scorecardresearch
 

PM Modi in US: एक तरफ अमेरिका, दूसरी तरफ रूस... कैसे दो शक्तियों के बीच 'पावर बैलेंस' बना रहा है भारत?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के लिए रवाना हो चुका है. ये उनकी पहली स्टेट विजिट है. पीएम मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनकी पत्नी जिल बाइडेन के बुलावे पर अमेरिका पहुंचे हैं. पीएम मोदी का ये दौरा ऐसे समय हो रहा है जब रूस-यूक्रेन संकट पर भारत के रवैये पर सवाल उठते रहे हैं. ऐसे में जानते हैं कि भारत इन दोनों देशों के बीच पावर बैलेंस बनाने में कितना कामयाब रहा है?

Advertisement
X
पीएम मोदी तीन दिन के अमेरिकी दौरे पर हैं. (फोटो क्रेडिट- पीएमओ)
पीएम मोदी तीन दिन के अमेरिकी दौरे पर हैं. (फोटो क्रेडिट- पीएमओ)

न तो अमेरिका के लिए रूस को छोड़ा जा सकता है. और न ही रूस के लिए अमेरिका को... ये भारत की नीति है. और भारत इसे बखूबी मानता है. आज से नहीं, बल्कि दशकों से. या यूं कहें कि हमेशा से. 

Advertisement

इसे ऐसे समझिए कि यूक्रेन पर हमले के लिए भारत ने न तो सीधे-सीधे रूस का साथ दिया और न ही उसके खिलाफ रहा. संयुक्त राष्ट्र में जब रूस के खिलाफ कोई प्रस्ताव आया तो भारत ने इससे दूरी बना ली. लेकिन, भारत ने हमेशा से यूक्रेन में आम लोगों के मारे जाने की निंदा की. 

भारत के इस रवैये ने अमेरिका को नाराज भी किया. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कई बार कहा कि रूस को लेकर भारत का रवैया 'ढुलमुल' रहा है. 

अब इन्हीं बाइडेन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्टेट विजिट के लिए बुलाया है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और उनकी पत्नी जिल बाइडेन के बुलावे पर अमेरिका पहुंचे हैं. पीएम मोदी तीन दिन अमेरिका में रहेंगे. इस दौरे में पीएम मोदी व्हाइट हाउस में जो बाइडेन के साथ बैठक करेंगे. पीएम मोदी के सम्मान में स्टेट डिनर का आयोजन होगा. अगले दिन कांग्रेस के ज्वॉइंट सेशन को संबोधित करेंगे. आखिरी दिन उपराष्ट्रपति कमला हैरिस और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से भी पीएम मोदी की मुलाकात होगी.

Advertisement

खैर, एक तरह रूस को पकड़े रहना और दूसरी तरफ अमेरिका को भी नाराज न करना... दिखाता है कि भारत किस तरह से 'पावर बैलेंस' बना रहा है.

पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा का फुल कवरेज यहां देखें

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ पीएम मोदी. (फाइल फोटो-AP/Getty Images)

कैसे पावर बैलेंस बना रहा है भारत?

प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के लिए रवाना हो गए हैं. लेकिन उससे पहले उन्होंने अमेरिकी अखबार 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' को इंटरव्यू दिया. इसमें उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया को लगता है कि हम तटस्थ हैं, लेकिन हम तटस्थ नहीं हैं, बल्कि शांति के पक्ष में खड़े हैं.

पीएम मोदी ने कहा, 'रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत के रुख को पूरी दुनिया अच्छी तरह से जानती और समझती है. दुनिया को पूरा भरोसा है कि भारत की पहली प्राथमिकता शांति है. जहां बात रूस-यूक्रेन संघर्ष की है तो कुछ लोग कहते हैं हम तटस्थ हैं. लेकिन हम तटस्थ नहीं हैं. हम शांति के पक्ष में हैं.'

इस इंटरव्यू में भारत-अमेरिका रिश्तों पर पीएम मोदी ने कहा, दोनों देशों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और गहरे हुए हैं, क्योंकि भारत भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में वैश्विक मंच पर अपनी सही जगह सुरक्षित करने के लिए आगे बढ़ रहा है.

Advertisement

पीएम मोदी की इन बातों से दो बातें साफ हो गईं. पहला ये कि भारत रूस-यूक्रेन जंग में सिर्फ और सिर्फ 'शांति' के साथ खड़ा है. वो न तो रूस के खिलाफ है और न यूक्रेन के साथ. और दूसरी बात कि अंतरराष्ट्रीय मसलों को लेकर भले ही कितने मतभेद हों, भारत और अमेरिका की दोस्ती पहले से भी ज्यादा मजबूत है.

ये भी पढ़ें-- अमेरिका के वो सीक्रेट, जिन्होंने उसे बना दिया दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क

एक ही नीति- 'गुटनिरपेक्ष'

आजादी के बाद से ही भारत ने विदेश नीति के मामले में जवाहर लाल नेहरू की 'गुटनिरपेक्ष' का ही पालन किया है. भारत ने कभी किसी को खुश करने के लिए दूसरे को नाराज नहीं किया. कुल मिलाकर भारत की नीति 'खुले दरवाजे' की तरह रही है.

