों से सरकार के प्रस्ताव पर चर्चा करेंगे और फिर किसी नतीजे पर पहुंचेंगे. जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जाती, तब तक 'दिल्ली चलो मार्च' जारी रहेगा.
किसान क्या मांग रहे?
किसानों की सबसे बड़ी मांग एमएसपी पर कानूनी गारंटी की है. किसानों का कहना है कि सरकार एमएसपी पर कानून लेकर आए. किसान एमएसपी पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग भी कर रहे हैं.
किसान संगठनों का दावा है कि सरकार ने उनसे एमएसपी की गारंटी पर कानून लाने का वादा किया था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो सका.
स्वामीनाथन आयोग ने किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना कीमत देने की सिफारिश की थी. आयोग की रिपोर्ट को आए 18 साल का वक्त गुजर गया है, लेकिन एमएसपी पर सिफारिशों को अब तक लागू नहीं किया गया है. और किसानों के बार-बार आंदोलन करने की एक बड़ी वजह भी यही है.
इसके अलावा किसान पेंशन, कर्जमाफी, बिजली टैरिफ में बढ़ोतरी न करने, लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ित किसानों पर दर्ज केस वापस लेने की मांग भी कर रहे हैं.
MSP क्या है?
किसी फसल पर एमएसपी कितनी होगी, उसे कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस (CACP) तय करती है. सीएसीपी अभी 23 तरह की फसलों पर एमएसपी तय करती है. इसमें गन्ने की खरीद सरकार नहीं करती है. गन्ने की खरीद शुगर मिलें करतीं हैं.
एमएसपी एक तरह से फसल की गारंटीड कीमत होती है, जो किसानों को मिलती है. भले ही बाजार में उस फसल की कीमत कम ही क्यों न हों. ऐसा इसलिए ताकि बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर न पड़े.
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 में करीब 1,063 लाख टन अनाज की खरीद एमएसपी पर की गई थी. जबकि, 2014-15 में 761 लाख टन की खरीद हुई थी. इस दौरान एमएसपी पर सरकार का खर्च भी लगभग दोगुना हो गया है. 2014-15 में सरकार ने एमएसपी पर फसल खरीदने पर 1.06 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए थे. 2022-23 में 2.28 लाख करोड़ रुपये का खर्च हुआ था.