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दक्षिण के राज्यों के लिए 'दो बच्चे मीठी खीर' क्यों नहीं? जानें- बुजुर्ग और साउथ V/s नॉर्थ इंडिया की पॉलिटिक्स का गणित क्या

आबादी को लेकर अब एक नई बहस शुरू हो गई है. आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील की है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है.

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भारत की आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर- Meta AI)
भारत की आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर- Meta AI)

एक ओर आबादी के मामले में भारत ने चीन को पछाड़ दिया है तो दूसरी ओर इसे नियंत्रित करने की बजाय दक्षिण के राज्यों में ज्यादा बच्चे पैदा करने की बात की जा रही है.

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दक्षिण के दो राज्यों- आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील की है. सबसे पहले अपील आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू ने ये अपील की. उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत, खासकर आंध्र प्रदेश में बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है. उन्होंने ये भी कहा कि देश में फर्टिलिटी रेट 2.1 है, जबकि आंध्र में ये 1.6 है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो 2047 तक आंध्र में बुजुर्गों की आबादी बहुत होगी.

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सरकार जल्द ही एक नया कानून लाने जा रही है, जिसके बाद वही लोग स्थानीय चुनाव लड़ सकेंगे, जिनके दो या उससे ज्यादा बच्चे होंगे.

तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन तो इससे भी आगे निकल गए. उन्होंने तो नए जोड़ों से 16 बच्चे पैदा करने की अपील की. उन्होंने ये भी कहा कि हमारी आबादी कम हो रही है, जिसका असर हमारी लोकसभा सीटों पर भी पड़ेगा, इसलिए क्यों न हम 16-16 बच्चे पैदा करें.

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मगर ऐसा क्या हुआ कि दक्षिण के राज्यों को अब दो बच्चे मीठी खीर 'नहीं' लग रहे और बात 16-16 बच्चे पैदा करने पर आ गई. दरअसल, इसके पीछे थोड़ी चिंता है और थोड़ी सियासत भी. पहले समझते हैं कि चिंता क्यों?

क्या बढ़ रही है बुजुर्ग आबादी?

भारत में युवा उन्हें माना जाता है जिनकी उम्र 15 से 29 साल के बीच होती है. अभी भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा युवा आबादी रहती है.

केंद्र सरकार की 'यूथ इन इंडिया 2022' की रिपोर्ट बताती है कि 2021 तक भारत की 27 फीसदी से ज्यादा आबादी युवा थी. तब बुजुर्ग आबादी 10 फीसदी के आसपास थी. लेकिन 2031 तक युवा आबादी घटकर 24 फीसदी और 2036 तक 22 फीसदी पर आने का अनुमान है. 

इसके उलट बुजुर्ग आबादी बढ़ने का अनुमान है. 2021 तक भारत में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी 10 फीसदी थी. 2031 तक इनकी आबादी बढ़कर 13 फीसदी के ऊपर पहुंच जाएगी. जबकि, 2036 तक भारत में 15 फीसदी आबादी ऐसी होगी, जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा होगी.

बुजुर्ग आबादी और साउथ V/s नॉर्थ

दक्षिण के राज्यों में आबादी बढ़ने की दर उत्तर के राज्यों की तुलना में धीमी रही. नतीजा ये रहा कि यहां पर बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है और युवाओं की घट रही है.

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केंद्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि 2036 तक दक्षिण के राज्यों में बुजुर्गों की आबादी उत्तरी राज्यों की तुलना में ज्यादा होगी. मसलन, आंध्र में 19 फीसदी, केरल में 23 फीसदी, कर्नाटक और तेलंगाना में 17-17 फीसदी और तमिलनाडु में 21 फीसदी आबादी ऐसी होगी, जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा होगी.

वहीं, उत्तर के राज्यों में ये कम होगी. उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी, बिहार में 11 फीसदी, राजस्थान और मध्य प्रदेश में 13-13 फीसदी, झारखंड में 12, फीसदी और हरियाणा में 14 फीसदी आबादी बुजुर्ग होगी.

मगर ऐसा क्यों?