उदाहरण के लिए, भारत ने क्यूबा, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखे तो दूसरी ओर अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ भी अच्छी दोस्ती रखी.

नेहरू का मानना था, 'दुनिया में रोज कई चीजें हो रही हैं और इन्हें हम पूरी तरह से नापसंद करते हैं लेकिन हम इसकी निंदा नहीं कर सकते, क्योंकि जब कोई समस्या का समाधान करने की कोशिश कर रहा होता है तो किसी का नाम लेने या निंदा करने से कोई मदद नहीं मिलती.'

Advertisement

नेहरू की यही नीति आज भी भारत के लिए मददगार साबित होती है. खासकर ऐसे समय में, जब उसके दो दोस्त आपस में भिड़ रहे हों. बात चाहे 1979 में अफगानिस्तान युद्ध की हो या 2003 के इराक युद्ध की या फिर अभी चल रहे रूस-यूक्रेन की... भारत ने हर बार किसी का नाम लिए बगैर युद्ध में आम लोगों के मारे जाने की निंदा की है.

रूसी राष्ट्रपति पुतिन और पीएम मोदी. (फाइल फोटो- Getty Images)

...रूस का साथ क्यों नहीं छोड़ सकता भारत?

रूस के साथ भारत की नजदीकियां उस समय से ही मजबूत हैं, जब वो सोवियत संघ हुआ करता था. भारत की आजादी से पहले भी नेहरू की वैचारिक नजदीकी सोवियत संघ के साथ ही थी. 

आजादी के बाद भारत और सोवियत संघ की दोस्ती और मजबूत हो गई. लेकिन ये दोस्ती तब और मजबूत हुई, जब 1971 में भारत और पाकिस्तान की जंग हुई. जंग की इस घड़ी में सोवियत संघ ही था, जिसने भारत का साथ दिया. उस समय अमेरिका ने तो पाकिस्तान का ही साथ दिया. 

1971 की जंग से कुछ महीने पहले भारत और सोवियत संघ के बीच एक अहम समझौता हुआ था. इसमें सोवियत संघ ने भरोसा दिलाया कि युद्ध की स्थिति में वो न सिर्फ राजनयिक तौर पर बल्कि, हथियारों के मोर्चे पर भी भारत का साथ देगा.

Advertisement

इतना ही नहीं, 1999 में भारत ने जब परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका ने इसका विरोध किया. अमेरिका ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध भी लगा दिए. लेकिन रूस ने ऐसा कुछ नहीं किया. 

तो क्या अमेरिका अच्छा दोस्त नहीं है?

ऐसा नहीं है. लेकिन भारत के लिए अमेरिका पर भरोसा कर पाना थोड़ा मुश्किल सा होता है. उसकी वजह भी है. 1947 में जब भारत और पाकिस्तान, दो अलग-अलग मुल्क बने. तब से ही अमेरिका की पाकिस्तान से नजदीकियां रहीं. 

इतना ही नहीं, जब कई दशकों तक परमाणु हथियारों को लेकर अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध चलता रहा तो पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में था. अमेरिका और पाकिस्तान की 'दोस्ती' ने भारत को थोड़ा असहज बना रखा.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत और अमेरिका 'अच्छे दोस्त' नहीं हैं. फर्क इतना है कि रूस के साथ भारत की दोस्ती आजादी से पहले की है. जबकि, अमेरिका से भारत की अच्छी दोस्ती को अभी कुछ दशक ही हुए हैं.

अमेरिका से नजदीकियां बढ़नीं तब शुरू हुईं, जब 90 के दशक में भारत ने अपना बाजार खोल दिया. हालांकि, इसका नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान को चीन के साथ जाना पड़ा. आज पाकिस्तान और चीन का साथ रहना भी एक तरह से 'मजबूरी' का रिश्ता ही बनकर रह गया है.

Advertisement

भारत और अमेरिका के खट्टे-मीठे रिश्तों की एक वजह ये भी है कि जब भी वहां सरकार बदलती है तो नीतियां भी बदल जाती हैं. ट्रम्प के दौर में भारत को लेकर अमेरिका का जो रुख था, वैसा बाइडेन की सरकार में नहीं है. 

हालांकि, मोदी सरकार में भारत की अमेरिका से दोस्ती पहले से काफी मजबूत हुई है. इसकी एक वजह चीन भी है. पिछले कुछ सालों में भारत और चीन के रिश्ते बहुत खराब हुए हैं. 2017 में डोकलाम में तनातनी, 2020 में गलवान घाटी में हिंसक झड़प तो कभी अरुणाचल के तवांग में दोनों देशों के सैनिकों को आपस में भिड़ जाना.

