कच्चातिवु द्वीप को लेकर भारत में सियासी घमासान जारी है. बीजेपी नेता द्वीप को वापस लेने की बात उठाते हुए कह रहे हैं कि साल 1974 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने द्वीप श्रीलंका को दान में दे दिया था. अब यही द्वीप तमिलनाडु वापस चाहता है. ये तो हुआ एक हिस्सा. आरोपों में घिरी कांग्रेस ने भी भाजपा सरकार पर नया आरोप मढ़ दिया. उसका कहना है कि नौ साल पहले हुए लैंड करार के दौरान बीजेपी सरकार ने बांग्लादेश को इससे कहीं ज्यादा जगहें दे डालीं. जानिए, क्या है ये लैंड एग्रीमेंट, और कितनी सच्चाई है आरोपों में.
क्यों आई समझौते की नौबत
सबसे पहले भारत और बांग्लादेश के बीच का सीमा विवाद समझते हैं ताकि करार तक जाने में आसानी हो. साल 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने में भारत का बड़ा हाथ था. लेकिन इसके साथ दोनों देशों के बीच बॉर्डर को लेकर विवाद भी गहराने लगा. असल में भारत से बंटकर ही पाकिस्तान और फिर उससे बांग्लादेश निकला. बंटवारे के समय तकनीकी स्थितियों के चलते सीधी-सादी लकीर खींचकर पार्टिशन नहीं हो सका. कई हिस्से थे, जो दोनों देशों के बीच ऐसे पड़ते थे कि कोई भी उनपर पूरा-पूरा दावा नहीं कर पा रहा था. ये मामले लंबित की श्रेणी में आ गए, और दशकों तक चलते रहे.
सत्तर में हुआ जमीन पर करार
साल 1974 में कांग्रेस सरकार के दौरान लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट (LBA) हुआ. ये करार ऐसे ही पेंडिंग पड़े मामलों को निपटाने के लिए था. लेकिन एग्रीमेंट सदन में पारित हुए बगैर पड़ा रहा. इसमें 160 एनक्लेव्स की बात थी, जो एक-दूसरे को दिए जाने थे. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश ने इस एग्रीमेंट को कन्फर्म भी कर दिया, जबकि भारत चुप रहा क्योंकि इसपर आधिकारिक सहमति का मतलब अपनी जमीनों का बंटवारा था.
साल 2011 में मनमोहन सरकार के दौरान बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना ने एक बार फिर इसपर बात की. तब एक बार फिर सहमति बनी कि भारत को बांग्लादेश से पौने 3 हजार एकड़ जमीन मिलेगी, जबकि बदले में उसे लगभग सवा 2 हजार एकड़ जमीन ढाका को देनी थी. लेकिन डील तब भी साइन नहीं हो सकी.
मोदी सरकार के समय बनी सहमति
साल 2015 में भाजपा सरकार ने काम में तेजी दिखाई, और सबकी सहमति से LBA पास हो गया. इससे पहले उन इलाकों के लीडरों से भी बात की गई, जिनके पड़ोस में विवादित इलाके पड़ते थे. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का भी राजीनामा लिया गया क्योंकि उससे सटे कई इलाके विवादित रहे.
करार के तहत 162 जगहों का लेनदेन हुआ. इसमें 111 जगहें भारत ने बांग्लादेश की दीं, जो 17 हजार एकड़ से कुछ ज्यादा है. वहीं बदले में हमें 51 इलाके मिले, जो 7 हजार एकड़ से कुछ ज्यादा हैं. इस तरह से अगर केवल जमीन का हिसाब देखा जाए तो 10 हजार एकड़ जमीन हमारे हिस्से घटी. लेकिन इस बात का अंदाजा नहीं कि अदलाबदली हुई दोनों तरफ की जमीनों की क्या उपयोगिता या सामरिक इस्तेमाल हो सकता है.
नागरिक भी यहां से वहां हुए
जमीनों की ही अदलाबदली नहीं हुई, बल्कि बांग्लादेश के जो एरिया हमें मिले, वहां रहने वालों को भारतीय नागरिकता भी मिल गई. द हिंदू की रिपोर्ट में जिक्र है कि तब हमने 14 हजार से ज्यादा बांग्लादेशियों को सिटिजनशिप दी थी. ये लोग पश्चिम बंगाल के दिनहाता, हल्दीबाड़ी और मेक्लीगंज के कैंपों में रखे गए. साथ ही उन्हें हमारे यहां बसाने के लिए 1 हजार करोड़ का पुर्नवास पैकेज भी मिला.
दूसरी तरफ भारत में रहते 36 हजार लोगों को भी बांग्लादेशी नागरिकता दी गई. दोनों तरफ ही रहते ये वह लोग थे, जिन्हें विवादित जगहों पर रहने के चलते किसी सरकारी योजना का पूरा फायदा नहीं मिल पाता था. बता दें कि दोनों देश लगभग 4 हजार किलोमीटर की सीमा शेयर करते हैं. यह बॉर्डर आजादी के समय ही सिरिल जॉन रेडक्लिफ ने खींची थी. लेकिन तब बांग्लादेश पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा था. भौगोलिक स्थिति जैसे द्वीप, नदी, पहाड़ों के बीच में आ जाने से बंटवारा उतना आसान नहीं था. लिहाजा जो लोग वहां बसे हुए थे, उन्हें पहले तो रीहैबिलिटेशन का प्रस्ताव मिला. जो लोग जगह छोड़ने को राजी नहीं थे, वे वही रहते रहे, लेकिन ठीक तरह से अपनाए नहीं जा सके थे.
अब क्यों हो रहा जिक्र
कच्चातिवु द्वीप को लेकर घिरी कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने लैंड एग्रीमेंट का मामला उठाया. उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा कि साल 2015 में मोदी सरकार ने काफी सारा भारतीय क्षेत्र दिया, जिसके बदले में उसे काफी कम मिला. इससे भारत की 10,051 एकड़ जमीन घट गई.