आजादी के बाद जब 1951 में पहली जनगणना हुई, तब देश की आबादी 36 करोड़ के आसपास थी. 1971 तक आबादी बढ़कर 55 करोड़ पहुंच गई. 

लिहाजा, सरकार ने 70 के दशक में फैमिली प्लानिंग पर जोर दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि दक्षिणी राज्यों ने तो इसे अपनाया और आबादी काबू में की. मगर, उत्तर के राज्यों में ऐसा नहीं हुआ और आबादी तेजी से बढ़ती गई.

ऐसे में उस समय भी दक्षिणी राज्यों की ओर से सवाल उठाया गया कि उन्होंने तो फैमिली प्लानिंग लागू करके आबादी कंट्रोल की और उनके यहां ही सीटें कम हो जाएंगी. सीटें कम होने का मतलब संसद में प्रतिनिधित्व कम होना. 

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इसलिए विवाद हुआ. इसके बाद 1976 में संविधान में संशोधन कर तय कर दिया कि 2001 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही लोकसभा सीटें होंगी. लेकिन 2002 में अटल सरकार ने दोबारा संशोधन कर इसकी सीमा 2026 तक बढ़ा दी.

यह भी पढ़ें: जानिए किस रफ्तार से बूढ़ा हो रहा है भारत? चंद्रबाबू नायडू की आबादी बढ़ाने वाली अपील पर आंकड़े क्या कहते हैं

इसके पीछे सियासत का गणित क्या?

वैसे तो हर 10 लाख की आबादी पर एक सांसद होना चाहिए. 1971 के बाद से लोकसभा सीटों का परिसीमन नहीं हुआ है. अगर परिसीमन होता है तो जिन राज्यों में आबादी कम है, वहां सीटों की संख्या कम होगी. जबकि, जिन राज्यों में आबादी बढ़ी होगी, वहां सीटों की संख्या भी बढ़ेगी.

इस बात को ऐसे समझिए, अभी तमिलनाडु की अनुमानित आबादी 7.70 करोड़ है और वहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. जबकि, मध्य प्रदेश की आबादी 8.76 करोड़ है और यहां 29 लोकसभा सीटें हैं. परिसीमन होता है तो अभी की आबादी के हिसाब से मध्य प्रदेश में 87 लोकसभा सीटें हो जाएंगी और तमिलनाडु में 77 सीटें होंगी. सीटों की ये संख्या हर 10 लाख आबादी पर एक सांसद वाले फॉर्मूले के हिसाब से है. 

एक और उदाहरण देखिए. केरल की अनुमानित आबादी 3.59 करोड़ है. अभी यहां 20 लोकसभा सीटें हैं. उत्तर प्रदेश की आबादी 23.80 करोड़ है और यहां 80 सांसद हैं. अगर वही 10 लाख वाला फॉर्मूला लागू किया जाए तो केरल में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 35 या 36 होगी. जबकि, उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या 235 या उससे ज्यादा भी हो सकती है.

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इसी वजह से दक्षिणी राज्यों को आपत्ति है. उनका यही कहना है कि हमने आबादी नियंत्रित की, केंद्र की योजनाओं को लागू किया और उनके ही यहां लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी.

क्यों घट रही युवा आबादी? तीन बड़े कारण...

1. फर्टिलिटी रेटः कुछ सालों से फर्टिलिटी रेट में गिरावट आ रही है. फर्टिलिटी रेट यानी एक महिला कितने बच्चों औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है. 2011 में फर्टिलिटी रेट 2.4 था, जो 2019 तक घटकर 2.1 पर आ गया. 

2. क्रूड डेथ रेटः भारत में अब डेथ रेट कम होता जा रहा है. क्रूड डेथ रेट का मतलब है कि हर एक हजार लोगों पर कितनी मौतें हो रहीं हैं. 2019 में क्रूड डेथ रेट 6.0 था, जबकि 2011 में ये 7.1 था.

3. औसत आयुः भारत में अब औसत आयु भी बढ़ रही है. 2014-18 तक औसत आयु 69.4 साल थी, जो 2016-20 के बीच बढ़कर 70 साल पहुंच गई. यानी, अब लोगों की उम्र बढ़ रही है, इसलिए बुजुर्ग आबादी भी बढ़ रही है. 

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