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किंगमेकर बनते-बनते नीतीश कुमार क्या बदल लेंगे रास्ता! हवाहवाई नहीं ये डर, जानें- पहले कितनी बार बदल चुके पाला

देश की सियासत में नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा में हैं. ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब माना रहा था कि बिहार के इस मुख्यमंत्री का राजनैतिक करियर उतार पर है. समय बदला और नीतीश एक बार फिर बड़ी भूमिका में आ गए. वैसे तो वे एनडीए के साथ दिख रहे हैं लेकिन चिंता अब भी है. वजह? साथ दिखते-दिखते वो पहले भी कई मौकों पर नाराजगी दिखा पाला बदल चुके.

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बिहार के सीएम नीतीश कुमार फिलहाल चर्चा में हैं. (Photo- PTI)
बिहार के सीएम नीतीश कुमार फिलहाल चर्चा में हैं. (Photo- PTI)

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के बाद भाजपा के साथ मिलकर एनडीए सरकार बनाने जा रही है. इसमें नीतीश कुमार की जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी का रोल बेहद अहम होगा. इस बीच तमाम तरह की सियासी अटकलें लग रही हैं. कहा तो ये तक जा रहा है कि दोनों ही पार्टियां प्रेशर पॉलिटिक्स करेंगी. लेकिन सबसे ज्यादा बात नीतीश पर हो रही है. वे पहले भी कई मौकों पर पलटी मार चुके हैं. 

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नीतीश ने कब क्या किया, ये जानने से पहले सतही तौर पर उनकी जरूरत समझते चलें. 

एनडीए को 543 में से 294 सीटें मिलीं, जबकि INDI अलायंस को 233 जगहें मिल सकीं. भाजपा को 240 सीटों के साथ बहुमत तो मिला, लेकिन वो मैजिक नंबर 272 को नहीं छू सकी, जिसके दम वो अकेले सरकार बना सकती थी. भाजपा समेत पूरा एनडीए फिलहाल आंध्रप्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी और बिहार के जनता दल (यूनाइटेड) के भरोसे है, जो कि नीतीश की पार्टी है. जेडीयू के इस नेता को 12 सीटें मिली हैं, जो खेल बदल सकती हैं. 

एक समय पर अपने दमदार शासन के लिए नीतीश को सुशासन बाबू कहा गया था. लेकिन समय के साथ उन्हें एक और खिताब मिला- पलटू राम का. कहा गया कि वे बार-बार अपना राजनैतिक स्टैंड बदलते हैं. जानिए, कब-कब नीतीश यहां से वहां सरक गए. 

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साल 2024 में INDIA ब्लॉक से बरती दूरी

इसी जनवरी में नीतीश कुमार एकदम से आरजेडी और INDIA ब्लॉक से रिश्ता तोड़कर एनडीए में शामिल हो गए. नीतीश वैसे तो आरजेडी के सपोर्ट से ही बिहार के सीएम बने हुए थे, लेकिन नाता तोड़ने पर भी इसपर फर्क नहीं पड़ा. वे एनडीए की मदद से सीएम बने रहे. द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, सहयोगियों से दूरी के पीछे कारण गिनाते हुए उन्होंने कहा कि वे बिहार के फायदे के लिए ऐसा कर रहे हैं. 

हालांकि राजनीति के जानकारों ने इसे उनकी आदत बताते हुए कहा कि वे हवा का रुख भांपकर भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए में आए क्योंकि उन्हें यकीन था कि लोकसभा चुनावों में ये पार्टी कमाल करेगी. 

साल 2022 में बीजेपी से जताई थी नाराजगी

डेढ़ साल पहले अगस्त 2022 में नीतीश का रवैया बिल्कुल अलग था. एनडीए का हिस्सा रहते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी पार्टी भाजपा के पीछे चलने को मजबूर है. वे नाराज थे क्योंकि विधानसभा में जेडीयू की सीटें घट रही थीं, जबकि भाजपा की सीटें बढ़ी थीं. उन्होंने एनआरसी और राज्य में दो-दो डिप्टी सीएम के होने पर गुस्सा दिखाया था. 

आखिरकार कई असहमतियों के साथ वे दूसरी धारा में चले गए. 

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साल 2017- इस वक्त भी पलटी मारी गई थी

दो साल पहले 2015 में विधानसभा चुनावों में जेडीयू के नीतीश और आरजेडी से लालू प्रसाद यादव एक मंच पर आए और भाजपा में बड़ा उलटफेर किया था. उन्होंने कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर स्टेट की 243 में से 178 सीटें जीत लीं. 
लेकिन हरियाली कुछ ही समय के लिए थी. 2017 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर करप्शन के आरोप लगने पर नीतीश साथ देने की बजाए उनसे इस्तीफा मांगने लगे. जब ऐसा नहीं हुआ तो नीतीश ने उनसे रिश्ता तोड़कर एक बार फिर एनडीए का रास्ता अपना लिया. 

साल 2013 में नरेंद्र मोदी का उभरना भी खटक चुका. 

जून 2013 में भाजपा ने पीएम नरेंद्र मोदी (तब गुजरात के मुख्यमंत्री) को चुनाव अभियान का प्राइम फेस बनाया. ये एक तरह का सिग्नल था कि लोकसभा में पार्टी की तरफ से वही पीएम चेहरा भी होंगे. 

नीतीश रूठ गए. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा अपने सीनियर साथियों को धोखा देती और किनारे लगा देती है, जैसे कि लालकृष्ण आडवानी. इसके साथ ही नीतीश ने एनडीए के साथ अपना 17 साल पुराना नाता खत्म कर दिया. तोड़ने-जोड़ने का ये सिलसिला तब से ही चला आ रहा है.

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