दिल्ली पिछले कुछ दिनों से स्मॉग की गहरी चादर में ढंकी हुई है. लगभग सभी इलाकों का AQI खतरे को पार कर चुका है. इस बीच ये सवाल भी उठ रहा है कि क्यों आखिर सर्दियों में ही एयर पॉल्यूशन इतना बढ़ता है कि जानलेवा हो जाता है. ऐसा केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों में है. ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन पहली घटना है, जिसने इसकी तरफ ध्यान खींचा.
लंदन में एयर पॉल्यूशन का असर 19वीं सदी से ही दिखने लगा था, जब तत्कालीन प्रशासन रुक-रुककर कोयला जलाने पर रोक लगाता रहता था. लेकिन 20वीं सदी में लंदन में हुआ हादसा ऐसी घटना बन गया, जिसके बाद ब्रिटेन समेत कई देशों ने सबक लिया. बात 5 दिसंबर की है, जब दिन के समय ही लंदन में घना अंधेरा छाने लगा और कुछ ही देर में आसपास के सारे इलाके इसकी चपेट में आ गए. दफ्तर गए हुए लोग घर लौटने की कोशिश में थे लेकिन रास्ता भटक गए.
विजिबिलिटी इतनी खराब थी कि लोग अपने पैरों तक को नहीं देख पा रहे थे. बहुत से लोग अपनी गाड़ियां सड़कों पर छोड़कर चलने लगे. अंधेरे की वजह से वे रास्ता भटक चुके थे. ठंड से भी कई जानें गईं लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान हुआ स्मॉग की वजह से.
चार से पांच दिन चले स्मॉग के चलते लोग बीमार होने लगे. सांस, बुखार और उल्टियों की समस्या के साथ अस्पतालों के सामने भीड़ जमा होने लगी. हॉस्पिटल इस इमरजेंसी के लिए तैयार नहीं थे, वे उन्हें वापस लौटाने लगे. माना जाता है कि सांस की तकलीफ की वजह से इतने ही दिनों में बारह हजार से ज्यादा मौतें हुईं.
क्या थी स्मॉग की वजह
ठंड में ब्रिटेन में घरों को गर्म रखने के लिए बड़े पैमाने पर कोयला जलता था. कारखाने भी कोयलों से चल रहे थे. इस धुएं से समस्या तो हो रही थी लेकिन ग्रेट स्मॉग की वजह कुछ ज्यादा थी. दरअसल 5 दिसंबर को एक एंटीसाइक्लोन लंदन के ऊपर आ गया. यह मौसम का एक पैटर्न है, जिसमें आसमान साफ रहता है लेकिन जब यह बनता है, तो ठंडी हवा नीचे फंस जाती है और उसके ऊपर गर्म हवा जमा हो जाती है. ये एक तरह से बोतल पर कैप की स्थिति है, जिसके चलते नीचे का लिक्विड या एयर वहीं जमा रह जाए. लंदन में यही हुआ. ठंड से निजात पाने के लिए वहां कोयला जल रहा था, जो ऊपर नहीं जाकर नीचे ही अटका रह गया. यही ग्रेट स्मॉग का कारण बना.
क्या बदलाव हुए इसके बाद
पचास के दशक की घटना के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने क्लीन एयर एक्ट पास किया. इसके तहत घरों में और उद्योगों में कोयला जलाने पर पाबंदी लगा दी गई. साथ ही कई और कदम उठाए गए ताकि स्मॉग की घटना दोबारा न हो. ठीक दस साल बाद लंदन में एक बार फिर वही घटना हुई. इसे भी ग्रेट स्मॉग 1962 नाम दिया गया. हालांकि सरकारी कड़ाई के चलते इस बार कैजुएलिटी हजार मौतों पर जाकर रुक गई.
चाहे लंदन हो, या दुनिया का कोई और हिस्सा, या फिर दिल्ली-एनसीआर- स्मॉग के मामले में ये बात कॉमन है कि यह ठंड में ही दिखता है. ऐसा क्यों है? और क्यों देश का उत्तरी भाग अन्य क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा परेशान होता है?
उत्तर भारत में, मानसून के बाद के महीनों में पॉल्यूशन बढ़ जाता है. इसका एक बड़ा कारण है- विंटर इनवर्जन. आमतौर पर, जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ते हैं, हवा की तापमान में गिरावट होती है, वहीं ठंड में ऊपरी हवा गर्म होती है और नीचे की हवा ठंडी. इससे धुआं, धूल और बाकी गैसें नीचे ही घूमती रह जाती हैं, बजाए ऊपर जाकर जाने के. यही असर स्मॉग के रूप में दिखता है.
लेकिन यहां एक सवाल है. अगर सर्दियों में ये पैटर्न हर जगह बनता है तो दिल्ली-एनसीआर में ही सबसे खराब हाल क्यों होता है?
समंदर के पास बसे शहर, जैसे मुंबई या केरल में समुद्री हवा और नमी प्रदूषण को फैलाने में मदद करती है. वहीं उत्तरी मैदान में, जिसमें पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, एक घाटी की तरह हैं. पॉल्यूटेड हवा यहां जमा हो जाती है और बाहर नहीं निकल पाती. इसी वजह से ठंड में यहां स्मॉग की शक्ल में पॉल्यूशन खुलकर दिखता रहा.
गर्मी के समय भी गाड़ियां, कारखाने वही रहते हैं, लेकिन एयर पॉल्यूशन कम हो जाता है. इस दौरान सूरज की गर्मी से हवा हल्की होकर ऊपर उठ जाती है, जिससे नीचे जमा हो रहे धूल-धुआं को ऊपर जाने के लिए काफी जगह मिल जाती है. यही चीज सर्दियों में भी होती है अगर दिन गर्म हो.