वैसे तो देश में महिलाओं की आबादी 48 फीसदी से ज्यादा है. लेकिन राजनीति में संसद और विधानसभाओं में इनकी हिस्सेदारी नाममात्र की है. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने के मकसद से 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' लाया गया है.
अगर ये बिल कानून बन जाता है तो लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं की एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.
महिलाओं को आरक्षण देने वाले इस बिल को ऐतिहासिक बताया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक पावन शुरुआत हो रही है. अगर सर्वसम्मति से कानून बनेगा, तो इसकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी.
ये बिल पहले ही 27 साल से संसद में अटका पड़ा है. और अभी इसके कानून बनने और फिर लागू होने में लंबा वक्त लग सकता है. पर सवाल उठता है कि आखिर इस बिल की जरूरत पड़ी क्यों?
1. क्योंकि... संसद में कुछ ही महिलाएं
लोकसभा में इस समय 82 और राज्यसभा में सिर्फ 31 महिला सदस्य ही हैं. यानी, दोनों सदनों में महिलाओं की हिस्सेदारी 15 फीसदी भी नहीं है.
1951-52 में जब पहला लोकसभा चुनाव हुआ था, तब सिर्फ 6.9 फीसदी महिलाएं ही सांसद बनकर आई थीं.
चुनाव आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में 726 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन इनमें से सिर्फ 78 ही जीती थीं. यानी, 10 फीसदी के आसपास.
2. क्योंकि... विधानसभाओं में भी यही स्थिति
इसी तरह विधानसभाओं में भी इनकी हिस्सेदारी बहुत कम है. 19 विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी से भी कम है.
जिन विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10 फीसदी से अधिक है. उनमें बिहार (10.70%), छत्तीसगढ़ (14.44%), हरियाणा (10%), झारखंड (12.35%), पंजाब (11.11%), राजस्थान (12%), उत्तराखंड (11.43%), उत्तर प्रदेश (11.66%), पश्चिम बंगाल (13.70%) और दिल्ली (11.43%) है.
गुजरात विधानसभा में 8.2 फीसदी महिला विधायक हैं जबकि हिमाचल प्रदेश विधानसभा में सिर्फ एक ही महिला विधायक है.
नागालैंड में इस साल हुए चुनाव में पहली बार दो महिलाएं चुनकर आईं हैं. एनडीए की हेकानी जखालु और सलहौतुओनुओ क्रूस राज्य की पहली महिला विधायक हैं.
3. क्योंकि... सिर्फ एक राज्य में महिला मुख्यमंत्री
आजादी से अब तक सिर्फ 16 महिलाएं ही मुख्यमंत्री बन सकीं हैं. सुचेता कृपलानी देश की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं. स्वतंत्रता सेनानी रहीं सुचेता कृपलानी 1963 से 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं हैं.
इस समय देश में ममता बनर्जी ही इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं. ममता बनर्जी 2011 से ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं. ममता बनर्जी अब तक पश्चिम बंगाल की पहली और इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं.
शीला दीक्षित (दिल्ली), जयललिता (तमिलनाडु) और ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल) ही सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहीं हैं.
देश के 18 राज्य ऐसे हैं जहां आजतक कोई भी महिला मुख्यमंत्री नहीं बन सकी है. सिर्फ दिल्ली और उत्तर प्रदेश ही ऐसे राज्य हैं जहां अब तक दो बार महिलाएं मुख्यमंत्री रहीं हैं.
वीएन जानकी रामचंद्रन महज 23 दिन तक मुख्यमंत्री रही थीं. जानकी 7 जनवरी 1988 से 30 जनवरी 1988 तक ही तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं. उनके बाद सबसे छोटा कार्यकाल सुषमा स्वराज का है, जो 12 अक्टूबर 1998 से 3 दिसंबर 1998 तक 52 दिनों के लिए दिल्ली की सीएम थीं.
4. क्योंकि... महिलाओं के प्रतिनिधित्व में हम बहुत पीछे
राजनीति में महिलाओं को प्रतिनिधत्व देने के मामले में भारत अपने पड़ोसियों पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पीछे है. दुनिया की सभी सांसदों में सिर्फ 25% ही महिलाएं हैं. रवांडा, क्यूबा, बोलीविया और यूएई ही ऐसे देश हैं, जहां 50% से ज्यादा महिला सांसद हैं.
स्वीडन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (आईडीईए) के अनुसार, लगभग 40 देशों में या तो संवैधानिक संशोधन या कानूनों में बदलाव कर संसद में महिलाओं के लिए कोटा निर्धारित किया गया.
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए 60 सीटें आरक्षित हैं. बांग्लादेश की संसद में महिलाओं के लिए 50 सीटें आरक्षित हैं. नेपाल की संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित हैं.
तालिबान के शासन से पहले अफगानिस्तान की संसद में महिलाओं के लिए 27 फीसदी सीटें आरक्षित थीं. यूएई की फेडरल नेशनल काउंसिल (एफएनसी) में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित हैं. इंडोनेशिया में उम्मीदवारों में कम से कम 30 फीसदी महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.
5. क्योंकि... देश की आधी आबादी हैं महिलाएं
2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में इस समय महिलाओं की आबादी 48.5% है. लेकिन जिस संसद और विधानसभाओं में कानून बनते हैं, वहां उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है.
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इसलिए भी बढ़ना चाहिए, क्योंकि राजनीति में अब महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहीं हैं.
आजादी से अब तक 17 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. लेकिन 2014 के आम चुनाव में पहली बार महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 60% के ऊपर गया था. 2014 में 65.6% महिलाओं ने वोट दिया था. वहीं, 2019 के चुनाव में ये और बढ़कर 67.2% चला गया था.
इतना ही नहीं, 2019 के चुनाव में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने वोट डाला था. ये दिखाता है कि अब राजनीति में महिलाओं की दिलचस्पी बढ़ रही है, लेकिन उनका प्रतिनिधित्व काफी कम है.
महिला आरक्षण से ये होगा असर
महिला आरक्षण पर कानून बन जाता है और लागू हो जाता है तो इसका बहुत बड़ा असर होगा. लोकसभा में 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी. यानी, कम से कम 181 महिला सांसद तो रहेंगी ही. इसी तरह से विधानसभाओं में भी 33% सीटें महिलाओं के लिए रहेंगी. कुल मिलाकर, लोकसभा और विधानसभाओं में हर तीसरी सदस्य महिला होगी.