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जैन धर्म में किस आधार पर चुने जाते हैं गुरु, कितनी शक्ति होती है पद में, कितने मुश्किल नियम- जानिए सब कुछ

मध्यप्रदेश के कुंडलपुर तीर्थ में जैन मुनि समय सागर महाराज नए आचार्य बनाए गए. वे आचार्य विद्यासागर के उत्तराधिकारी हैं, जिन्होंने समाधि से पहले अपनी सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी. जैन धर्म में कई नियम हैं, जिनका पालन काफी मुश्किल है. ऐसे में उनके लीडर का जीवन तो और भी कठिन होगा. जानिए, कैसा होता है जैन आचार्यों का जीवन, और कैसे चुने जाते हैं वे.

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जैन धर्म अहिंसा पर आधारित है. (Photo- Getty Images)
जैन धर्म अहिंसा पर आधारित है. (Photo- Getty Images)

जैन धर्म के अगले संत शिरोमणि आचार्य समय सागर जी महाराज हैं. लगभग 65 साल के आचार्य कर्नाटक के बेलगाम से हैं, जो अब पूरे जैन धर्म को रास्ता बताएंगे. उनका चुनाव पूर्व आचार्य विद्यासागर जी ने किया, जो उनके सगे भाई भी थे. लेकिन ये जरूरी नहीं कि गुरु और उनके उत्तराधिकारी में कोई रिश्ता हो ही. वे योग्यता के आधार पर चुने जाते हैं, जो उनके तजुर्बे और ज्ञान से तय होता है. 

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पहले नए आचार्य के बारे में जानते चलें

27 अक्टूबर को कर्नाटक में जन्मे समय सागर जी 6 भाई-बहनों के परिवार में सबसे छोटे थे. उनके बड़े भाई विद्यासागर जी ने दीक्षा ली, जिसके कुछ ही सालों बाद लगभग पूरा परिवार संन्यास की तरफ बढ़ गया. समय सागर जी भी उनमें शामिल थे. माता-पिता और दो बहनें भी दीक्षा ले चुके हैं. फिलहाल आचार्य पद संभालने जा रहे दिगंबर जैन संत समय सागर जी को कन्नड़, हिंदी, संस्कृत, मराठी भाषाओं का ज्ञान है. वे कई रचनाएं भी कर चुके. 

वरिष्ठता पर होता है चुनाव

दीक्षा के आधार पर सबसे सीनियर को चुना जाता है. विद्यासागर के बाद समय सागर जी सबसे ऊपर थे. इस बारे में जानकारी देते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर टीके जैन कहते हैं- लोग इसे परिवारवाद से भी जोड़ सकते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं. समय सागर जी दीक्षा के मामले में सीनियर मोस्ट थे, इसलिए उन्हें चुना गया. ये चयन भी अकेले विद्यासागर जी ने नहीं किया, बल्कि पूरे संघ की सहमति से हुआ. 

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jain muni samay sagar ji maharaj successor of vidyasagar maharaj photo Fb

संघ क्या होता है

पूरे देश में दिगंबर संप्रदाय में जैनियों के कई संघ हैं. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि देश एक है लेकिन कई राजनैतिक पार्टियां हैं. ये छोटी-बड़ी सब तरह की है और अलग विचारधारा पर चलती हैं. ऐसा ही संघ के साथ है. कई मुनि आपस में मिलकर एक संघ बना लेते हैं. कई बार ये भी होता है कि पांच-दस मुनियों ने संघ बना लिया. उसी में गुरु घोषित हो गया. लेकिन आचार्य विद्यासागर का संघ सर्वमान्य है. इसमें 5 सौ के करीब दिगंबर जैन मुनि हैं.

इनकी चर्या यानी कोड ऑफ कंडक्ट भी काफी पक्का है. ये मुनि वही करते हैं, जो ग्रंथों में लिखा हो, फिर चाहे उसका पालन कितना ही मुश्किल क्यों न हो. दूसरे संघ में थोड़ी-बहुत छूट भी ले ली जाती है. गुरु निश्चित करता है कि लोग चर्या को मानें. वो धर्म पर लेखन भी करता है. आमतौर पर मुनि कई भाषाएं जानते हैं, और उन्हीं भाषाओं में लिखते भी हैं ताकि देश के हर हिस्से तक बात पहुंच सके. 

क्या चुने हुए आचार्य के पास ताकत भी होती है, जैसे बाकी संप्रदायों या मठों में दिखती है?

