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बलूचिस्तान के तुरबत में नेवल बेस पर हमले की कोशिश को पाकिस्तानी सेना ने नाकाम कर दिया है. पाकिस्तान ने इसे आतंकी हमला बताया है.
पाकिस्तानी सेना की मीडिया विंग इंटर-सर्विसेस पब्लिक रिलेशन (ISPR) ने दावा किया है कि तुरबत के पीएनएस सिद्दिक बेस पर आतंकियों ने सोमवार रात हमला करने की कोशिश की थी. लेकिन सेना ने तुरंत इसका जवाब देते हुए इस कोशिश को नाकाम कर दिया.
आईएसपीआर ने बताया कि जवाबी कार्रवाई में बलूचिस्तान फ्रंटियर कोर्प्स के सिपाही नोमान फरीद की मौत हो गई है. पाकिस्तानी सेना ने इस कार्रवाई में चार चरमपंथियों को मार गिराने का दावा भी किया है.
ये हमला ऐसे समय हुआ है, जब कुछ दिन पहले ही बलूचिस्तान में ग्वादर पोर्ट पर आतंकी हमला हुआ था. उस हमले की जिम्मेदारी भी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने ली थी.
तीन तरफ से हुआ था हमला
पीएनएस सिद्दिक पाकिस्तान का दूसरा सबसे बड़ा नेवल एयरबेस है. इस पर हमले की जिम्मेदारी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) की मजीद ब्रिगेड ने ली है.
मकरान के कमिश्नर सईद अहमद उमरानी ने पाकिस्तान की स्थानीय मीडिया 'डॉन' को बताया था कि सोमवार रात को भारी गोलीबारी और बम धमाकों की आवाज आ रही थी. उन्होंने बताया कि हमलावरों ने एयरबेस में तीन तरफ से घुसने की कोशिश की थी. हमलावरों ने तीन तरफ से गोलीबारी शुरू कर दी थी, जिसका तुरंत जवाब दिया और इस कोशिश को नाकाम कर दिया गया.
स्थानीय लोगों ने 'डॉन' को बताया कि तुरबत शहर में दर्जनभर बम धमाकों की आवाज सुनी गई. उसके बाद रात 10 बजे से गोलीबारी शुरू हो गई थी, जो देर रात तक जारी रही.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने बताया कि इस हमले के पीछे उसकी मजीद ब्रिगेड का हाथ था. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को पाकिस्तान सरकार आतंकी और अलगाववादी संगठन मानता है. इस पर कई सालों पहले प्रतिबंध लगा दिया गया था.
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मजीद ब्रिगेड क्या है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ब्रिगेड का नाम दो भाइयों- मजीद लैंगोव सीनियर और मजीद लैंगोव जूनियर के नाम पर रखा गया है. दोनों आत्मघाती हमले में मारे गए थे.
मजीद लैंगोव सीनियर 1974 में आत्मघाती हमले को अंजाम दिया था. उसने पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की हत्या करने की कोशिश भी की थी. वहीं, पाकिस्तान के सुरक्षाबलों ने जब वाहदत कॉलोनी में छापा मारा था, तब अपने साथियों को बचाने के लिए मजीद लैंगोव जूनियर ने आत्मघाती हमला कर दिया था.
मजीद जूनियर की मौत के बाद BLA के दिवंगत नेता असलम आचू ने आत्मघाती हमलों को अंजाम देने वाले एक संगठन को शुरू किया, जिसका नाम मजीद ब्रिगेड रखा. मजीद ब्रिगेड ने अपना पहला सुसाइड अटैक दिसंबर 2011 में किया था. उस हमले में मजीद ब्रिगेड ने पाकिस्तान के पूर्व केंद्रीय मंत्री नासिर मेंगल के बेटे शफिक मेंगल को टारगेट किया था.
'डॉन' के मुताबिक, पैसों और फिदायीनों की कमी के चलते ब्रिगेड लंबे समय तक हमले नहीं कर पाया था. ब्रिगेड ने दूसरा आत्मघाती हमला अगस्त 2018 में किया था. तब मजीद ब्रिगेड ने चीनी इंजीनियरों को ले जा रही एक बस को उड़ा दिया था.
लेकिन बलूचिस्तान में समस्या क्या है?
1947 में बंटवारे के बाद बलूचिस्तान पाकिस्तान के पास चला गया. लेकिन बलूच लोगों का कहना है कि उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल किया गया, जबकि वो आजाद रहना चाहते थे. इस कारण वहां के लोगों का पाकिस्तान की सेना और सरकार के साथ संघर्ष शुरू हो गया, जो आजतक जारी है.
बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले कई संगठन हैं. बताया जाता है कि बलूचिस्तान और पाकिस्तान सरकार के बीच संघर्ष की शुरुआत 1948 में ही हो गई थी. विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नजरअंदाज करने का आरोप भी बलूच लोग लगाते रहे हैं.
वहीं, बलूचिस्तान में उठ रही इस अलगाववाद और उग्रवाद की आवाज को पाकिस्तान की सेना और पुलिस दबाती रही है. कई बलूच एक्टिविस्टों की हत्या, किडनैपिंग और टॉर्चर करने के आरोप पाकिस्तानी सेना पर लगते रहे हैं.
