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56 दिन बाद भी क्यों जल रहा है मणिपुर? कुकी और मैतेई के बीच की 'जंग' कैसे थमेगी

तीन मई से मणिपुर हिंसा की आग में जल रहा है. 50 हजार से ज्यादा लोग अपना घर छोड़कर रिलीफ कैम्प में रहने को मजबूर हैं. कुकी और मैतेई के बीच चल रहे इस जातीय संघर्ष में अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में जानते हैं कि इस हिंसा का कारण क्या है? और ये कैसे शांत हो सकती है?

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मणिपुर की हिंसा में अब तक 100 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. (फाइल फोटो-PTI)
मणिपुर की हिंसा में अब तक 100 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. (फाइल फोटो-PTI)

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर 56 दिनों से हिंसा की आग में जल रहा है. अब तक 120 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. तीन हजार ज्यादा लोग बुरी तरह घायल हुए हैं. करीब 50 हजार लोग अपना घर-बार छोड़कर रिलीफ कैम्प में रहने को मजबूर हैं.

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हिंसा की आग में जलते मणिपुर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी आज पहुंच गए हैं. राहुल यहां दो दिन रहेंगे. इस दौरान राहुल रिलीफ कैम्प में रह रहे लोगों से मुलाकात करेंगे.

मणिपुर में तीन मई को कुकी समुदाय की ओर से निकाले गए 'आदिवासी एकता मार्च' के दौरान हिंसा भड़की थी. इस दौरान कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसक झड़प हो गई थी. तब से ही वहां हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं. जानकारों का मानना है कि बातचीत से ही इस हिंसा को शांत किया जा सकता है, लेकिन समस्या ये है कि बातचीत को कोई तैयार हो नहीं रहा है.

मणिपुर में कैसे शुरू हुई थी हिंसा? कुकी और मैतेई समुदाय के बीच किस बात को लेकर है विवाद? हिंसा को शांत करने के लिए अब तक सरकार ने क्या-क्या किया? जानते हैं...

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कब से जल रहा है मणिपुर?

- तीन मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (ATSUM) ने 'आदिवासी एकता मार्च' निकाला. ये रैली चुरचांदपुर के तोरबंग इलाके में निकाली गई. 

- इसी रैली के दौरान आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच हिंसक झड़प हो गई. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे. 

- तीन मई की शाम तक हालात इतने बिगड़ गए कि राज्य सरकार ने केंद्र से मदद मांगी. बाद में सेना और पैरामिलिट्री फोर्स की कंपनियों को वहां तैनात किया गया.

- ये रैली मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के खिलाफ निकाली गई थी. मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा मांग रहा है. 

- 20 अप्रैल को मणिपुर हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस एमवी मुरलीधरन ने एक आदेश दिया था. इसमें राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करने को कहा था. इसके लिए हाईकोर्ट ने सरकार को चार हफ्ते का समय दिया है. 

- मणिपुर हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद नगा और कुकी जनजाति समुदाय भड़क गए. उन्होंने 3 मई को आदिवासी एकता मार्च निकाला.

मैतेई क्यों मांग रहे जनजाति का दर्जा?

- मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 53 फीसदी से ज्यादा है. ये गैर-जनजाति समुदाय है, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं. वहीं, कुकी और नगा की आबादी 40 फीसदी के आसपास है.

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- राज्य में इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में ही बस सकते हैं. मणिपुर का 90 फीसदी से ज्यादा इलाकी पहाड़ी है. सिर्फ 10 फीसदी ही घाटी है. पहाड़ी इलाकों पर नगा और कुकी समुदाय का तो घाटी में मैतेई का दबदबा है.

- मणिपुर में एक कानून है. इसके तहत, घाटी में बसे मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न बस सकते हैं और न जमीन खरीद सकते हैं. लेकिन पहाड़ी इलाकों में बसे जनजाति समुदाय के कुकी और नगा घाटी में बस भी सकते हैं और जमीन भी खरीद सकते हैं.

- पूरा मसला इस बात पर है कि 53 फीसदी से ज्यादा आबादी सिर्फ 10 फीसदी इलाके में रह सकती है, लेकिन 40 फीसदी आबादी का दबदबा 90 फीसदी से ज्यादा इलाके पर है.

