तख्तापलट के बाद सीरिया की हालत फिलहाल खाली पड़ी जमीन की तरह हो चुकी है, जिसपर हर कोई अपना हक जताना, या अपनी मर्जी बरतना चाहता है. हाल में वहां के कट्टरपंथी नेता अहमद अल-शरा की एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें वे महिला से सिर ढंकने को कह रहे हैं. इसके बाद से तमाम दुनिया में अनुमान लग रहे हैं कि असद परिवार की तानाशाही से छूटकर सीरिया इस्लामिक चरमपंथ के हाथ में पड़ने जा रहा है. अगर ऐसा न हुआ तो भी इसकी संभावना कम है कि इस देश में जल्द लोकतंत्र आ सके. कई देशों का पैटर्न यही बताता है कि देश का राजनैतिक भविष्य अभी अस्थिर ही रहेगा.
अरब स्प्रिंग के दौरान साल 2011 में लीबिया में विद्रोही समूहों ने तत्कालीन तानाशाह मुअम्मर अल गद्दाफी की सरकार को गिरा दिया. कर्नल गद्दाफी 40 से ज्यादा सालों से देश चला रहे थे. उन्हें हटाने के लिए मिलिटेंट गुट एक अंब्रेला के नीचे आए, जिसे नाम दिया- नेशनल ट्रांजिशन काउंसिल. तब लगा था कि देश बदलने वाला है, हालांकि इस घटना को तेरह साल बीत चुके लेकिन लीबिया अब भी अस्थिर है. पहले एकजुट हुए मिलिटेंट समूह अब छिटक चुके. हर कोई सत्ता पाना चाहता है. ये पहली नजर में घरेलू लड़ाई-झगड़े की तरह लगता है लेकिन ये वॉर ट्रैप है, यानी एक युद्ध से निकले लोग, फिर लगातार खुद ही युद्ध में उलझते चले जाते हैं.
अब बात करते हैं सूडान की, जो राजनैतिक उठापटक का क्लासिक उदाहरण है. यहां साल 2019 में तीस सालों से ज्यादा राज कर चुके राष्ट्रपति उमर अल-बशीर की सरकार गिराई गई. लेकिन इसके बाद देश स्थिर नहीं, बल्कि बदहाल ही हुआ. पिछले साल अप्रैल में ये तस्वीर ज्यादा डरावनी हो गई, जब दो सैन्य गुटों के जनरल ही आपस में भिड़ गए. सूडानी सेना और अर्धसैनिक बल के कमांडर जनरल के बीच शुरू जंग सत्ता को लेकर थी.
जैसा कि आमतौर पर होता है ये लड़ाई-भिड़ाई एक समय के बाद रुक जाती, जब दोनों के पास हथियार या बाकी रिसोर्सेज कम पड़ने लगते. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यहां-वहां के उकसावे पर लड़ाई पांच साल बाद भी जारी है.
वेनेजुएला में कई साल बीतने के बाद भी तानाशाही से लोकतंत्र की तरफ ट्रांजिशन हो ही रहा है. साल 2019 में यहां तत्कालीन लीडर निकोलस मादुरो की सरकार हटाने की असफल कोशिश हुई. मादुरो इसके बाद भी सत्ता में बने रहे. इसी जुलाई 2024 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में निकोलस मादुरो ने खुद को एक बार और चुनकर आया बता दिया, जबकि विपक्ष इसे सरासर गलत बता रहा है. यहां तक कि यूरोपियन यूनियन ने भी इसमें दखल देते हुए विपक्षी नेता को देश का लोकतांत्रिक रिप्रेजेंटेटिव बता दिया. कुल मिलाकर यहां स्थिति डांवाडोल ही है.
अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन द्वारा सत्ता से हटाए जाने के दो दशक बाद तालिबान ने साल 2021 में अफगानिस्तान पर दोबारा कंट्रोल कर लिया. इससे पहले वो नब्बे के दशक में भी अफगानिस्तान पर राज कर रहा था, जो अमेरिका के दखल के बाद खत्म हो सका. इसके बाद वहां सरकारें तो चल रही थीं, लेकिन केवल वही जो यूएस को सपोर्ट करती थीं.
जुलाई 2021 में सेना के हटते ही कुछ ही हफ्तों में तालिबान काबुल तक जा पहुंचा और सरकार गिर गई. इसके बाद से अफगानिस्तान पर इस चरमपंथी समूह का ही राज चला आ रहा है. कहना न होगा कि इन कुछ सालों में देश की स्थिति और खराब हुई, खासकर महिलाओं की. अब तक इसे इंटरनेशनल मंच पर भी राजनैतिक बॉडी की मान्यता नहीं मिल सकी.
अब देखते हैं सीरिया को. इस देश में आखिरी लोकतांत्रिक चुनाव साल 1954 में हुआ था, जिसमें कई पार्टियों ने हिस्सा लिया था. इसके बाद साठ के दशक में बाथ पार्टी के सत्ता में आने के बाद से देश में लोकतंत्र खत्म हो गया. उसपर केवल एक पार्टी राज करने लगी, और राजनैतिक विपक्ष पूरी तरह से खत्म हो गया. साल 1971 में हाफिज अल-असद सत्ता में आए, और उसके बाद से सीरिया पर असद परिवार का ही शासन चलता रहा. हाल में रिबेल समूहों के इसे गिराने के बाद से सरकार में कोई नहीं.
सत्ता एकदम से पलटने पर देश में जो खालीपन पैदा हो जाता है, उसे भरना किसी चरमपंथी गुट के बूते की बात नहीं, खासकर अगर उसके पास राजनैतिक तजुर्बा न हो. अगर कई समूहों ने मिलकर उठापटक की हो, तब तो मामला और टेढ़ा हो जाता है. वे सत्ता के लिए आपस में ही उलझने लगते हैं. सीरिया में यही स्थिति दिख रही है.
वहां तख्तापलट में कई संगठन शामिल थे. इसमें लीड गुट के नेता ने कहा है कि सारे लड़ाके अब सेना जॉइन करेंगे. हालांकि ऐसा शायद ही हो. कोई न कोई गुट सिर उठाएगा और एचटीएस को चुनौती देगा. कई बार ट्रांजिशन के दौरान होने वाले चुनावों में ही विद्रोह पैदा हो जाता है. जनता ने चाहे, जिसे वोट दिया हो, रिबेल गुट उसे सत्ता से हटाना चाहते हैं.