जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है. जम्मू-कश्मीर में तीन चरणों में चुनाव होंगे. पहले चरण में 24 सीटों पर 18 सितंबर, दूसरे चरण में 26 सीटों पर 25 सितंबर और तीसरे चरण में 40 सीटों पर 1 अक्टूबर को वोटिंग होगी. चुनाव के नतीजे 4 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर 2024 तक यहां विधानसभा चुनाव कराने का आदेश दिया था.
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव होगा. घाटी से 5 अगस्त 2019 को 370 को हटा दिया गया था.
10 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव कई मायनों में खास होंगे. 2014 में जब आखिरी बार यहां विधानसभा चुनाव हुए थे, तब से अब तक काफी कुछ चीजें बदल गई हैं. सीटों की संख्या भी पहले से थोड़ी बढ़ गई है. पहले चुनी हुई सरकार ही सबकुछ होती थी, लेकिन अब ज्यादातर शक्तियां उपराज्यपाल के पास होंगी.
ऐसे में जानते हैं कि 10 साल बाद होने जा रहे इस चुनाव में पिछली बार से क्या कुछ अलग होगा? और इस सियासी समीकरण कितने बदल सकते हैं?
कितना बदल गया जम्मू-कश्मीर?
5 अगस्त 2019 को ही जम्मू-कश्मीर काफी बदल गया था. इसके बाद जम्मू-कश्मीर दो हिस्सों में बंट गया. पहला- जम्मू-कश्मीर और दूसरा- लद्दाख. दोनों ही अब केंद्र शासित प्रदेश हैं. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा भी है, जबकि लद्दाख में ऐसा नहीं है.
हालांकि, जम्मू-कश्मीर में विधानसभा भले ही है, लेकिन यहां अब सरकार पहले जैसी नहीं रहेगी. पहले जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार ही सबकुछ थी, लेकिन अब उपराज्यपाल सबसे ऊपर होंगे.
पुलिस, जमीन और पब्लिक ऑर्डर पर उपराज्यपाल का अधिकार होगा. जबकि, बाकी सभी मामलों पर चुनी हुई सरकार फैसला कर सकेगी. हालांकि, उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी होगी.
सीटों की संख्या कितनी बदली?
- पहलेः जम्मू-कश्मीर में कुल 111 सीटें थीं. जम्मू में 37, कश्मीर में 46 और लद्दाख में 4 सीटें थीं. पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में 24 सीटें होती थीं.
- अबः जम्मू में अब 43 तो कश्मीर में 47 सीटें होंगी. पीओके के लिए 24 सीटें ही रिजर्व हैं. यहां चुनाव नहीं कराए जा सकते. जबकि लद्दाख में विधानसभा ही नहीं है. इस तरह से कुल 114 सीटें हैं, जिनमें से 90 पर चुनाव कराए जाएंगे.
कहां कितनी सीटें बढ़ीं?
जम्मू रीजन में सांबा, कठुआ, राजौरी, किश्तवाड़, डोडा और उधमपुर में एक-एक सीट बढ़ाई गई है. वहीं, कश्मीर रीजन में कुपवाड़ा जिले में एक सीट बढ़ाई गई है.
जम्मू के सांबा में रामगढ़, कठुआ में जसरोता, राजौरी में थन्नामंडी, किश्तवाड़ में पड्डेर-नागसेनी, डोडा में डोडा पश्चिम और उधमपुर में रामनगर सीट नई जोड़ी गईं हैं.
वहीं, कश्मीर रीजन में कुपवाड़ा जिले में ही एक सीट बढ़ाई गई है. कुपवाड़ा में त्रेहगाम नई सीट होगी. अब कुपवाड़ा में 5 की बजाय 6 सीटें होंगी.
कश्मीरी पंडितों के लिए क्या?
कश्मीरी पंडितों के लिए दो सीटें रिजर्व रखी गई हैं. हालांकि, इन्हें कश्मीरी प्रवासी कहा गया है. अब उपराज्यपाल विधानसभा के लिए तीन सदस्यों को नामित कर सकेंगे, जिनमें से दो कश्मीरी प्रवासी और एक पीओके से विस्थापित व्यक्ति होगा. जिन दो कश्मीरी प्रवासियों को नामित किया जाएगा, उनमें से एक महिला होगी.
