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साल 2020 की 29 फरवरी को कतर की राजधानी दोहा में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ. ये समझौता था अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का.
वैसे तो ये समझौता अमेरिका और तालिबान के बीच हुआ था. लेकिन इसमें वाहवाही लूट ले गया था कतर. वो इसलिए क्योंकि कतर की मध्यस्थता के बाद ही अमेरिका और तालिबान में ये शांति समझौता हो सका था.
इस समझौते के बाद 15 अगस्त 2021 तक अमेरिका की सेना अफगानिस्तान से वापस लौट गई. और उसी दिन से वहां तालिबान का राज शुरू हो गया. हालांकि, ये बात उस समझौते में नहीं थी कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद काबुल की गद्दी पर कौन बैठेगा?
अब यही कतर एक बार फिर मध्यस्थता करा सकता है. इजरायल और हमास के बीच. कतर का कहना है कि वो जल्द ही इजरायल और हमास के बीच मध्यस्थता को लेकर बातचीत शुरू कर सकता है.
कैसी मध्यस्थता...?
सात अक्टूबर की सुबह-सुबह हमास ने गाजा पट्टी से इजरायल पर पांच हजार से ज्यादा रॉकेट दागे. हमास फिलिस्तीन का संगठन है.
रॉकेट दागने के बाद हमास के लड़ाके जमीन, समंदर और आसमान से इजरायल में भी घुस आए. उन्होंने दक्षिणी इजरायल में घुसपैठ कर सैकड़ों इजरायली नागरिकों को बंधक भी बना लिया.
बंधकों को छोड़ने के लिए इजरायल और हमास के बीच बातचीत में कतर मध्यस्थता कर सकता है. सोमवार को न्यूज एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से बताया था कि कतर, इजरायल और हमास के बीच मध्यस्थता करवाने में जुटा है.
सोमवार को ही कतर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल-थानी ने ईरानी विदेश मंत्री होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन से भी बात की थी. इजरायल के खिलाफ जंग में ईरान हमास का समर्थन कर रहा है.
हालांकि, अब कतर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद बिन मोहम्मद अल-अंसारी का कहना है कि इजरायल और हमास के बीच मध्यस्थता की बात करना अभी जल्दबाजी होगी.
क्या कतर ऐसा कर पाएगा?
बीते कुछ सालों में कतर एक मजबूत 'मध्यस्थ' बनकर उभरा है. कतर की इस मजबूती का अंदाजा तालिबान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते से लगाया जा सकता है.
अफगानिस्तान में साल 2001 से ही तालिबान और अमेरिका के बीच संघर्ष चल रहा था. लगभग 20 साल तक तालिबान और अमेरिका में बातचीत होती रही. लेकिन ये बातचीत 2020 में तब सफल हुई, जब कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हुआ.
इस शांति समझौते में कतर ने अहम भूमिका निभाई थी. साल 2013 में कतर ने ही पहली बार तालिबान को दोहा में अपना कार्यालय खोलने की इजाजत दी थी. तालिबान के बड़े नेता कतर में ही रहते थे.
2018 में ट्रम्प सरकार ने दोहा में ही तालिबान के प्रतिनिधियों से बातचीत शुरू की थी. इस बातचीत में अफगानिस्तान की सरकार को शामिल नहीं किया गया था.
विशेषज्ञों का मानना था कि तालिबान और अमेरिका के बीच 'मध्यस्थता' की भूमिका निभाना कतर के लिए एक बड़ा दांव था, लेकिन उसे इसका फल मिला. इसने कतर का पश्चिम एशिया में कद बढ़ा दिया था.
पहले भी करा चुका है मध्यस्थता
साल 2008 में कतर ने यमन की सरकार और हूती विद्रोहियों के बीच भी मध्यस्थता करवाई थी. ये बात अलग है कि दोनों के बीच अभी भी जंग जारी है.
उसी साल लेबनान में भी कतर ने युद्धरत गुटों के बीच मध्यस्थता करवाई थी. इसके एक साल बाद ही वहां गठबंधन की सरकार बनी.
साल 2009 में सूडान और चाड के बीच भी बातचीत करवाई. जब जिबूती और इरिट्रिया के बीच सशस्त्र संघर्ष शुरू हुआ तो 2010 में कतर उनके बीच भी मध्यस्थ बनने के लिए राजी हो गया.
साल 2011 में वो कतर ही था जिसने सूडान की सरकार और विद्रोही समूह लिबरेशन एंड जस्टिस मूवमेंट के बीच समझौता करवाया. इसे दोहा समझौता भी कहा जाता है.