लेकिन, रूस में बीते 20 साल से व्लादिमीर पुतिन ही सत्ता में हैं. इसलिए भारत को लेकर रूस की नीतियां जैसी पहले थीं, वैसी ही आज भी हैं.

पीएम मोदी और जो बाइडेन. (फाइल फोटो-Getty Images)

भारत के लिए कितनी बड़ी जरूरत है रूस?

यूक्रेन जंग के कारण रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे. ऐसे में रूस ने भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में कम कीमत पर कच्चा तेल देने की पेशकश की. भारत ने इसे मान लिया. 

यूक्रेन युद्ध से पहले तक रूस से भारत करीब एक प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता था. लेकिन अब कच्चे तेल का आयात 42 फीसदी के पार चला गया है. 

Advertisement

रूस से भारत हर दिन अब 20 लाख बैरल कच्चा तेल खरीद रहा है. रूस भारत को 68.21 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से कच्चा तेल दे रहा है. जबकि सऊदी अरब 86.96 डॉलर और इराक 77.77 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर तेल बेच रहे हैं. 

यही वजह है कि भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है. इसे ऐसे समझ लीजिए कि जितना कच्चा तेल सऊदी अरब, इराक, यूएई और अमेरिका से नहीं आ रहा, उससे कहीं ज्यादा रूस से आ रहा है.

रूस से कम कीमत पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत की आलोचना भी होती है. लेकिन इस पर विशेषज्ञों कहते हैं कि जब अमेरिका रूस से यूरेनियम खरीद सकता है, यूरोपीय देश गैस खरीद सकते हैं, तो फिर भारत कच्चा तेल क्यों नहीं खरीद सकता? 

सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि हथियारों के लिए भी भारत की निर्भरता रूस पर ही सबसे ज्यादा है. भारत को सबसे ज्यादा हथियार बेचने वाला रूस ही है. भारत और रूस के बीच ये रणनीतिक साझेदारी 1970 से ही है. हथियारों और मिलिट्री टेक्नोलॉजी के लिए भारत पहले सोवियत संघ और फिर रूस पर निर्भर रहा है.

स्वीडिश संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार भारत खरीद रहा है. भारत को सबसे ज्यादा हथियार रूस से मिल रहे हैं.

सिप्री की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2022 के बीच भारत के हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 45% रही. जबकि, दूसरे नंबर पर 29% हिस्सेदारी के साथ फ्रांस रहा. तीसरे नंबर पर अमेरिका है, जिसकी हिस्सेदारी 11% रही थी.

(फाइल फोटो- Getty Images)

क्या अमेरिका ले सकता है रूस की जगह?

अमेरिका पूरी कोशिश में है कि वो भारत के लिए रूस की जगह ले ले. कम से कम हथियारों के मामले में. पर इसे टेढ़ी खीर ही माना जाता है.

इसकी भी अपनी वजहें हैं. पहली तो यही कि रूस की तरह अमेरिका टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं करता है. दूसरी ये कि रूस के मुकाबले अमेरिकी हथियार कहीं ज्यादा महंगे होते हैं. शायद यही वजह है कि जो अमेरिका कभी भारत के लिए हथियारों की दूसरी सबसे बड़ी दुकान हुआ करता था, वो अब तीसरे नंबर पर खिसक गया है.

हालांकि, इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी दौरे में कई अहम समझौते होने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि ये भारत को सुपरपावर बनाने वाली अब तक की सबसे बड़ी डिफेंस डील होगी.

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने पिछले हफ्ते ही अमेरिकी प्रीडेटर ड्रोन 31 MQ-9B की खरीद को मंजूरी दी है. माना जा रहा है कि पीएम मोदी इस तीन अरब डॉलर की डील का ऐलान कर सकते हैं. इसके अलावा इस दौरे में GE F414 इंजन का निर्माण भारत में ही होने पर मुहर लग जाएगी. ऐसा होता है तो फिर भारत में ही जेट इंजन बनाए जा सकेंगे. 

इसके साथ ही पीएम मोदी के इस दौरे में स्ट्राइकर बख्तरबंद वाहनों के साझा उत्पादन का समझौता भी हो सकता है. स्ट्राइक को दुनिया की सबसे ताकतवर बख्तरबंद गाड़ियां माना जाता है. 

बेहतर 'बैलेंस' बना रहा भारत

भारत अपनी विदेश नीति के जरिए बेहतर 'बैलेंस' बनाने में कामयाब रहा है. भारत के इस समय दुनिया के सभी मुल्कों के साथ अच्छे रिश्ते हैं. 

बात जब अमेरिका और रूस के साथ रिश्तों की आती है, तो यहां भी भारत का दोनों देशों के साथ बेहतर तालमेल है. 

ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत के अमेरिका से रिश्ते रूस के खिलाफ नहीं है और रूस के भारत से रिश्ते अमेरिका के खिलाफ नहीं है. इसलिए भारत दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को कायम रखने में कामयाब रहा है.

 

Advertisement
Advertisement