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नगालैंड में 27 साल बाद फिर लौटेगा उग्रवाद? जानें- केंद्र से समझौता कर चुका NSCN-IM क्यों कर रहा फिर हथियार उठाने की बात

नगा विद्रोहियों ने 1997 में सीजफायर का समझौता किया था. 2015 में NSCN-IM और केंद्र सरकार के बीच शांति समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए थे. अब NSCN-IM ने केंद्र सरकार पर समझौते का पालन नहीं करने का आरोप लगाया है.

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नगालैंड में 27 साल पहले विद्रोहियों ने सीजफायर समझौता किया था. (फाइल फोटो-PTI)
नगालैंड में 27 साल पहले विद्रोहियों ने सीजफायर समझौता किया था. (फाइल फोटो-PTI)

अचानक इस बात को लेकर टेंशन बढ़ गया है कि नगालैंड में उग्रवाद फिर लौट सकता है. नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (इसाक-मुइवा) यानी NSCN-IM ने एक बार फिर से हथियार उठाने की धमकी दी है. 

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NSCN-IM के महासचिव टी. मुइवा ने केंद्र सरकार पर 2015 के समझौते को न मानने का आरोप लगाया है. मुइवा ने राजनीतिक मुद्दों पर टकराव को सुलझाने के लिए तीसरे पक्ष से दखल की मांग भी की है.

केंद्र सरकार और NSCN-IM के बीच अगस्त 2015 में एक समझौता हुआ था. मुइवा का दावा है कि केंद्र सरकार इस समझौते का सम्मान नहीं कर रही है. दावा है कि उस समझौते के तहत नागालैंड के झंडे और संविधान पर भी सहमति बनी थी. मुइवा का कहना है कि केंद्र की तरफ से समझौते का पालन नहीं किए जाने की वजह से नए सिरे से हिंसक संघर्ष शुरू हो सकता है.

ये पहली बार नहीं है, जब मुइवा ने इस तरह की धमकी दी है. मुइवा पहले भी समझौते का हवाला देते हुए हिंसक संघर्ष की बात कर चुके हैं.

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क्यों धमकी दे रहे मुइवा?

तीन अगस्त 2015 को केंद्र सरकार और NSCN-IM के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे. मुइवा का दावा है कि समझौते में नगालैंड के लिए अलग झंडा और संविधान की बात भी थी. 

मुइवा का आरोप है कि केंद्र ने अलग झंडा और संविधान को औपचारिक मान्यता देने से इनकार कर विश्वासघात किया है.

मुइवा ने धमकी देते हुए कहा कि अगर केंद्र ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया तो NSCN-IM के पास हथियार उठाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा.

उन्होंने कहा कि इस मुद्दे का शांति से समाधान होना चाहिए और केंद्र को नगालैंड के झंडे और संविधान को मान्यता दे देनी चाहिए.

1997 में NSCN-IM ने सीजफायर कर दिया था. इसके बाद से ही केंद्र और NSCN-IM के बीच शांति प्रक्रिया पर बातचीत शुरू हुई थी. इन 27 सालों में केंद्र और NSCN-IM के बीच 600 से ज्यादा बार बातचीत हो चुकी है.

नगालैंड की समस्या क्या है?

आजादी के समय नगालैंड, असम का ही हिस्सा हुआ करता था. आजादी से पहले ही अंगामी जापू फिजो ने नगा नेशनल काउंसिल (NNC) का गठन किया. 14 अगस्त 1947 को फिजो ने नगालैंड को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया.

दिलचस्प बात ये है कि जून 1947 में ही कुछ अन्य नगा संगठनों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे नगा-अकबर हैदरी समझौता कहा जाता है. अकबर हैदरी तब असम के राज्यपाल थे. फिजो ने इस समझौते को नामंजूर कर दिया. 1951 में फिजो ने एक जनमत संग्रह करवाया और दावा किया कि 99 प्रतिशत लोग अलग नगालैंड चाहते हैं.

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अगले साल फिजो ने नगा फेडरल गवर्नमेंट (NFG) और नगा फेडरल आर्मी (NFA) नाम से दो अंडरग्राउंड ग्रुप बनाए और विद्रोह शुरू कर दिया. विद्रोह को दबाने के लिए सरकार ने सेना उतार दी. 1958 में यहां AFSPA लगा दिया गया.

