मोदी सरकार जिस 'एक देश, एक चुनाव' की बात सालों से करती आ रही थी, अब उसे अमलीजामा पहनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है. बताया जा रहा है कि मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में ही 'एक देश, एक चुनाव' को लेकर बिल लाया जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो 2029 में देशभर में लोकसभा के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हो सकते हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने पर ये जानकारी सामने आई है. 4 जून को लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के पांच दिन बाद 9 जून को मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी.
'एक देश, एक चुनाव' मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है. 2024 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में भी बीजेपी ने इसका जिक्र किया था और वादा किया था कि कमेटी की सिफारिशों को लागू करने पर काम किया जाएगा.
इसी साल 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने एक देश, एक चुनाव के लिए सभी से आगे आने की अपील की थी. तब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, 'देश में बार-बार चुनाव, देश की प्रगति में रुकावट बन रहे हैं, गतिरोध पैदा कर रहे हैं. आज कोई भी योजना को चुनाव के साथ जोड़ देना आसान हो गया है, क्योंकि हर तीन महीने, छह महीने में कहीं न कहीं चुनाव चल रहा है.'
अब सूत्रों ने बताया है कि एनडीए सरकार इसी कार्यकाल में इससे जुड़ा बिल लाना चाहती है. सरकार को इस बिल पर न सिर्फ सहयोगियों, बल्कि दूसरी राजनीतिक पार्टियों से समर्थन मिलने की उम्मीद भी है.
पर ये सब होगा कैसा?
अगर सरकार देश में एक साथ चुनाव कराना चाहती है, तो उसे सबसे पहले संवैधानिक संशोधन करना होगा. पिछले साल संसद में सरकार ने बताया था कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने के लिए संविधान में पांच संशोधन करने होंगे.
- अनुच्छेद-83: इसके मुताबिक, लोकसभा का कार्यकाल पांच साल तक रहेगा. अनुच्छेद- 83(2) में प्रावधान है कि इस कार्यकाल को एक बार में सिर्फ एक साल के लिए बढ़ाया जा सकता है.
- अनुच्छेद-85: राष्ट्रपति को समय से पहले लोकसभा भंग करने का अधिकार दिया गया है.
- अनुच्छेद-172: इस अनुच्छेद में विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का तय किया गया है. हालांकि, अनुच्छेद-83(2) के तहत, विधानसभा का कार्यकाल भी एक साल के लिए बढ़ाया जा सकता है.
- अनुच्छेद-174: जिस तरह से राष्ट्रपति के पास लोकसभा भंग करने का अधिकार है, उसी तरह से अनुच्छेद-174 में राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार दिया गया है.
- अनुच्छेद-356: ये किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का प्रावधान करता है. राज्यपाल की सिफारिश पर किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है.
क्या ऐसा हो सकता है?
संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को सवैधानिक संशोधन करने की शक्ति करता है, बशर्ते इससे संविधान के मूल ढांचे को नुकसान न हो. यानी कि संसद संविधान की मूल संरचना को नहीं बदला जा सकता.
संविधान तो सरकार को संशोधन करने की इजाजत देता है. लेकिन इस संशोधन के लिए बिल लाना होगा. इस बिल को संसद के दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा में पास करवाना जरूरी है.
इतना ही नहीं, अगर संसद के दोनों सदनों से ये बिल पास भी हो जाता है, तब भी कम से कम 15 राज्यों की विधानसभाओं से इसे अनुमोदित करवाना होगा.
क्या समर्थन मिलेगा?
एक देश, एक चुनाव सरकार अगर बिल लाती है तो उसे पास करवाने के लिए राजनीतिक पार्टियों के समर्थन की जरूरत होगी.
केंद्र की एनडीए सरकार में बीजेपी के अलावा चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी, नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की एलजेपी (आर) बड़ी पार्टियां हैं. जेडीयू और एलजेपी (आर) तो एक देश, एक चुनाव के लिए राजी हैं, जबकि टीडीपी ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया था.
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई बनी समिति ने 62 राजनीतिक पार्टियों से संपर्क किया था. इनमें से 32 ने एक देश, एक चुनाव का समर्थन किया था. जबकि, 15 पार्टियां इसके विरोध में थीं. 15 ऐसी पार्टियां थीं, जिन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था.
जेडीयू और एलजेपी (आर) ने एक देश, एक चुनाव का ये कहते हुए समर्थन किया था कि इससे समय और पैसे की बचत हो सकेगी. टीडीपी ने कोई जवाब नहीं दिया था. हालांकि, 2018 में लॉ कमीशन के सामने टीडीपी ने ये तर्क दिया था कि इससे संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है.
वहीं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, सीपीएम और बसपा समेत 15 पार्टियों ने इसका विरोध किया था. जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा, टीडीपी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग समेत 15 पार्टियों ने कोई जवाब नहीं दिया था.
अब आगे क्या?
एक देश, एक चुनाव के लिए सबसे पहले सरकार को बिल लाना होगा. चूंकि ये बिल संविधान संशोधन करेंगे, इसके लिए ये तभी पास होंगे, जब इन्हें संसद के दो तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलेगा.
यानी, लोकसभा में इस बिल को पास कराने के लिए कम से कम 362 और राज्यसभा के लिए 163 सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा.
संसद से पास होने के बाद इस बिल को कम से कम 15 राज्यों की विधानसभा का अनुमोदन भी जरूरी होगा. यानी, 15 राज्यों की विधानसभा से भी इस बिल को पास करवाना जरूरी है. इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्ष के बाद ही ये बिल कानून बन सकेंगे.