जनवरी में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था वो यूरोप की टॉप इकनॉमी बन चुके हैं. ये बात यूं ही नहीं कही गई. खुद यूनाइटेड नेशन्स की संस्था IMF ने माना कि G7 देशों में रूस की अर्थव्यवस्था सबसे बढ़िया रही. यहां बता दें कि G7 देशों में दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क आते हैं. पुतिन ने दावा किया कि उनका देश GDP के मामले में वर्ल्ड के पांच सबसे मजबूत देशों में आ चुका है. लेकिन सवाल ये है कि इतनी रुकावटों के बाद भी पुतिन का देश अमीर कैसे बना हुआ है.
ज्यादातर देशों ने लगाईं कई पाबंदियां
दो साल पहले फरवरी में रूस और यूक्रेन के बीच लड़ाई शुरू हुई. इस दौरान छोटे से लेकर बड़े देशों में रूस को रोकने के लिए उसपर पाबंदियां लगाने की होड़ मच गई. अगले दो सालों में 10 हजार से ज्यादा बैन लग गए. कई देशों ने अपने यहां रूसी प्रॉपर्टी फ्रीज कर दी. कई ने उससे तेल या हथियारों के व्यापार पर अनिश्चित समय के लिए रोक लगा दी. बहुत से देशों ने मिलकर तय किया कि वे रूस के राष्ट्रपति या दूसरे नेताओं को अपने यहां आने नहीं देंगे. ये डिप्लोमेटिक बैन है, जिससे संबंध बुरी तरह प्रभावित होते हैं.
इंटरनेशनल बैन को सीधी लड़ाई से ज्यादा असरदार माना जाता रहा. पाबंदियों से अलग-थलग पड़े देश आमतौर पर कुछ समय में हार मान जाते हैं. ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे गलत काम करने पर समाज में किसी परिवार का हुक्का-पानी बंद करवा दिया जाना. देश भी यही तरीका अपनाते रहे.
रूस पर कितनी तरह के बैन
उसपर अमेरिका समेत बहुतेरे देशों ने ट्रेड एम्बार्गो लगा रखा है. ये सबसे ताकतवर तरीका है. इसमें उस देश के साथ किसी किस्म का व्यापार नहीं होता.
इसी तरह से एसेट फ्रीजिंग भी काम करता है
यूनाइटेड किंगडम ने रूसी बैंकों को अपने फाइनेंशियल सिस्टम से हटा दिया. रूसी बैंक यूके के बैकों से लेनदेन नहीं कर सकते. यहां तक कि आम रूसी नागरिक भी यूके के बैंक से ज्यादा पैसे नहीं निकाल सकते. इससे लोग नाराज होते और अपनी सरकार पर दबाव बनाते हैं.
औद्योगिक घराने भी रुकावटों के शिकार
रूस के बहुत से बिजनेसमैन फिलहाल प्रतिबंधों के शिकार हैं. ये सभी वे लोग हैं, जिनके कारण रूस की इकनॉमी चल रही है, जो वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ जिनके अच्छे रिश्ते हैं. ऐसे में संभावना ये भी है कि शायद उनके प्रेशर में आकर ही पुतिन अपनी सेनाओं को पीछे हटने कह दें. लेकिन इतनी पाबंदियों के बाद भी ऐसा कुछ नहीं हो रहा.
कैसे थमा हुआ है नुकसान
आयात कम होने पर नुकसान की बजाए रूस को कुछ फायदे ही हो रहे हैं, जैसे खाने-पीने की जो चीजें बाहर जाया करती थीं, वो अब घरेलू काम में आ रही हैं. युद्ध के कारण कीमतें वैसे ही बढ़ी हुई हैं. तो इस तरह से रूसी खजाने के पास पैसे आ ही रहे हैं.
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इसके अलावा एक दिलचस्प चीज ये हो रही है कि बड़े ब्रांड्स रूस से हटने को तैयार नहीं. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि लोग भरपूर खर्च कर रहे हैं. ये भी एक वजह है कि ज्यादातर इंटरनेशनल कंपनियां वहां टिकी हुई हैं. वहां के लोगों की पर्चेसिंग पावर अच्छी है, और वे ब्रांड्स पर खर्च भी करते हैं.
सस्ती कीमतों पर खरीदी जा रही कंपनियां
जिन कंपनियों ने वहां से हटने का फैसला लिया, पुतिन और वहां के अमीरों ने उन्हें बहुत सस्ते दामों पर खरीद लिया. जैसे, स्टारबक्स का नाम स्टार्स कॉफी हो चुका, और क्रिस्पी क्रीम नाम की कंपनी ने खुद को क्रंची ड्रीम कहना शुरू कर दिया है. यहां तक कि कई प्राइवेट फर्म्स को खुद सरकार ने खरीद लिया. ये सब औने-पौने दामों पर हुआ.
इसके अलावा जो कंपनियां वहां से एग्जिट कर रही थीं, रूस की सरकार ने उनपर ऐसी शर्तें रखीं, जिससे कंपनियां घाटे में चली जाएं, जबकि रूस के पास भरपूर पैसे आ जाएं. कुल मिलाकर सारा गणित इस तरह रखा गया कि युद्ध और बैन का रूस पर असर नहीं हुआ, बल्कि ये आपदा में अवसर जैसी स्थिति बन गई.
दूसरे देशों के जरिए रूस तक पहुंच रहा कच्चा माल
प्रोडक्ट बनाने के रूस को कच्चे माल की जरूरत पड़ती है. चूंकि देशों ने रूस से अपना व्यापार सीमित कर लिया, तो इसका तोड़ भी पुतिन सरकार ने निकाल लिया. बीते दो सालों के भीतर आर्मेनिया, सर्बिया और कजाकिस्तान जैसे देशों ने यूरोप से सबसे ज्यादा रॉ मटेरियल आयात किया. ऐसा पहले नहीं था. ये आयातित चीजें और कहीं नहीं, बल्कि रूस तक जाती हैं. बता दें कि ये सारे ही देश रूस से अच्छे रिश्ते रखते हैं, या फिर पहले सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके हैं. बदले में उन्हें कोई न कोई डिप्लोमेटिक फायदा मिल रहा है.