scorecardresearch
 

डील, डिप्लोमेसी एंड दोस्ती... PM मोदी के अमेरिका दौरे के चीन और रूस के लिए क्या मायने

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा कई मायनों में खास रही है. पीएम मोदी की ये यात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि ये बताती है कि खट्टे-मीठे रहे भारत-अमेरिका के रिश्तों में अब बदलाव आ रहा है.

Advertisement
X
प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन. (फाइल फोटो-PTI)
प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन. (फाइल फोटो-PTI)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से लौटने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि भारत और अमेरिका की दोस्ती दुनिया के लिए सबसे जरूरी है. बाइडेन ने ट्वीट किया, 'अमेरिका और भारत की दोस्ती दुनिया में सबसे जरूरी दोस्ती में से एक है. दोनों एक दूसरे के करीब आए हैं. दोनों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और गतिशील हुए हैं.'

Advertisement

बाइडेन का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने भी ट्वीट कर लिखा, 'मैं आपकी बात से सहमत हूं. हमारे देशों की दोस्ती दुनिया की भलाई की ताकत है.' पीएम मोदी ने ये भी लिखा कि इस यात्रा से दोनों देशों का रिश्ता और भी मजबूत होगा.

व्हाइट हाउस ने बयान जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच डिफेंस, स्पेस और ट्रेड जैसे प्रमुख क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए.

पीएम मोदी की ये यात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि ये बताती है कि खट्टे-मीठे रहे भारत-अमेरिका के रिश्तों में अब बदलाव आ रहा है. दोनों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा गहरे हुए हैं. पीएम मोदी ये यात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि इस पर दुनियाभर की नजरें टिकी थीं. इस यात्रा से सबसे ज्यादा मिर्ची चीन को लगी. उसने तो साफ-साफ कह दिया कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका, भारत से दोस्ती बढ़ा रहा है. 

Advertisement

चीन के खिलाफ साथ आ रहे भारत-अमेरिका?

बीते कुछ सालों में चीन, अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. चीन को लेकर माना जाता रहा है कि वही भविष्य में अमेरिका को टक्कर दे सकता है. बात चाहे फिर मजबूत अर्थव्यवस्था की हो या फिर मजबूत सेना की. दोनों ही मामलों में चीन अब अमेरिका को टक्कर दे रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन से बिगड़ते रिश्ते ही अमेरिका को भारत के करीब ला रहे हैं. क्योंकि भारत का साथ लेकर अमेरिका, चीन को चुनौती दे सकता है. चीन भी यही मानता है.

चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने रविवार को एक लेख में लिखा कि लंबे समय से अमेरिका, चीन से निपटने के लिए भारत का सहारा लेता रहा है. अखबार लिखता है कि अमेरिका ऐसे देशों से गठजोड़ करता है, जिनसे उसे फायदा हो सके. वो अपने हितों के आधार पर ही देशों को वरीयता देता है.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, अमेरिका के लिए भारत बिल्कुल सही सहयोगी है, क्योंकि वही उसके सभी लक्ष्यों को पूरा कर सकता है. 

इस लेख में चेतावनी देते हुए ये भी लिखा गया है कि अमेरिका से दोस्ती बढ़ाते वक्त भारत को सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि उसका इतिहास पीठ में छुरा घोंपने वाला रहा है. अमेरिका अपने दोस्तों को धोखा देने के लिए बदनाम है. अमेरिका और भारत के संबंध टिकाऊ नहीं हैं. अमेरिका ने अभी भारत के लिए अपने दरवाजे सिर्फ इसलिए खोले हैं, ताकि वो चीन से निपट सके.

Advertisement

ऐसे में चीन का मुकाबला करने के लिए भारत से अच्छे रिश्ते बनाना अमेरिका की मजबूरी भी है. इसकी वजह भी है. और वो ये कि चीन की तरह ही भारत भी बड़ी आबादी वाला देश है. भारत और चीन की सेना भी लगभग बराबर है. भारत एक बड़ा बाजार भी है. लिहाजा, भारत को नजरअंदाज कर चीन का मुकाबला नहीं किया जा सकता.

भारत बड़ा बाजार

भारत की आबादी 140 करोड़ से ज्यादा है. दुनिया की नजरों में ये एक बड़ा बाजार है. हर कोई अपना सामान भारत में बेचना चाहता है. इतना ही नहीं, भारत में मिडिल क्लास बढ़ रहा है. उसकी खर्च करने की क्षमता भी बढ़ रही है. 