मैतेई समुदाय की मांग कितनी जायज?

- मैतेई समुदाय की ओर से मणिपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. इसमें अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का मुद्दा उठाया गया था.

- याचिका में दलील दी गई थी कि 1949 में मणिपुर भारत का हिस्सा बना था. उससे पहले तक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा हासिल था. लेकिन बाद में उसे एसटी लिस्ट से बाहर कर दिया गया.

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- शेड्यूल ट्राइब डिमांड कमेटी मणिपुर (STDCM) ने हाईकोर्ट में दलील दी कि मैतेई या मीतेई समुदाय को एसटी लिस्ट में शामिल करने की मांग लंबे समय से हो रही है. इसे लेकर केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपा गया था.

-STDCM ने हाई कोर्ट में दलील दी कि 29 मई 2013 को केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से मैतेई या मीतेई समुदाय से जुड़ी सामाजिक-आर्थिक जनगणना और एथनोग्राफिक रिपोर्ट्स मांगी थी, लेकिन राज्य सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया.

- इसी पर मणिपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वो चार हफ्तों के अंदर मैतेई समुदाय की ओर से एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करे.

शांति के लिए अब तक क्या-क्या हुआ?

- केंद्र सरकार ने मणिपुर में हो रही हिंसा की जांच के लिए 4 जून को एक आयोग का गठन किया था. आयोग की अध्यक्षता गुवाहाटी हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस अजय लांबा कर रहे हैं.

- गृह मंत्रालय के मुताबिक, ये आयोग तीन मई और उसके बाद मणिपुर में हुई हिंसा और दंगों के कारणों की जांच करेगा.

- इसके बाद 10 जून को केंद्र सरकार ने मणिपुर में अलग-अलग जातीय समूहों के बीच शांति बनाने और समुदायों के बीच बातचीत शुरू करने के लिए राज्यपाल अनुसूइया उइके की अध्यक्षा में एक शांति समिति का गठन किया था.

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- हालांकि, कई सारे सिविल सोसायटी ग्रुप ने अलग-अलग कारणों से शांति समिति का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था.

- इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने भी मणिपुर का चार दिन का दौरा किया था. उनके निर्देश के बाद केंद्र ने मणिपुर में विस्थापित लोगों के लिए 101.75 करोड़ रुपये के राहत पैकेज को मंजूरी दी.

- इतना ही नहीं, भारी मात्रा में हथियारों को भी जब्त किया जा रहा है. 27 जून को ही असम राइफल्स और नागालैंड पुलिस ने ज्वॉइंट ऑपरेशन में बंदूक, हथियार और विस्फोटक जब्त किए हैं. हालांकि, इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया. इन हथियारों को मणिपुर ले जाया जा रहा था.

कैसे शांत हो सकता है मणिपुर?

- भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल की पोस्ट तक पहुंचने वाले पूर्वोत्तर के पहले अधिकारी रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हिमालय सिंह का कहना है कि ये समय 'आंख के बदले आंख' का नहीं बल्कि शांति बनाने का है.

- उन्होंने कहा, 'हमें साथ बैठना चाहिए और बातचीत करना चाहिए. जब गृह मंत्री मणिपुर आए और उन्होंने शांति समिति के गठन का ऐलान किया तो ये अच्छा कदम है. उम्मीद है कि शांति समिति काम करेगी.'

- उन्होंने कहा कि जातीय संघर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा हो सकती है. हम बाहरी और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों वाले माहौल में रह रहे हैं. इसका समाधान किया जाना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि कुकी विधायकों से बात की जानी चाहिए.

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- मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के सलाहकार रह चुके रजत सेठी का कहना है कि ये अब कुकी-मैतई की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इसमें बाहरी खिलाड़ी भी कूद गए हैं. भारत के बाहर जो निहित स्वार्थ हैं, वो शांतिपूर्ण भारत नहीं चाहते.

- सेठी का कहना है कि राजनीति भले ही समस्या का हिस्सा है, लेकिन समाधान का रास्ता भी है. जनप्रतिनिधियों से बात की जानी चाहिए, भीड़ से समस्या के समाधान की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

 

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