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पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी में सोमवार को एक बड़ा रेल हादसा हो गया था. इस हादसे में 9 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 47 लोग घायल हुए हैं.
हादसा तब हुआ था जब अगरतला से सियालदाह जा रही कंचनजंगा एक्सप्रेस को पीछे से आ रही मालगाड़ी ने टक्कर मार दी थी. हादसे में मालगाड़ी का ड्राइवर (लोको पायलट) और पैसेंजर ट्रेन के गार्ड की भी मौत हो गई है.
जानकारी के मुताबिक, बंगाल के रानीपतरा रेलवे स्टेशन और चत्तर हाट जंक्शन के बीच ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम सोमवार सुबह 5.50 बजे से खराब था. इसी जगह मालगाड़ी ने कंचनजंगा एक्सप्रेस को टक्कर मारी थी.
इस हादसे ने पिछले साल जून में बालासोर में हुए रेल हादसे की यादें ताजा कर दीं. ओडिशा के बालासोर में तीन ट्रेनें टकरा गई थीं. उस हादसे में करीब 300 लोगों की मौत हो गई थी. ऐसे में ग्राफिक्स के जरिए समझते हैं कि न्यू जलपाईगुड़ी में ये हादसा कैसे हुआ?
रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, सियालदाह कंचनजंगा एक्सप्रेस (13174) रविवार शाम को त्रिपुरा के अगरतला के सबरूम रेलवे स्टेशन से कोलकाता के लिए निकली थी.
इस टक्कर में गार्ड वैन और दो पार्सल वैन पटरी से उतर गए. नेशनल ट्रेन इन्क्वायरी सिस्टम के वेबसाइट पर मौजूद डेटा बताता है कि गार्ड वैन सबसे पीछे थी, उसके आगे दो लगेज कोच थे और इसके आगे दो कोच अनारक्षित यात्रियों के लिए थे.
पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के अलुआबारी रोड रेलवे स्टेशन के पास मालगाड़ी के कुछ डिब्बे पटरी पर बिखरे हुए थे.
रेलवे बोर्ड की अध्यक्ष जया वर्मा सिन्हा ने बताया कि मालगाड़ी के ड्राइवर ने रेड सिग्नल को अनदेखा किया, जिसके कारण ये हादसा हुआ. इस हादसे में मालगाड़ी के ड्राइवर की भी मौत हो गई.
हालांकि, बाद में सामने आया कि ऑटोमैटिक सिग्नलिंग सिस्टम फेल हो गया था. इस कारण रंगापानी के स्टेशन मास्टर ने कंचनजंगा एक्सप्रेस को TA-912 नाम का एक लिखित नोट यानी मेमो जारी किया. सुबह 8.20 बजे कंचनजंगा एक्सप्रेस को ये मेमो जारी किया गया था. मालगाड़ी को सुबह 8.35 बजे यही मेमो जारी किया गया था. दोनों ट्रेनों को रंगापानी स्टेशन मास्टर ने TA-912 नोट जारी किया था.
ये नोट सिग्नलिंग सिस्टम काम नहीं करने की स्थिति में लोको पायलट को सभी रेड सिग्नल क्रॉस करने की मंजूरी देता है. अगर मालगाड़ी को ‘टीए 912' नहीं दिया गया था तो चालक को प्रत्येक खराब सिग्नल पर ट्रेन को एक मिनट के लिए रोकना था और 10 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से आगे बढ़ना था. इस नोट में कहा गया है कि लोको पायलट को फाटकों पर नजर रखनी होगी. गेट बंद होने पर ही लोको पायलट ट्रेन को ले जा सकता है. अगर गेट खुला है तो उसे पहले ही ट्रेन रोकनी होगी.
स्पीड में थी मालगाड़ी?
स्थानीयों ने बताया कि मालगाड़ी की स्पीड कहीं ज्यादा थी. एक स्थानीय निवासी का कहना था कि हम लोगों ने देखा कि मालगाड़ी स्पीड में आई और कंचनजंगा एक्सप्रेस में जोर से टक्कर मार दी. लोग चिल्लाने लगे. एक अन्य स्थानीय निवासी ने बताया कि हादसे के बाद दो बोगी तो सीधे खड़ी हो गईं थीं. जबकि तीसरी बोगी पटरी पर पलट गई. स्पीड बहुत तेज थी. दूसरी वाली ट्रेन स्लो स्पीड में चल रही थी.
'कवच' भी नहीं लगा था
कंचनजंगा एक्सप्रेस त्रिपुरा के अगरतला से सियालदाह जा रही थी. रंगापानी स्टेशन क्रॉस करने के बाद सुबह 8.55 बजे पीछे से आ रही एक मालगाड़ी ने ट्रेन को टक्कर मार दी थी.
रेलवे बोर्ड की अध्यक्ष जया वर्मा ने बताया कि रेलवे का कवच सिस्टम इस रूट पर नहीं लगा था. रेलवे का कवच सिस्टम दो ट्रेनों की टक्कर को रोकता है. अगर रूट पर कवच सिस्टम लगा होता तो दोनों ट्रेनों के ब्रेक अपने आप लग जाते.
25 साल पहले इसी रूट पर एक और भयानक रेल हादसा हुआ था. 1999 में गुवाहाटी जा रही अवध असम एक्सप्रेस और दिल्ली जा रही ब्रह्मपुत्र मेल टकरा गई थी. ये टक्कर गैसल रेलवे स्टेशन के पास हुई थी, जो सोमवार को हुई एक्सीडेंट साइट से 48 किलोमीटर दूर है. उस हादसे में 287 लोगों की मौत हो गई थी.