64 साल की महिला के मस्तिष्क में जिंदा कीड़ा मिलने को दुनिया का पहला मामला बताया जा रहा है. उसमें निमोनिया, पेट दर्द, दस्त, सूखी खांसी, बुखार जैसे लक्षण दिख रहे थे. डॉक्टर साल 2021 से ही उसका स्टेरॉयड से इलाज कर रहे थे. सालभर पहले उसमें डिप्रेशन और भूलने की बीमारी के लक्षण भी दिखने लगे. मस्तिष्क का MRI करने पर ये सारा खुलासा हुआ.
ये सांपों में मिलने वाला कीड़ा था, जो साग-सब्जियों से होते हुए शायद महिला के ब्रेन तक पहुंच गया होगा. माना जा रहा है कि जंगली जानवरों और इंसानों का सीधा संपर्क बढ़ने की वजह से ऐसे अजीब मामले और बढ़ सकते हैं.
कॉकरोच हमारे शरीर के अंदर जाकर घंटों से लेकर दिनों तक जिंदा रह सकते हैं. अक्सर ये कान के रास्ते से प्रवेश करते हैं क्योंकि कान का अंदरुनी हिस्सा नम और अंधेरा होता है, जो इस कीड़े के लिए बिल्कुल मुफीद है.
कॉकरोच कानों के भीतर जाकर खत्म नहीं हो जाते, बल्कि वहां अंडे भी दे सकते हैं. कई बार ये खुले हुए जख्म से होते हुए भी शरीर के भीतर घुस जाते हैं. शुरुआत में मरीज को संबंधित हिस्से में दर्द, सूजन और बेचैनी लगती है. सही समय पर इलाज न मिले तो हालात एनाफिलेक्टिक शॉक तक जा सकते हैं, जो कि जानलेवा है. साल 2019 में चीन से ऐसा ही एक मामला आया था, जिसमें बहुत मुश्किल से मरीज की जान बचाई जा सकी. उसके भीतर कई सारे कॉकरोच मिले थे. अमेरिका और जर्मनी से भी ऐसे केसेस आ चुके हैं.
एक किस्म की छोटी मकड़ी, जिसे ह्यूमन इच माइट कहते हैं, वो भी संक्रमित जानवर या इंसानों से होते हुए स्किन के भीतर घुस सकती है. त्वचा के भीतर ये सुरंग की तरह रास्ता बनाते हुए अंडे भी देती जाती है. अक्सर ये डर रहता है कि स्किन से होकर ये आंखों या ब्रेन तक न पहुंच जाए. वैसे ऐसा मामला अब तक सुनाई नहीं दिया है.
लोआ-लोआ इन्सेक्ट का मामला सबसे खतरनाक है. अफ्रीकी मक्खियों के जरिए ये शरीर के भीतर घुसते हैं और पांच महीनों तक चुपचाप पड़े रहते हैं. इतने समय बाद वे एडल्ट होते और अंडे देना शुरू करते हैं. लोआ-लोआ एक दिन में हजारों अंडे देता है. ये स्किन के भीतर घूमते हैं, यहां तक कि स्किन की ऊपर परत से इन्हें देखा भी जा सकता है. इनकी वजह से लोइएसिस बीमारी होती है, जिसमें आंखों की रोशनी भी जा सकती है.
अमूमन सारे ही इन्सेक्ट कान या नाक के रास्ते से इंसानों के भीतर घर बनाते हैं. कुछ स्किन में पाए जाने वाले रोमछिद्रों के जरिए अंदर जाते हैं. कई बार दुर्घटनावश भी ये भीतर पहुंच जाते हैं, जैसे खांसने या छींकने पर मच्छरों या मक्खियों का गले में चला जाना. या फिर पानी के जरिए कीड़ों का अंदर घुस आना. इसमें डरने की बात नहीं होती क्योंकि गले से होते हुए ये पेट में पहुंचते हैं, जहां एसिड में वे खत्म हो जाते हैं.