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महाराष्ट्र में सड़कों पर क्यों हैं मराठा? आरक्षण को लेकर क्या है पूरी लड़ाई

महाराष्ट्र के जालना से शुरू हुआ मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलन अब बाकी हिस्सों में भी पहुंचने लगा है. इस बीच राज्य सरकार ने ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई है. महाराष्ट्र में मराठा 80 के दशक से आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

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महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर फिर आंदोलन शुरू हो गया है. (फाइल फोटो-PTI)
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर फिर आंदोलन शुरू हो गया है. (फाइल फोटो-PTI)

महाराष्ट्र में कई दिनों से मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलन चल रहा है. मराठा आरक्षण की मांग को लेकर एक्टिविस्ट मनोज जरांगे दो हफ्ते से भूख हड़ताल पर बैठे हैं.

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जालना से लेकर पुणे और ठाणे से लेकर लातूर तक... मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलन जारी है. इस बीच सोमवार को ऑल पार्टी मीटिंग बुलाई गई है. राज्य के डिप्टी सीएम अजित पवार ने रविवार को कहा था, 'मराठा समुदाय को आरक्षण देने से पहले ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे बाकी दूसरे ओबीसी समुदाय प्रभावित न हों. बातचीत और बैठक से ही इस मसले का समाधान हो सकता है.'

मराठा आंदोलन की आग इस महीने की शुरुआत में जालना जिले के अंतरवली सारथी गांव में भड़की थी. तब ये प्रदर्शन हिंसक हो गए थे. जिसमें दर्जनों पुलिसकर्मी समेत कई लोग घायल हो गए थे.

कौन हैं मराठा?

मराठाओं में जमींदार और किसानों के अलावा अन्य लोग शामिल हैं. अनुमान है कि महाराष्ट्र में मराठाओं की आबादी 33 फीसदी के आसपास है. ज्यादातर मराठा मराठी भाषी होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि हर मराठी भाषी मराठा ही हो.

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मराठा को महाराष्ट्र में सबसे प्रभावशाली समुदाय माना जाता है. 1960 में महाराष्ट्र के गठन के बाद से अब तक 20 में से 12 मुख्यमंत्री मराठा समुदाय से ही रहे हैं. मौजूदा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी मराठा हैं.

मराठा आरक्षण आंदोलन की आग...

महाराष्ट्र में मराठा लंबे समय से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. करीब 32 साल पहले मराठा आरक्षण को लेकर पहली बार आंदोलन हुआ था. ये आंदोलन मठाड़ी लेबर यूनियन के नेता अन्नासाहब पाटिल की अगुवाई में हुआ था. उसके बाद से मराठा आरक्षण का मुद्दा यहां की राजनीति का हिस्सा बन गया.

महाराष्ट्र में ज्यादातर समय मराठी मुख्यमंत्रियों ने ही सरकार चलाई है, लेकिन इसका कोई हल नहीं निकल सका. 

2014 के चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मराठाओं को 16% आरक्षण देने के लिए अध्यादेश लेकर आए थे. लेकिन 2014 में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार चुनाव हार गई और बीजेपी-शिवसेना की सरकार में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने.

फडणवीस की सरकार में मराठा आरक्षण को लेकर एमजी गायकवाड़ की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग बना. इसकी सिफारिश के आधार पर फडणवीस सरकार ने सोशल एंड एजुकेशनली बैकवर्ड क्लास एक्ट के विशेष प्रावधानों के तहत मराठाओं को आरक्षण दिया.

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फडणवीस की सरकार में मराठाओं को 16% का आरक्षण मिला. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे कम करते हुए सरकारी नौकरियों में 13% और शैक्षणिक संस्थानों में 12% कर दिया. मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया.

अब क्या मांग रहे हैं मराठा?

मराठा आरक्षण को लेकर 1 सितंबर से आंदोलन चल रहा है. ये लोग मराठाओं के लिए ओबीसी का दर्जा मांग रहे हैं.

इनका कहना है कि सितंबर 1948 तक निजाम का शासन खत्म होने तक मराठाओं को कुनबी माना जाता था और ये ओबीसी थे. इसलिए अब फिर इन्हें कुनबी जाति का दर्जा दिया जाए और ओबीसी में शामिल किया जाए.

कुनबी, खेती-बाड़ी से जुड़ा समुदाय है. इसे महाराष्ट्र में ओबीसी में शामिल किया गया है. कुनबी जाति के लोगों को सरकारी नौकरियों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मिलता है. मराठवाड़ा क्षेत्र महाराष्ट्र का हिस्सा बनने से पहले तत्कालीन हैदराबाद रियासत में शामिल था.

मराठा आरक्षण की मांग को लेकर अनशन पर बैठे मनोज जरांगे का कहना है कि जब तक मराठियों को कुनबी जाति का सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता, तब तक भूख हड़ताल खत्म नहीं होगी.

सरकार का क्या है कहना?

बीते हफ्ते मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मराठा आरक्षण को लेकर कैबिनेट मीटिंग बुलाई थी. इस मीटिंग में फैसला लिया गया था कि जिनके पास निजाम के समय के दस्तावेज हैं, उन्हें कुनबी जाति का सर्टिफिकेट दिया जाएगा. 

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हालांकि, जरांगे इससे खुश नहीं हुए. उनकी मांग है कि सिर्फ मराठवाड़ा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के मराठियों को कुनबी जाति का सर्टिफिकेट दिया जाए.

जरांगे का कहना है कि 2004 में राज्य सरकार ने कुनबी, मराठा-कुनबी और कुनबी-मराठाओं को ओबीसी का दर्जा देने के लिए आदेश जारी किया था, लेकिन इसका फायदा उन्हें नहीं मिला, जो इसके हकदार हैं. उन्होंने 2004 के उस आदेश में संशोधन करने की मांग भी की है.

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