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पोर्न पर दिए फैसले में क्यों हुआ स्विगी-जोमैटो का जिक्र, केरल हाइकोर्ट के फैसले को समझिए

केरल हाईकोर्ट का कहना है कि अकेले में पोर्न देखना आईपीसी की धारा 292 के तहत अपराध के दायरे में नहीं आता. लेकिन कोर्ट का फैसला सिर्फ पोर्न देखने या न देखने तक ही सीमित नहीं है. बल्कि इस फैसले में कोर्ट ने ये भी सलाह दी है कि माता-पिता को अपने बच्चों को फोन देने से बचना चाहिए.

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केरल हाईकोर्ट ने पोर्न को लेकर बड़ा फैसला दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)
केरल हाईकोर्ट ने पोर्न को लेकर बड़ा फैसला दिया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

पोर्न को लेकर भारतीय समाज में एक आम धारणा है कि इसे नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये गलत है. लेकिन अदालतें कई फैसलों में साफ कर चुकी हैं, पोर्न देखना गलत नहीं है बशर्ते कोई व्यक्ति इसे नितांत निजी स्पेस में देख रहा हो.

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अब पोर्न को लेकर केरल हाईकोर्ट ने भी ऐसा ही फैसला दिया है. केरल हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि पोर्न देखना तब तक अपराध के दायरे में नहीं आता, जब तक इसे दूसरे को न दिखाया जाए. 

ये फैसला जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन की बेंच ने दिया. बेंच 2016 के एक मामले की सुनवाई कर रही थी. मामले में पुलिस ने एक युवक को पोर्न देखने के इल्जाम में सड़क किनारे से गिरफ्तार किया था. इसके बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 292 के तहत केस दर्ज किया गया. युवक अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा था.

इसी मामले पर फैसला देते हुए जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने कहा, दूसरों को दिखाए बिना 'निजी तौर पर' अश्लील तस्वीरें या वीडियो देखना अपराध के दायरे में नहीं आता. क्योंकि ये व्यक्ति की निजी पसंद है और अदालत उसमें दखल नहीं कर सकती.

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इसके साथ ही अदालत ने युवक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया. अदालत ने कहा, 'अगर कोई व्यक्ति निजी तौर पर अश्लील फोटो या वीडियो देख रहा है तो ये आईपीसी की धारा 292 के तहत अपराध नहीं है. लेकिन अगर वो किसी दूसरे को अश्लील फोटो या वीडियो दिखा रहा है या उसे सार्वजनिक रूप से दिखाने की कोशिश कर रहा है तो फिर ये धारा 292 के तहत अपराध होगा.'

कोर्ट ने और क्या कहा?

कोर्ट ने कहा, 'पोर्नोग्राफी सदियों से प्रचलित है. लेकिन आज के नए डिजिटल युग में और ज्यादा सुलभ हो गई है. बच्चों और बड़ों की उंगलियों पर ये मौजूद है. सवाल ये है कि अगर कोई अपने निजी समय में दूसरों को दिखाए बगैर पोर्न वीडियो देख रहा है तो वो अपराध है या नहीं? अदालत इसे अपराध के दायरे में नहीं ला सकती, क्योंकि ये व्यक्ति की निजी पसंद हो सकती है और इसमें दखल करना उसकी निजता में घुसपैठ करने के बराबर होगा.'

जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने कहा, 'भगवान ने सेक्सुअलिटी को एक पुरुष और एक महिला के लिए कुछ रूप में डिजाइन किया है. ये सिर्फ वासना का मामला नहीं है, बल्कि प्यार का मामला है और बच्चे पैदा करने का भी. लेकिन बालिग हो चुके पुरुष और महिला का सहमति से किया गया सेक्स अपराध नहीं है, अगर ये उनकी निजता के दायरे में हो.'

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उन्होंने आगे कहा, 'अदालत को सहमति से संबंध बनाने या निजता में अश्लील वीडियो देखने को मान्यता देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि समाज की इच्छा और कानून के दायरे में है. अदालत का काम सिर्फ ये पता लगाना है कि ये अपराध है या नहीं?'

सिर्फ पोर्न तक सीमित नहीं है फैसला

केरल हाईकोर्ट का ये फैसला सिर्फ पोर्न देखने या न देखने तक ही सीमित नहीं है. बल्कि इस फैसले में अदालत ने माता-पिता की जिम्मेदारियों की ओर भी ध्यान दिया है.

कोर्ट ने कहा, 'नाबालिग बच्चों के माता-पिता को याद रखना होगा कि पोर्न देखना अपराध नहीं है, लेकिन अगर बच्चे पोर्न वीडियो देखते हैं तो इसकी दूरगामी परिणाम होंगे.'

अदालत ने कहा, 'माता-पिता अपने बच्चों को खुश करने के लिए इंटरनेट एक्सेस वाला मोबाइल फोन गिफ्ट कर देते हैं. मां के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खिलाने और बर्थडे पर केक काटने की बजाय उन्हें खुश करने के लिए मोबाइल फोन गिफ्ट कर दिया जाता है. माता-पिता को इसके पीछे के खतरों पर भी ध्यान देना चाहिए.'

स्विगी-जोमैटो का दिया उदाहरण

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, 'माता-पिता अपनी मौजूदगी में बच्चों को समाचार या ज्ञानवर्धक वीडियो देखने दें. बच्चों को खुश करने के लिए उन्हें मोबाइल फोन नहीं देना चाहिए.'

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उन्होंने कहा, 'बच्चों को खाली समय में क्रिकेट या फुटबॉल या अपना पसंदीदा खेल खेलने दें. क्योंकि ये स्वस्थ युवा पीढ़ी के लिए जरूरी है, जो भविष्य में हमारे देश की उम्मीद की किरण हैं.'

जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने कहा, 'स्विगी या जोमैटो से खाना ऑर्डर करने की बजाय बच्चों को उनकी मां के हाथ का बना स्वादिष्ट खाना खाने दें. जब मां खाना बनाए तब बच्चे को खेल के मैदान में खेलने दें. मैं इसे नाबालिग बच्चों के माता-पिता की विवेक पर छोड़ता हूं.'

आखिर में, धारा 292 क्या है?

आईपीसी की धारा 292 और 293 में पोर्नोग्राफी और अश्लीलता को अपराध माना गया है और इसके लिए सजा का प्रावधान किया गया है.

धारा 292 के तहत, अश्लील वस्तुओं को बेचने, बांटने, प्रदर्शित करने या प्रसारित करना अपराध है. ऐसा करते हुए पहली बार पकड़े जाने पर 2 साल तक की जेल और 2 हजार तक का जुर्माना लग सकता है. दूसरी बार पकड़े जाने पर 5 साल तक जेल और 5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है.

जबकि धारा 293 के तहत, 20 साल से कम उम्र के व्यक्ति को अश्लील वस्तु दिखाना, बेचना, किराये पर देना या बांटना अपराध है. ऐसा करने पर पहली बार दोषी पाए जाने पर 3 साल तक की जेल और 2 हजार रुपये की सजा का प्रावधान है. दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 7 साल तक की जेल और 5 हजार रुपये के जुर्माने की सजा हो सकती है.

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