कश्मीरी प्रवासी उसे माना जाएगा जिसने 1 नवंबर 1989 के बाद घाटी या जम्मू-कश्मीर के किसी भी हिस्से से पलायन किया हो और उसका नाम रिलीफ कमीशन में रजिस्टर हो. वहीं, जो भी व्यक्ति 1947-48, 1965 या 1971 के बाद पीओके से आया होगा, उसे विस्थापित माना जाएगा.
इस हिसाब से कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 93 सीटें होंगी. लेकिन चुनाव 90 सीटों के लिए ही होंगे. ये पुडुचेरी वाला फॉर्मूला ही है. पुडुचेरी में कुल 33 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 30 पर चुनाव जनता करती है, जबकि बाकी की 3 सीटों पर केंद्र सरकार नामित करती है.
इसके साथ ही अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 16 सीटें रिजर्व की हैं. इनमें से एससी के लिए 7 और एसटी के लिए 9 सीटें रखी गईं हैं.
सियासत कितनी बदली?
अब जम्मू-कश्मीर की सियासत भी काफी बदल गई है. पुराने जम्मू-कश्मीर में जम्मू में 37 और कश्मीर में 46 सीटें होती थीं. लिहाजा, कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद सरकार बनाना आसान हो जाता था.
लेकिन अब जम्मू में 43 और कश्मीर में 47 सीटें होंगी. इससे अब सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बल्कि जम्मू में भी ज्यादा सीटें जीतना जरूरी हो गया है. जम्मू हिंदू बहुल तो कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है. जम्मू में 6 सीटें बढ़ने से बीजेपी को फायदा मिलने की उम्मीद है.
2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जम्मू की 25 सीटें (37 में से) जीती थीं. हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी जम्मू की दो सीटों- जम्मू और उधमपुर को जीतने में कामयाब रही है. हालांकि, इन दोनों सीटों पर पिछले चुनाव में भी बीजेपी ही जीती थी.
हालांकि, माना जा रहा है कि कश्मीर में चुनाव काफी दिलचस्प हो सकते हैं. वो इसलिए क्योंकि यहां के लोग 370 हटाए जाने से नाराज हैं. लोकसभा चुनाव में बीजेपी का कश्मीर में चुनाव न लड़ना इसी नाराजगी से जोड़कर देखा गया था. जिस कश्मीर से 370 हटाने के फैसले का बीजेपी ने देशभर में प्रचार किया और इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बताया, उसी कश्मीर से वो चुनावी मैदान से बाहर रही.
ऐसी चर्चाएं हैं कश्मीर में कुछ छोटी-छोटी पार्टियां उभरकर आई हैं. इनमें 'पीपुल्स कॉन्फ्रेंस' और अल्ताफ बुखारी की 'जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी' भी शामिल हैं. दावा किया जाता है कि इन पार्टियों का बीजेपी समर्थन करती है. कश्मीर में वोट काटने और सरकार बनाने के लिए बीजेपी का इन पार्टियों का समर्थन करना भी जरूरी है.
2014 में क्या रहे थे नतीजे?
जम्मू-कश्मीर में आखिरी बार 2014 में विधानसभा चुनाव हुए थे. यहां की 87 सीटों में से पीडीपी ने 28, बीजेपी ने 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 15 और कांग्रेस ने 12 सीटें जीती थीं. बीजेपी और पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाई और मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने.
जनवरी 2016 में मुफ्ती मोहम्मद सईद का निधन हो गया. करीब चार महीने तक राज्यपाल शासन लागू रहा. बाद में उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन ये गठबंधन ज्यादा नहीं चला. 19 जून 2018 को बीजेपी ने पीडीपी से गठबंधन तोड़ लिया. राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया. अभी वहां राष्ट्रपति शासन लागू है.
पिछले साल आर्टिकल-370 को हटाने के फैसले को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर में 30 सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव कराने का आदेश दिया है.