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हरियाणा ने चौंका दिया. एक बार फिर एग्जिट पोल गलत साबित हुए. एग्जिट पोल कांग्रेस की वापसी और बीजेपी की विदाई का अनुमान लगा रहे थे. लेकिन न तो कांग्रेस वापसी कर पाई और न ही बीजेपी की विदाई. बीजेपी ने इस बार विधानसभा की 90 में से 48 सीटें जीत लीं. हरियाणा में बीजेपी का ये अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. 2014 में पार्टी ने 47 और 2019 में 40 सीटें जीती थीं.
मगर हरियाणा में बीजेपी की इस जीत का फैक्टर क्या रहा? वैसे तो इस जीत के कई फैक्टर रहे. लेकिन माना जा रहा है कि बीजेपी के लिए कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा ट्रंप कार्ड साबित हुईं.
पर वो कैसे?
दरअसल, कुमारी सैलजा दलित समुदाय से आती हैं. सैलजा विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थीं, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें लड़ने नहीं दिया. टिकटों के बंटवारे में भी सैलजा के मुकाबले भूपेंद्र हुड्डा को तरजीह दी गई.
माना जाता है कि 90 में 70 से ज्यादा उम्मीदवार हुड्डा की पसंद के थे. जबकि, सैलजा ने भी अपने 30 से 35 समर्थकों के लिए टिकट मांगी थी.
इसी बीच कुमारी सैलजा पर एक कांग्रेस कार्यकर्ता की अभद्र टिप्पणी भी सामने आ गई. सैलजा पर टिप्पणी करने वाला कांग्रेस कार्यकर्ता हुड्डा खेमे का माना जाता है. बाद में हुड्डा ने सैलजा को अपनी बड़ी बहन जरूर बताया, लेकिन बीजेपी ने इसे दलित अपमान से जोड़ दिया. पूर्व सीएम और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने तो सैलजा को बीजेपी में आने तक का ऑफर दे दिया.
भले ही दलित समुदाय में सैलजा की उतनी पैठ न हो, जितनी जाटों में भूपेंद्र हुड्डा की है. फिर भी सैलजा हरियाणा में कांग्रेस का बड़ा दलित चेहरा हैं.
सैलजा विधानसभा टिकट नहीं मिलने से नाराज थीं. दलित समुदाय ने भी सैलजा की इसकी नाराजगी को भांप लिया. यही वजह रही कि इस बार कांग्रेस से दलितों ने मुंह मोड़ लिया.
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बीजेपी को क्या फायदा हुआ?
कांग्रेस से दलितों की नाराजगी का फायदा बीजेपी को इस चुनाव में मिला. अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित 17 सीटों में से बीजेपी ने 8 सीटें जीत लीं. 2019 में बीजेपी ने 5 सीटें जीती थीं.
इस बार बीजेपी ने बावल, बवानी खेड़ा, होडल, पटौदी, इसराना, खारखौड़ा, नरवाना और नीलोखेड़ी सीट पर जीत हासिल की. 2019 में बीजेपी बावल, बवानी खैड़ा, होडल, पटौदी और रतिया सीट ही जीत सकी थी.
कांग्रेस ने कैसे गंवाया मौका?
कांग्रेस ने पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा पर भरोसा रखा. कांग्रेस को उम्मीद थी कि हुड्डा के बूते वो जाटों को लामबंद कर सकेगी. इसके साथ ही कांग्रेस ने जातिगत जनगणना की बात कहकर ओबीसी को भी साधने की कोशिश की. हालांकि, कांग्रेस को इन दोनों से ही कुछ खास चुनावी फायदा नहीं मिला.
हुड्डा हरियाणा में जाटों का बड़ा चेहरा हैं. जाटों की आबादी 27 फीसदी के आसपास है और वो कम से कम 35 सीटों पर निर्णायक की भूमिका में हैं. लेकिन इस बार जाट भी बीजेपी के साथ चले गए. जाट बेल्ट की ज्यादातर सीटें बीजेपी के पास गई.
जाटों के साथ-साथ दलितों का वोट भी बीजेपी को मिला. सैलजा की नाराजगी की वजह से दलित कांग्रेस से नाराज थे और बीजेपी के साथ चले गए.