जैन धर्म तो अहिंसा और त्याग से जुड़ा है. इसमें आचार्य के पास मॉनिटरी शक्ति बिल्कुल नहीं होती. वो एक जगह नहीं रहता, लगातार पैदल यात्रा करता रहता है. खाने के भी नियम हैं. और वो वस्त्रों तक का त्याग कर चुका होता है. ऐसे में पैसों की ताकत जैसा कोई सवाल नहीं. लेकिन उसके पास आध्यात्मिक ताकत होती है. यही ताकत धर्म के बाकी लोगों पर असर करती है. अगर आचार्य कोई अपील करें तो शायद ही कोई हो, जो न माने.  

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jain muni samay sagar ji maharaj successor of vidyasagar maharaj photo Getty Images

जैन मुनियों का जीवन नियमों से बंधा होता है. मुनि उन्हें कहते हैं जिन्होंने संन्यास लिया हो. साथ ही उन्हें निर्ग्रन्थ भी कहा जाता है. वहीं महिला संन्यासिनों के लिए आर्यिका शब्द का प्रयोग होता है. जैन धर्म में दिगंबर और श्वेतांबर दो संप्रदाय हैं. श्वेतांबर सफेद कपड़े पहनते और सफेद कपड़ों से ही मुंह ढांकते हैं, ताकि कोई हिंसा न हो. वहीं दिगंबर का मतलब है, दिशाएं ही जिनका अंबर यानी वस्त्र हो. वे केवल कमंडल और शास्त्र ही रख सकते हैं.

बहुत मुश्किल है केश हटाने की प्रक्रिया

इनका पूरा जीवन इसके आसपास चलता है कि छोटे से छोटे जीव-जंतु पर भी कोई हिंसा न हो. साथ ही किसी भी तरह का सौंदर्य या मोह न बचे. इसके लिए केश लोंचन अनिवार्य है. दिगंबर मुनि एक निश्चित समय के बाद सिर या दाढ़ी-मूंछ के बालों को हाथों से अलग करते हैं. इस दौरान उनकी आंखों में आंसू भी नहीं आना चाहिए वरना प्रक्रिया बेकार मानी जाएगी. ये केश लोंच हर 2 से 4 महीने के अंतराल पर होता है. जिन रोज ये प्रक्रिया होती है, उस दिन मुनि व्रत करते हैं. ये इसलिए कि केश हटाने के दौरान वहां पहले जिन जीवों का नुकसान हुआ हो, उसका प्रायश्चित हो सके. 

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jain muni samay sagar ji maharaj successor of vidyasagar maharaj photo AFP

किस तरह का होता है इनका जीवन

वस्त्रत्याग दिगंबर मुनियों की बड़ी साधना है. वे मानते हैं कि जब मनुष्य बिना वस्त्रों के जन्मा है तो उसकी जरूरत क्यों. एक कारण ये भी बताया जाता है कि वस्त्र पहनने से साधना में रुकावट आती है. ये वस्त्र किसी से लेने होंगे. साथ ही उन्हें समय-समय पर साफ भी करना होगा. इससे जीव हिंसा का डर बढ़ जाता है. ये भी डर रहता है कि वस्त्रों से जमा करने या सौंदर्य के लिए लोभ आ जाए. अहिंसा के लिए ही वे स्नान को भी टालते हैं. 

ऐसी हर चीज जो आम लोगों के लिए जरूरी हैं, ये मुनि त्याग चुके होते हैं. जैसे वे चप्पलें नहीं पहनते चाहे कितनी ही सर्दी या गर्मी हो. वे जमीन या लकड़ी के तख्त पर सोते हैं. सूर्यास्त से पहले ही भोजन करते हैं, वो भी सात्विक. आलू-प्याज या किसी भी कंद का खाना वर्जित है. ज्‍यादातर जैन मुनि एक बार ही भोजन ग्रहण करते हैं, वह भी खड़े-खड़े ही.

कई संघ ऐसे हैं जो केवल एक पात्र में लोगों से भिक्षा लेकर खाना खाते हैं. ये पका हुआ भोजन होता है, जो मीठा-नमकीन कुछ भी हो सकता है. ये मिलाजुला भोजन जो हम जैसों के गले भी न उतरे, वही मुनियों का चौबीस घंटों का आहार रहता है. वे लगातार पैदल चलते रहते हैं. सिवाय बारिश के मौसम को छोड़कर. इसका कारण ये बताया जाता है कि इस समय जीव-जंतु जमीन पर घूमते होते हैं. भ्रमण से उनपर हिंसा हो सकती है. इसके अलावा बाकी सारे महीने अधिकतर मुनि देशभर में भ्रमण करते हैं. इसमें गुरु की भूमिका सबसे अहम होती है. वो अपने संघ और बाकी जैनियों को लगातार निर्देश देता है कि वे कैसी जीवनशैली रखें. गुरु जरा भी चूक करे तो जैन संप्रदाय पर असर होगा. इससे उसपर सबसे ज्यादा जिम्मेदारी आ जाती है. 

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