प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के नेता और खालिस्तानी अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नू का एक वीडियो आया हुआ है, जिसमें वो देश के बाल्कनाइजेशन की बात कर रहा है. ये वीडियो कनाडियन नेता डेविस मॉरिसन की उस बात का जवाब माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने भारत की अखंडता पर जोर दिया था. लेकिन बाल्कनाइजेशन क्या है?
क्या है बाल्कनाइजेशन
सिख फॉर जस्टिस संगठन की नींव रखने वाला पन्नू आएदिन कोई न कोई भड़काऊ बयान देता रहता है. इस कड़ी में उसने एक टर्म इस्तेमाल किया- बाल्कनाइजेशन. यह एक राजनैतिक शब्द है, जो तब उपयोग किया जाता है, जब किसी देश के छोटे-छोटे या कई टुकड़े हो जाएं. ये बंटवारा भाषा, रंग, तौर-तरीकों या विचारधारा, किसी भी आधार पर हो सकता है. ये वो हिस्से होते हैं जो विभाजन के बाद भी आपस में दुश्मनी रखते हैं और एक-दूसरे के क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करते रहते हैं.
इस शब्द का चलन बाल्कन क्षेत्र से शुरू हुआ, जहां 19वीं और 20वीं सदी के दौरान ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद पूरा प्रायद्वीप कई छोटे-छोटे देशों में बंट गया और उनके बीच राजनैतिक संघर्ष और तनाव बढ़ने लगा. ये पहले विश्व युद्ध से कुछ पहले शुरू हुआ.
बाल्कन क्षेत्र के नाम पर आया शब्द
बाल्कन क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी यूरोप का एक हिस्सा है. तीन तरफ पानी से घिरा होने की वजह से इसे प्रायद्वीप भी कहते हैं. इसमें अल्बानिया, बुल्गेरिया. क्रोएशिया, ग्रीस, उत्तर मैसेडोनिया, बोस्निया, सर्बिया और रोमानिया जैसे देश आते हैं. लंबे समय तक इसपर ऑटोमन एंपायर का राज रहा लेकिन साल 1817 से लेकर 1912 तक कई संघर्ष और विवाद हुए, जिससे ये छोटे-छोटे कई देशों में बंटता चला गया. ये सभी भाषा या कल्चर के आधार पर एक-दूसरे के बैर रखते थे.
यूगोस्लाविया के हुए कई हिस्से
यहां की सबसे बड़ी लड़ाइयों में एक थी यूगोस्लाविया की जंग. ये नब्बे के दशक से लेकर साल 2001 तक चली. यूगोस्लाविया में एक कई एथनिक समूह और प्रांत शामिल थे, जैसे सर्बिया, बोस्निया और क्रोएशिया. अस्सी के दशक में वहां के लीडर जोसिप ब्रोज टीटो की मौत के बाद रिपब्लिक ऑफ यूगोस्लाविया कमजोर पड़ने लगा और अलग-अलग हिस्से आजादी मांगने लगे. बोस्निया युद्ध के दौरान एथनिक क्लींजिंग जैसे भयावह घटनाएं भी हुईं. इस दौरान सर्ब्स ने बोस्नियाई मुसलमानों का नरसंहार किया था. बाद में इंटरनेशनल ताकतों के दखल के बाद शांति आ सकी लेकिन बाल्कन कई देशों में बंट चुका था.
अकेले बाल्कन नहीं, कई देशों में घट-बढ़ हुई
पचास के दशक में अफ्रीका के साथ भी यही हुआ. यहां कई राज्य और कल्चर मिलकर रहते. उनमें घाना, माली और जुलू एंपायर थे. ये भाषा और बोली में अलग होकर भी साथ बने हुए थे. हालांकि बीच-बीच में उनमें संघर्ष होता रहता था. 19वीं सदी के आखिर में पश्चिमी देश इसपर कब्जा करने की होड़ में लग गए. बर्लिन सम्मेलन के दौरान यूरोपियन ताकतों ने अफ्रीका के बंटवारे का फैसला किया और नक्शा भी बना लिया, जिसमें अफ्रीकी नेताओं की कोई रजामंदी नहीं थी. राजनैतिक और जातीय अलगाव की परवाह किए बगैर अफ्रीका का बंटवारा कर दिया गया. इससे दो अलग-अलग सोच-समझ वाले समूह एक देश में आ गए.
कॉलोनाइजेशन खत्म होने के बाद जब अफ्रीकी देश आजाद हुए तब बाल्कनाइजेशन का असर काफी गहरा दिखने लगा. चूंकि देशों की सीमाएं यूरोपियन ताकतों की तय की हुई थीं, न कि उनकी जातीय या सांस्कृतिक व्यवस्था पर, लिहाजा संघर्ष अब भी जारी है. बता दें कि अफ्रीका के कई देशों में लंबे समय से गृह युद्ध ही चला आ रहा है, जो इसी लापरवाह बंटवारे का नतीजा है.
सोवियत संघ भी इसका उदाहरण है. साल 1991 में ये कई हिस्सों में बंट गया. लेकिन शांति तब भी नहीं आई. बाल्कनाइजेशन के बाद ये पैटर्न है. कल्चर या बोली या राजनैतिक सोच को लेकर बंटने के बाद भी नए बने देश अस्थिर ही रहते हैं. जैसे लिथुआनिया, एस्टोनिया, बेलारूस और यूक्रेन में भी भीतर-भीतर असंतोष पल रहा है, यहां तक कि कई अलगाववादी गुट भी बन चुके हैं.
पन्नू समेत उसका संगठन भी प्रतिबंधित
अब बात करें पन्नू की, जिसके ये टर्म इस्तेमाल की, तो सिख फॉर जस्टिस के जरिए ये शख्स लगातार देश में अलगाववादी सोच को उकसाता रहा. खालिस्तान के नाम पर लोगों को भड़काने की वजह से पन्नू को भारत आतंकवादी मानता है. उसपर अलगाववाद को बढ़ावा देने और पंजाबी सिख युवाओं को हथियार उठाने के लिए उकसाने का आरोप लगा. साल 2020 में अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) के तहत उसे आतंकी घोषित किया गया. चूंकि सिख फॉर जस्टिस की विचारधारा भी वही है इसलिए उसे भी प्रतिबंधित कर दिया गया. इसी के साथ-साथ एसएफजे का कंटेंट बनाने-दिखाने वाले कई यूट्यूब चैनलों पर भी प्रतिबंध लग गया. पन्नू अब भगौड़ा है और अमेरिका में पनाह ली हुई है, साथ ही उसके पास कनाडा की भी नागरिकता है.