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लिव-इन, लव मैरिज और समलैंगिक शादियों पर खाप पंचायतों को दिक्कत क्या? जानिए कानून क्या अधिकार देता है

यूपी-हरियाणा और राजस्थान समेत कई उत्तरी राज्यों की खाप पंचायतों ने अब लिव-इन रिलेशनशिप, लव मैरिज, समलैंगिक विवाह और एक ही गोत्र में शादी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. खाप नेताओं ने धमकी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वो आंदोलन करेंगे. ऐसे में जानते हैं कि लिव-इन रिलेशनशिप, लव मैरिज, समलैंगिक विवाह और एक ही गोत्र में शादी को लेकर कानून क्या अधिकार देता है?

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खाप पंचायतों ने एक ही गोत्र में शादी पर भी रोक लगाने की मांग की है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-Reuters)
खाप पंचायतों ने एक ही गोत्र में शादी पर भी रोक लगाने की मांग की है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-Reuters)

अपने अजीबोगरीब फरमानों के जाने जाने वाली खाप पंचायतें अब लिव-इन रिलेशनशिप, लव मैरिज और समलैंगिक शादियों के खिलाफ उतर आई हैं. खाप पंचायतों ने एक ही गोत्र में होने वाली शादियों का भी विरोध किया है.

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दरअसल, रविवार को हरियाणा के जींद में करीब 300 खाप पंचायतों के नेताओं ने एक 'महापंचायत' की थी. इसमें हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के खाप नेता शामिल थे. महापंचायत में खाप नेताओं ने धमकी दी कि अगर लिव-इन रिलेशनशिप और लव मैरिज पर बैन लगाने की उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वो आंदोलन करेंगे. 

अपनी मांगों को लेकर खाप नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेता विपक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात करेंगे. उनका कहना है कि कानूनों में संशोधन करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाएगा. 

खाप नेताओं की मांगें क्या?

खाप नेता लिव-इन रिलेशनशिप, लव मैरिज, समलैंगिक विवाह और एक ही गोत्र में होने वाली शादी पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं. 

बेनैन खाप के प्रमुख रघुबीर नैन का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप पर प्रतिबंध लगना चाहिए. समलैगिंक विवाह पर भी रोक लगनी चाहिए, क्योंकि जानवर भी इससे बचते हैं.

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उन्होंने कहा कि खाप लव-मैरिज के खिलाफ नहीं है, लेकिन ऐसी शादी में माता-पिता की सहमति जरूरी है, क्योंकि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता. उन्होंने बताया कि खाप एक ही गोत्र में होने वाली शादियों के भी खिलाफ है.

महिला खाप नेता संतोष दाहिया ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप की वजह से फैमिली सिस्टम टूट रहा है, क्योंकि इसे कानूनी संरक्षण मिल गया है. इसने समाज, बच्चों और हमारी संस्कृति पर बुरा असर डाला है. उन्होंने कहा कि समान गोत्र में शादी ने सामाजिक ताने-बाने को खत्म कर दिया है. साथ ही इसने कई सारी जेनेटिक समस्याएं बी पैदा कर दी हैं, जो समान गोत्र में शादी के बाद कई गुना बढ़ जाती हैं.

लिव-इन में रहना अपराध नहीं

साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में साफ कर दिया था कि बालिग होने के बाद व्यक्ति किसी के साथ भी रहने या शादी करने के लिए आजाद है. 

सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले से लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिल गई थी. इस फैसले में कोर्ट ने ये भी कहा था, 'कुछ लोगों की नजर में ये अनैतिक हो सकता है, लेकिन ऐसे रिलेशन में रहना अपराध के दायरे में नहीं आता.'

हालांकि, अगर कोई शादीशुदा व्यक्ति बिना तलाक लिए किसी के साथ लिव-इन में रहे तो ये गैर-कानूनी माना जाता है.

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इतना ही नहीं, लिव-इन में रहने वाली महिला को भी शादीशुदा औरत की तरह ही गुजारा भत्ता पाने का हक है. अगर महिला को उसका पार्टनर उसकी सहमति के बगैर छोड़ देता है तो वो कानून गुजारा भत्ता पाने का अधिकार रखती है. 2011 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण पोषण पाने का अधिकार है. और महिला को ये कहकर मना नहीं किया जा सकता कि उसने कोई वैध शादी नहीं की थी.

लिव-इन रिलेशनशिप में जन्मे बच्चे का पिता की पैतृक संपत्ति में भी अधिकार है. 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे कपल से अगर कोई संतान पैदा होती है तो पैतृक संपत्ति पर उसका भी उतना ही अधिकार होगा, जितना वैध शादी से पैदा हुई संतान का होता है.

क्या लव मैरिज कर सकते हैं?

भारत का संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद से जीने का अधिकार देता है. साथ ही ये अधिकार भी देता है कि वो जिससे चाहे, उससे शादी कर सकता है. अगर दो बालिग अलग-अलग धर्म या जाति के भी हों, तब भी उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार है.

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भारत में शादी करने की कानूनी उम्र लड़के के लिए 21 साल और लड़की के लिए 18 साल है. कानूनी उम्र पार करने के बाद व्यक्ति अपनी मर्जी से शादी कर सकता है.

अगर लड़का और लड़की, दोनों अलग-अलग धर्म या जाति के हैं तो स्पेशल मैरिज एक्ट उन्हें शादी करने का अधिकार देता है. इस कानून के तहत, कपल को 30 दिन पहले मैरिज रजिस्ट्रार को बताना होता है कि वो शादी करने वाले हैं. इसके बाद मैरिज रजिस्ट्रार दोनों पक्षों को नोटिस जारी करता है. अगर किसी को आपत्ति है तो वो 30 दिन में इसे दर्ज करवा सकता है. आपत्ति सही पाए जाने पर रजिस्ट्रार शादी से मना कर सकता है.

अगर आपत्ति नहीं है तो शादी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. शादी रजिस्ट्रार के ऑफिस में होती है, जिसके लिए तीन गवाहों की जरूरत होती है.

समान गोत्र में शादी का क्या है नियम?

ऐसा कोई कानून नहीं है जो समान गोत्र में होने वाली शादी पर रोक लगाता हो. हिंदू मैरिज एक्ट सिर्फ सपिंड शादी पर रोक लगाता है, समान गोत्र पर नहीं.

1955 के हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार, कोई भी हिंदू व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से शादी नहीं कर सकता जो उनकी तीन पीढ़ियों के भीतर हो. मां की तरफ से तीन पीढ़ी और पिता की तरफ से पांच पीढ़ी के भीतर शादी पर रोक है.

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वहीं, समान गोत्र पर शादी को लेकर फरवरी 2018 में खाप पंचायतों को फटकार लगाई थी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब दो बालिग व्यक्ति शादी करना चाहते हैं, तो तीसरा इसमें दखलंदाजी नहीं कर सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'अगर एक बालिग पुरुष और महिला शादी करते हैं तो कोई खाप या समाज इस पर सवाल नहीं उठा सकता.'

उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये अदालत पर निर्भर करता है कि कोई शादी कानूनन मान्य है या नहीं. खाप पंचायतें इसका फैसला नहीं कर सकतीं.

समलैंगिक विवाह की भारत में अनुमति नहीं

भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता नहीं है. पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने साफ कर दिया था कि अदालत कानून नहीं बना सकती. सिर्फ इसकी व्याख्या कर सकती है. कानून बनाने का काम संसद का है. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का अधिकार संसद और राज्यों की विधानसभाओं को है.

हालांकि, फरवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया था, जो समलैंगिक संबंधों को अपराध बनाती थी.

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