अमेरिका की नजर भी भारत के इस बाजार पर है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी दौरे के दौरान ही दोनों देशों के बीच चल रहे छह अलग-अलग व्यापारिक मुद्दों को सुलझा लिया गया है, जिसमें टैरिफ का मुद्दा भी शामिल है.

इसके अलावा, 2022-23 में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर रहा. दोनों देशों के बीच 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार हुआ. 

अमेरिका के साथ कारोबार करने में सिर्फ उसकी ही नहीं, बल्कि भारत की भी भलाई है. क्योंकि अमेरिका के साथ कारोबार करने में भारत का ट्रेड बैलेंस पॉजिटिव रहता है. वो इसलिए क्योंकि भारत, अमेरिका को बेचता ज्यादा है और वहां से खरीदता कम है.

Advertisement

जबकि, चीन के साथ ऐसा नहीं है. क्योंकि भारत, चीन से खरीदता ज्यादा है और बेचता कम है. 

साउथ चाइना सी में पॉवर बैलेंस

दक्षिण चीन सागर पर अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से तनातनी रही है. दक्षिण चीन सागर पर चीन अपना दावा करता है. इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ने वाला ये समुद्री इलाका 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है.

कुछ साल पहले चीन ने इस समंदर में अपना बुनियादी ढांचा बनाना शुरू किया था. पहले चीन ने यहां बंदरगाह बनाया. फिर हवाई पट्टी. और फिर देखते ही देखते एक आर्टिफिशियल द्वीप तैयार कर यहां सैन्य अड्डा बना दिया.

जब चीन की इस गतिविधि पर सवाल उठे तो उसने दावा किया कि दक्षिण चीन सागर से उसका दो हजार साल पुराना ताल्लुक है.

चीन की देखा-देखी अमेरिका ने भी अपनी गतिविधि बढ़ा दी. दक्षिण चीन सागर के नजदीक बसे देशों में अमेरिकी सेना ने युद्धाभ्यास कर चीन को सीधी चुनौती दी. लेकिन दक्षिण चीन सागर में खुद को सही साबित करने के लिए अमेरिका को भारत जैसे मजबूत देश की जरूरत है. 

दरअसल, भारत दक्षिण चीन सागर को एक न्यूट्रल जगह मानता है. भारत का मानना है कि ये किसी एक देश का समुद्र नहीं है. अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी इस बात का डटा रहे. क्योंकि इस बात पर डटा रहना भी एक तरह से समर्थन ही होगा.

Advertisement
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ पीएम मोदी. (फाइल फोटो)

रूस से दूर करने की कोशिश

आजादी के बाद से ही भारत, अमेरिका के मुकाबले रूस के ज्यादा करीब रहा है. अमेरिका इस करीबी को और ज्यादा नहीं बढ़ने देना नहीं चाहता. और इसके लिए अमेरिका अब रूस वाला फॉर्मूला ही अपना रहा है.

दरअसल, दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार भारत है. स्वीडिश संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) की रिपोर्ट बताती है कि 2018 से 2022 के बीच भारत ने सबसे ज्यादा हथियार खरीदे हैं.

सिप्री के मुताबिक, भारत को सबसे ज्यादा हथियार रूस से मिल रहे हैं. 2018 से 2022 के बीच भारत के हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 45% रही. जबकि, दूसरे नंबर पर 29% हिस्सेदारी के साथ फ्रांस रहा. तीसरे नंबर पर अमेरिका है, जिसकी हिस्सेदारी 11% है.

अमेरिका हथियारों के मामले में रूस की जगह लेना चाहता है. पर अब तक दिक्कत ये थी कि रूस की तरह अमेरिका टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं करता है. इतना ही नहीं, रूस के मुकाबले अमेरिकी हथियार कहीं ज्यादा महंगे होते हैं.

लेकिन अब पीएम मोदी के अमेरिकी दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच लड़ाकू विमानों के इंजन मिलकर बनाने पर समझौता हुआ है. ये समझौता अमेरिका की GE एयरोस्पेस और भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच हुआ है. GE एयरोस्पेस F414 इंजन बनाती है और यही इंजन अब तेजस विमान के लिए HAL के साथ मिलकर बनाएगी. 

Advertisement

इतना ही नहीं, भारत और अमेरिका के बीच आर्म्ड ड्रोन की खरीद की डील भी हुई है. भारत ने अमेरिका से तीन अरब डॉलर में 31 MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन खरीदेगा. 

 

Advertisement
Advertisement