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बलूचिस्तान कैसे बना पाकिस्तान का हिस्सा?
बलूचिस्तान में चार रियासतें- कलात, खारान, लॉस बुला और मकरान हुआ करती थीं. इनमें सबसे ताकतवर कलात रियासत थी. 1870 में अंग्रेजों ने कलात के खान से एक संधि की, जिसके तहत सारी रियासतें ब्रिटिशर्स के अधीन हो गईं.
इसके बाद जब बंटवारे का वक्त आया तो कलात ने किसी के साथ न जाकर आजाद रहने का ही फैसला लिया. कलात के आखिरी 'खान' मीर अहमद यार खान और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच अच्छी दोस्ती थी. उन्हें उम्मीद थी कि जिन्ना से अच्छी दोस्ती उन्हें पाकिस्तान में शामिल होने के बजाय आजाद रखने में मदद करेगी.
11 अगस्त 1947 को मुस्लिम लीग और कलात के बीच एक समझौता हुआ. इसमें मुस्लिम लीग ने माना कि कलात की अपनी अलग पहचान है और हम उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं.
लेकिन फिर धीरे-धीरे बलूचिस्तान की बाकी रियासतों ने पाकिस्तान के साथ जाने की इच्छा जाहिर की. पहले खारान और फिर लॉस बुला और मकरान ने भी पाकिस्तान में विलय की ख्वाहिश जताई. 17 मार्च 1948 को तीनों रियासतें पाकिस्तान में मिल गईं.
इस बीच भारत के तत्कालीन रक्षा सचिव वीपी मेनन का एक बयान ऑल इंडिया रेडियो में चला. इसमें वीपी मेनन ने कहा कि कलात के खान भारत के साथ विलय चाहते हैं. अगले ही दिन पाकिस्तान की सेना ने कलात पर धावा बोल दिया. कलात के खान को अगवा कर कराची ले जाया गया, जहां उनसे जबरदस्ती पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज पर दस्तखत करवा लिए गए.
और फिर शुरू हुई आजादी की लड़ाई
अभी विलय संधि की स्याही सूखी भी नहीं थी कि बलूचिस्तान में विद्रोह शुरू हो गया. कलात के खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस समझौते के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया. और इस तरह बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई शुरू हुई.
1948 में बलूचिस्तान और पाकिस्तान के बीच पहली जंग हुई. इसके बाद 1958-59, 1962-63 और 1973-77 में भी जंग लड़ी गई थी. साल 2003 से ही बलूचिस्तान में कई संगठन पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ लड़ रहे हैं.
पाकिस्तान पर इन विद्रोहों से क्रूरता से निपटने के आरोप लगते रहे हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट बताती है कि बलूचिस्तान में आजादी की आवाज दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना बलोच एक्टिविस्ट, टीचर्स, पत्रकारों और वकीलों को अगवा करती है, फिर उन्हें टॉर्चर करती है और आखिर में उनकी हत्या कर लाश फेंक देती है.
आतंकवाद या अलगाववाद!
कुछ सालों तक बलूचिस्तान शांत रहा. लेकिन साल 2000 के बाद बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के गठन के बाद से यहां अशांति काफी बढ़ गई है.
BLA की तरह ही एक और संगठन है- बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF). वैसे तो BLF की शुरुआत 1964 में हुई थी, लेकिन 2000 के बाद BLA के गठन के बाद ये संगठन फिर से खड़ा हुआ.
बलूचिस्तान में आज के समय कई सारे संगठन हैं. पाकिस्तान इन्हें आतंकी संगठन बताता है, तो इनका कहना है कि ये आजादी की जंग लड़ रहे हैं.
बलूच अक्सर पाकिस्तानी सरकार पर उन्हें नजरअंदाज करने का आरोप भी लगाते रहे हैं. बलूचिस्तान सबसे ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों वाला प्रांत है, लेकिन सबसे कम विकास भी यहीं हुआ है.
सबसे बड़ा प्रांत है बलूचिस्तान
बलूचिस्तान तीन देशों- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान तक फैला हुआ है. इसका उत्तरी हिस्सा अफगानिस्तान के निमरुज, हेलमंड और कंधार तक फैला हुआ है. पश्चिमी हिस्सा ईरान में है, जिसे सिस्तान-बलूचिस्तान कहा जाता है. बाकी सब पाकिस्तान में है.
क्षेत्रफल के लिहाज से ये पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है. इसका नाम यहां रहने वाले बलोच लोगों के नाम बलूचिस्तान पड़ा. ये लगभग साढ़े तीन लाख वर्ग किलोमीटर के हिस्से में फैला हुआ है. पाकिस्तान की जमीन का करीब 44 फीसदी हिस्सा भी बलूचिस्तान में ही पड़ता है.
बलूचिस्तान भले ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन वहां महज सवा करोड़ की आबादी ही रहती है. ये पूरा इलाका गैस और कोयला जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, लेकिन उसके बावजूद यहां बहुत गरीबी है.
बलूच नेता राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी का इल्जाम भी लगाते हैं. सबसे बड़ा प्रांत होने के बावजूद बलूचिस्तान में नेशनल असेंबली (संसद) की 17 सीटें ही हैं.