1960 में नगा पीपुल्स कन्वेंशन के साथ एक 16 पॉइंट का एग्रीमेंट हुआ और 1 दिसंबर 1963 को नगालैंड अलग राज्य बना. लेकिन विद्रोही नेताओं ने अलग 'नगालिम' या 'ग्रेटर नगालैंड' की मांग की. नगालिम में न सिर्फ नगालैंड बल्कि असम, मणिपुर, अरुणाच प्रदेश और म्यांमार के नगा आबादी वाले इलाकों को भी शामिल करने की बात कही.

नगा विद्रोहियों की ये मांग बाकी राज्यों को मंजूर नहीं है, क्योंकि इससे उनका जमीनी इलाका कम हो जाएगा. अभी नगालैंड का क्षेत्रफल 16,527 वर्ग किलोमीटर है, जबकि विद्रोहियों की मांग 12 लाख वर्ग किमी की है.

नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में इतना उग्रवाद क्यों है? जानने के लिए यहां क्लिक करें

नगा विद्रोही और मुइवा

अलग नगालैंड बनाए जाने से फिजो समेत बाकी दूसरे संगठन खुश नहीं थे. 1975 तक यहां तब तक उग्रवाद रहा, जब तक शिलॉन्ग समझौता नहीं हो गया. शिलॉन्ग समझौते के तहत फिजो के संगठन ने हथियार डाल दिए. लेकिन इससे NSCN का जन्म हुआ. इस संगठन का गठन टी. मुइवा ने इसाक चिसी स्वू और एसएस खापलांग के साथ मिलकर किया था.

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1988 में खापलांग इससे अलग हो गए और उन्होंने NSCN-K नाम से नया संगठन बनाया. इस कारण संगठन का नाम NSCN-IM पड़ गया और ये नगालैंड का सबसे ताकतवर उग्रवादी संगठन बन गया.

90 के दशक में नगालैंड में फिर उग्रवाद का जन्म हुआ. केंद्र सरकार की कार्रवाई से डरकर NSCN-IM के बड़े नेता विदेश भाग गए. शांति प्रक्रिया में पहली बड़ी कामयाबी तब मिली जब 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने पेरिस में मुइवा से मुलाकात की. उसी साल NSCN-IM के नेताओं और तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट के बीच बैंकॉक में भी एक बैठक हुई.

राव सरकार 1996 में सत्ता से बाहर हो गई. लेकिन फरवरी 1997 में तत्कालीन पीएम एचडी देवेगौड़ा ने NSCN-IM के नेताओं के साथ शांति प्रक्रिया पर बातचीत जारी रखी. जुलाई 1997 में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए और उसी साल अगस्त में सीजफायर हो गया.

1997 में सीजफायर हो गया और शांति प्रक्रिया बातचीत जारी रही. 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नगालैंड की यात्रा पर गए. इससे बात और आगे बढ़ी. मगर 2004 में उनके सत्ता से जाने के बाद 2015 तक शांति प्रक्रिया पर कोई खास आगे नहीं बढ़ सकी. आखिरकार अगस्त 2015 में एक समझौता हुआ, लेकिन NSCN-IM का दावा है कि केंद्र उस समझौते का पालन नहीं कर रहा है.

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नगालैंड में उग्रवाद

यहां उग्रवाद पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. दिसंबर 2021 में नागालैंड में सेना की गोलीबारी में 16 लोगों की मौत होने के बाद यहां हालात बहुत खराब हो गए थे. यहां अब भी NSCN और उससे जुड़े संगठनों के बीच संघर्ष होता रहता है.

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जुलाई तक नगालैंड में उग्रवाद की 28 घटनाएं हुई हैं, जिनमें 4 उग्रवादी मारे गए हैं. जुलाई तक सुरक्षाबलों ने 79 उग्रवादियों को गिरफ्तार कर लिया था. वहीं, 17 उग्रवादियों ने सरेंडर कर दिया था. जबकि, पिछले साल 35 उग्रवादी घटनाएं हुई थीं, जिसमें एक उग्रवादी की मौत हो गई थी.

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