इतना ही नहीं, 2012 में हमास और फतह समूहों के बीच भी समझौता करवाने में अहम भूमिका भी थी. इस समझौते पर भी दोहा में ही हस्ताक्षर हुए थे. इसके बाद ही फिलिस्तीन के वेस्ट बैंक में अंतरिम सरकार बन सकी थी.
पर कतर इतना पावरफुल कैसे बना?
दुनिया के नक्शे में अगर कतर को देखेंगे तो ये बहुत ही छोटा दिखेगा. कतर महज साढ़े 11 हजार वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है. इसकी आबादी भी 27 लाख के आसपास ही है.
एक समय था जब खाड़ी देशों में कतर सबसे गरीब मुल्क हुआ करता था. लेकिन आज कतर खाड़ी देशों की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. वो इसलिए क्योंकि कतर ने अपने गैस भंडार से होने वाली कमाई का इस्तेमाल अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया.
कतर ने इस कमाई को दूसरी जगह निवेश किया. खासकर अमेरिका और यूरोपीय देशों में. सबसे पहले कतर ने ब्रिटेन में निवेश किया था. ब्रिटेन में कतर ने 40 अरब डॉलर निवेश कर कई संपत्तियां खरीदी थीं. इतना ही नहीं, कतर के नागरिक भी ब्रिटेन में कई संपत्तियों के मालिक हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, कतर नागरिकों ने वहां इतनी संपत्तियां खरीदी हैं कि वो ब्रिटेन का दसवां सबसे बड़ा जमींदार है.
इतना ही नहीं, कतर ने ब्रिटेन की कई नामी-गिरामी कंपनियों में भी निवेश कर रखा है. लंदन स्टॉक एक्सचेंज में भी कतर का निवेश है. ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की रिपोर्ट बताती है कि 2022 के 10 महीनों में ही यूके की कंपनियों से निवेश के जरिए कतर ने 54.5 करोड़ डॉलर का डिविडेंड्स लिया था.
सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई देशों में भी उसने भारी-भरकम पैसा लगाया है. फ्रांस में 27 तो जर्मनी में 24 अरब डॉलर का निवेश किया है. इसके अलावा कई यूरोपीय देशों के फुटबॉल क्लबों और होटलों में भी पैसा लगाया.
कतर ने अमेरिका के न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन में भी कई संपत्तियां खरीदी हैं. वहां की भी कई बड़ी कंपनियों में निवेश किया है. अमेरिका और यूरोप के अलावा एशिया और सब-सहारा देशों में भी कतर का पैसा लगा है.
इतना पैसा लगाकर कतर ने अपनी 'सॉफ्ट इमेज' बना ली है. ब्रिटेन और अमेरिका जैसे ताकतवर देशों के साथ दोस्ती बढ़ाई. कतर में अल-अदीद एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिका और ब्रिटेन की सेना कर रही है.
इसके अलावा कतर को इतना पावरफुल बनाने में अल-जजीरा का भी बड़ा रोल रहा है. कतर ने अल-जजीरा जैसा मीडिया का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया है. अल-जजीरा के माध्यम से कतर ने क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ा ली. यही वजह है कि साल 2017 में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और बहरीन ने अल-जजीरा के जरिए क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाते हुए उसके साथ संबंध तोड़ दिए थे. हालांकि, बाद में रिश्ते बन तो गए लेकिन खटास बनी रही.
ये कतर की बदलती छवि ही थी कि साल 2022 में फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी उसे मिली. फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी करने वाला कतर पहला अरब और मुस्लिम-बहुल देश है.
और क्या-क्या किया?
शायद कतर ने इस बात को काफी पहले महसूस कर लिया था कि राजनेताओं और तानाशाहों की बजाय इस्लामी चरमपंथियों से बात करना ज्यादा आसान और फायदेमंद है.
इसलिए कतर ने हमेशा तालिबान, अलकायदा, आईएसआईएस, हमास, हिज्बुल्लाह और इख्वान-उल-मुस्लिमून जैसे आतंकी संगठनों से अच्छे संबंध बनाकर रखे हैं.
जानकार मानते हैं कि कतर अब एक 'पुल' की तरह बन गया है. एक ओर अंतरराष्ट्रीय ताकतें हैं तो दूसरी ओर तालिबान-हमास जैसे संगठन और बीच में कतर. यानी, अब अगर किसी को भी तालिबान या हमास जैसे संगठनों से बात करनी है तो पहले कतर से बात करनी होगी.
2017 में सऊदी अरब ने कतर को कट्टरपंथी और इस्लामिक चरमपंथी संगठनों का साथ ने देने को कहा था. तब कतर का कहना था कि ये उसकी स्वतंत्र नीति का हिस्सा है और वो आतंकवाद का समर्थन नहीं करता.