रूस और यूक्रेन के बीच जंग लगातार ज्यादा आक्रामक होती जा रही है. यहां तक कि मामला न्यूक्लियर युद्ध के करीब भी पहुंच सकता है. इस आशंका को बल इसलिए भी मिला क्योंकि हाल ही में रूसी न्यूक्लियर वेपन्स की पहली खेप बेलारूस भेज दी गई. बेलारूस इस जंग में रूस की खुली मदद कर रहा है. अब रूस ने अपने परमाणु हथियार इस देश में तैनात करते हुए एक तरह से एलान कर दिया कि वो हार नहीं मानेगा. हालात बिगड़ते गए तो परमाणु हमला भी हो सकता है.
क्या होगा अगर परमाणु युद्ध हुआ तो?
अगर न्यूक्लियर युद्ध हुआ तो छुटपुट नुकसान नहीं होगा, बल्कि शहर के शहर तबाह हो जाएंगे. इसे एक बार हिरोशिमा-नागासाकी हमले से समझते चलें. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के दो शहरों, हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए. पहला विस्फोट 6 अगस्त को हिरोशिमा में हुआ, जिससे तापमान 10 लाख सेंटीग्रेट तक चला गया. ज्वालामुखी से भी ज्यादा गर्मी में दो तिहाई शहर तुरंत खाक हो गया.
घातक विकिरणों से हुई मौत
9 अगस्त को नागासाकी पर बम गिराया गया. इसमें भी वही हाल हुआ. आग और बेतहाशा गर्मी से लोग पटापट मरने लगे. जो बाकी रहे, वे खतरनाक विकिरणों से मरे. बम के सेंटर से लेकर एक किलोमीटर से ज्यादा की जगह में जली हुई जमीन के अलावा कुछ बाकी नहीं था. कई लेखकों और पत्रकारों ने इस मंजर का अपनी किताबों में डरा देने वाला वर्णन किया है, हालांकि वे ये मानते हैं कि उनके लिखने में कुछ कमी रह गई. असल हाल इससे कहीं ज्यादा डरावना रहा.
न्यूक्लियर ब्लास्ट के कई चरण होते हैं
पहले चरण में मची तबाही डायरेक्ट होती है. इसके बाद रेडिएशन की बारी आती है. इसमें गामा किरणें निकलती हैं जो एक्सरे से कई गुना खतरनाक होती हैं. ये जिस भी हिस्से पर पड़ें, शरीर का वो हिस्सा बदल जाता है. डीएनए तक चेंज हो जाता है. रेडिएशन लीक वाली जगहों पर रह चुके लोगों में कैंसर जैसी घातक बीमारी देखी जाती रही.
इमारतों और इंफ्रास्ट्रक्चर की तबाही तो रोकी नहीं जा सकती, लेकिन लोगों की जिंदगियां काफी हद तक बचाई जा सकें, इसके लिए कोशिश शुरू हो चुकी है. यूक्रेन अपने यहां न्यूक्लियर शेल्टर बनवा रहा है ताकि खतरे में शरण ली जा सके. इसके अलावा देश एंटी-रेडिएशन पिल्स जमा कर रहे हैं. यहां तक कि बीते साल के आखिर में फिनलैंड ने अपने यहां इसका स्टॉक घटने की शिकायत भी की थी.
क्या हैं एंटी-रेडिएशन पिल्स?
ये पोटेशियम आयोडाइड (KI) टेबलेट हैं, जो रेडिएशन के संपर्क में आने पर कुछ हद तक सुरक्षा देते हैं. असल में इस दवा में नॉन-रेडियोएक्टिव आयोडीन होती है, जो शरीर में रेडियोएक्टिव आयोडीन के अवशोषण को रोकने का काम करती है.
क्या होता है रेडिएशन से?
जैसे ही परमाणु विस्फोट होता है, या फिर प्लांट से रेडियोएक्टिव लीक जैसा कोई हादसा होता है, तुरंत ही आसपास की हवा में रेडियोएक्टिव आयोडीन फैल जाती है. हवा से होते हुए पानी, जमीन और खाद्य उत्पाद भी जहरीले होते चले जाते हैं. इनका शरीर में जाना बहुत ज्यादा घातक होता है. इस इंटरनल एक्सपोजर को इररेडिएशन कहते हैं, जब आयोडीन शरीर में घुसकर थायरॉइड ग्लैंड पर कब्जा जमा लेती है. इससे थायरॉइड कोशिकाएं मरने लगती हैं और थायरॉइड कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
कैसे काम करती है दवा?
न्यूक्लियर अटैक के तुरंत बाद पोटेशियम आयोडाइड की गोली लेने पर थायरॉइड ग्लैंड में भरपूर आयोडीन हो जाती है. इसके बाद रेडियोएक्टिव आयोडीन शरीर के भीतर पहुंचना भी चाहे तो ग्लैंड उसका अवशोषण नहीं कर पाती और खतरा टल जाता है. अगर सही समय पर ली जाए, तो पोटेशियम आयोडाइड की गोली हवा, जमीन, पानी और खाने में घुले रेडिएशन को शरीर के भीतर पहुंचने ही नहीं देती.
दवा के पक्ष में कभी कोई प्रमाण मिला!
अस्सी के दशक में सोवियत संघ (अब रूस) में चेर्नोबिल परमाणु हादसा हुआ, जिसकी चपेट में रूस, यूक्रेन और बेलारूस के हजारों लोग आए. लगभग 3 हजार ऐसे लोग थायरॉइड कैंसर का शिकार हो गए. ये वे लोग थे, जिन्होंने एंटी-रेडिएशन पिल्स नहीं ली थीं. वहीं जिन लोगों को समय रहते ये दवा मिल सकी, वे थायरॉइड कैंसर से बचे रहे.
FDA ने भी दिया अप्रूवल
अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने किसी भी परमाणु हादसे या हमले की स्थिति में बच्चों से लेकर एडल्ट्स के लिए एंटी-रेडिएशन पिल्स की खुराक तय कर रखी है. केवल आयोडीन से एलर्जिक लोग और 40 पार के लोग ये पिल्स नहीं ले सकते, जब तक कि वे रेडियोएक्टिव आयोडीन के हाई लेवल पर एक्सपोज न हुए हों.
EU ने डोनेट की दवा
यूक्रेन की मीडिया ने बीते साल के सितंबर-अक्टूबर में दावा किया कि यूरोपियन यूनियन (EU) ने उसे 55 लाख के करीब पोटेशियम आयोडाइड टेबलेट दी हैं. लगभग 5 लाख डॉलर कीमत की ये दवा एहतियातन दी गई ताकि परमाणु हादसे या हमले की स्थिति में बचाव हो सके. ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और अमेरिका से भी इस तरह की रिपोर्ट्स आईं कि वहां लोग ये दवा खरीद रहे हैं.
ऑनलाइन दवाएं बेचने वाले कई सप्लायर्स बीच-बीच में इस टेबलेट के स्टॉक में न होने का मैसेज लगाते रहे. हालांकि किसी भी देश ने खुलकर इस बारे में बात नहीं की कि उसने कितनी दवाओं की खरीदी कर रखी है.