बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी रामसेतु को नेशनल हेरिटेज बनाने की मांग काफी समय से कर रहे हैं. उन्होंने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर रखी है. उनका कहना है कि ये सेतु हिंदू धर्म के लिए बेहद महत्व का है और उसे बचाए रखना तभी संभव है, जब उसे राष्ट्रीय स्मारक मान लिया जाए. यहां बता दें कि जब भी कोई जगह नेशनल हैरिटज की श्रणी में आ जाती है, तो उसकी देखरेख की जिम्मेदारी सेंटर की होती है. संरक्षण के लिए वो कई प्रतिबंध भी लगा सकता है.
क्या है रामसेतु?
ये तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट से पंबन द्वीप और श्रीलंका के उत्तरी तट पर मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थरों की एक कड़ी है. रामायण महाकाव्य के अनुसार श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई के लिए समुद्र पर इस पुल का निर्माण करवाया था. अलग-अलग ग्रंथों में इसका जिक्र है. वाल्मिकी रामायण के मुताबिक खुद प्रभु राम ने कई दिनों की पड़ताल के बाद रामेश्वरम के आगे समुद्र में वो जगह खोजी, जहां से श्रीलंका पहुंचने में आसानी हो सके.
अलग-अलग नाम लिया जाता रहा
अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहते हैं तो मुस्लिम मान्यता के अनुसार इसे आदम ने बनवाया था. हालांकि साइंस को इसपर यकीन काफी बाद में आया, जब साल 1993 में नासा ने कुछ तस्वीरें जारी कीं. इन सैटेलाइट तस्वीरों में ठीक उसी जगह पर चौड़ी पट्टी की तरह चीज दिख रही थी, जो शायद पुल हो सकती थी. इसके बाद रामसेतु पर जमकर बात होने लगी.
पुरातत्व के आधार पर भी दावा
नासा के पहले से भी अमेरिकी पुरातत्वविद अलग-अलग आधार पर दावा करते रहे कि भारत और श्रीलंका के बीच सेतु बनाने की बात सच है. साइंस चैनल पर साल 2017 में एंशिएंट लैंड ब्रिज नाम से शो में पुरातत्व के आधार पर कहा गया कि श्रीराम की सेना के भारत से लंका तक सेतु बनाने की बात पौणारिक कथा नहीं, सच्चाई है.
कौन सी तकनीक इस्तेमाल हुई होगी?
करीब 50 किलोमीटर लंबे इस पुल के साथ लगातार जिक्र हुआ कि इसके पत्थर तैरने वाले थे. पानी में तैरने वाले ये पत्थर चूना पत्थर की श्रेणी के हैं. ज्वालामुखी के लावा से बने ये स्टोन अंदर से खोखले होते हैं. इनमें बारीक-बारीक छेद भी होते हैं. वजन कम होने और हवा भरी होने की वजह ये पानी में तैरते रहते हैं. थोड़ा सा साइंस की भाषा में समझें तो बॉयेंसी फोर्स यानी उत्प्लावक बल इन्हें डूबने से रोके रखता है. ये वो फोर्स है, जो किसी तरल में आंशिक या पूरी तरह से डूबी किसी चीज पर लगता और उसे ऊपर उठाए रखता है. इस तरह के स्टोन भारत के अलावा, फिजी, न्यूजीलैंड और न्यू कैलेडोनिया में पाए जाते हैं.
फिर ये सेतु टूटा और डूबा कैसे?
साल 1480 से पहले तक ये हिस्सा समुद्र से ऊपर ही रहा होगा. बाद में आए चक्रवाती तूफानों ने इसे तोड़ दिया, जिसके बाद सेतु पानी में कुछ फीट तक डूब गया. इसमें काफी योगदान ग्लोबल वार्मिंग का भी है, जिसकी वजह से समुद्र का स्तर लगातार बढ़ता गया और कई चीजें डूबती गईं.
क्या है इसका सेतुसमुद्रम से कनेक्शन?
2005 में यूपीए सरकार के कार्यकाल में एक प्रोजेक्ट की बात हुई. इसके तहत भारत और श्रीलंका के बीच दो चैनल बनाए जाने थे. इनमें से एक चैनल रामसेतु के रास्ते पर बनना था. ये चैनल मन्नार की खाड़ी (भारत) और पाक बे (श्रीलंका) को आपस में जोड़ता. ये चैनल 12 मीटर गहरा और 300 मीटर चौड़ा बनना था. लेकिन इसके लिए रामसेतु की चट्टानों को तोड़ा जाना था.
क्यों पड़ी प्रोजेक्ट की जरूरत?
परियोजना का सपोर्ट करने वाले तर्क देते हैं कि रामसेतु की वजह से जहाजों को श्रीलंका के पीछे से होकर आना पड़ता है. इस वजह से उन्हें लगभग 780 किलोमीटर की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है. इसमें समय और पैसे दोनों खर्च होते हैं. साथ ही समुद्री सफर के खतरे अलग होते हैं. रामसेतु के पास समुद्र की गहराई 10 मीटर से भी कम है. ऐसे में जहाज उससे होते हुए नहीं गुजर सकते.
अगर सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा हो जाता तो जहाज आ-जा सकते थे, लेकिन इसके लिए रामसेतु को पूरी तरह से तोड़ा जाना था. इसका विरोध होने लगा. आखिरकार 2007 में कोर्ट को इस प्रोजेक्ट पर रोक लगानी पड़ी. वैसे बीते तीन सालों से एक बार फिर इसपर शोध शुरू हो चुका है. अलग-अलग शोधकर्ता ये जांचना चाहते हैं कि रामसेतु क्या वाकई में वही है, जो कथाओं में बताया जाता है, या ये कोई कुदरती पुल है.