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भारत के अलावा और कहां के युवक धोखे से बनाए गए रूसी सेना का हिस्सा? पहले भी लग चुका बाहरी सैनिक लाने का आरोप

मॉस्को उन सभी भारतीय युवकों को वापस भेजेगा, जो धोखे से रूसी सेना का हिस्सा बना दिए गए. साथ ही मारे गए सैनिकों के परिवार को मुआवजा और रूसी नागरिकता भी देगा. ये फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया रूस यात्रा के बाद लिया गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस पहुंचते ही पासपोर्ट छीन युवकों को लड़ाई पर भेज दिया गया था.

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रूस अपने यहां जंग लड़ रहे भारतीयों को वापस भेजेगा. (Photo- Unsplash)
रूस अपने यहां जंग लड़ रहे भारतीयों को वापस भेजेगा. (Photo- Unsplash)

पीएम मोदी हाल में दो दिनों के दौरे पर रूस गए. इस दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में कई फैसले लिए गए. इसी में अहम फैसला था, यूक्रेन से युद्ध में फंस गए भारतीयों की सुरक्षित वापसी और मारे गए सैनिकों के परिवारों को मुआवजा देना. बीते दो सालों से ज्यादा समय से चली आ रही जंग में भारतीय युवक धोखे से चले गए थे. ऐसे कई लोग अब भी वहां हैं. 

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रूस को क्यों पड़ी विदेशी सैनिकों की जरूरत 
पिछले साल वेस्टर्न मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट में तैनात एक मिलिट्री ऑफिसर का ईमेल अकाउंट हैक हो गया. इसमें विदेशी युवकों की रूसी सेना में भर्ती और छोटी-सी ट्रेनिंग के साथ उन्हें यूक्रेन से लड़ने भेजने का जिक्र था. कई और देश जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके, और यूक्रेन की बजाए खुद को रूस के ज्यादा करीब मानते हैं, वे भी लड़ाई में शामिल होने आने लगे.

इनमें आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और लातीविया शामिल हैं. लेकिन ये सभी जानकर लड़ने आए थे, वहीं भारतीय युवकों की बात अलग थी. उन्हें युद्ध में लड़ने नहीं, बल्कि छोटे-मोटे कामों में सेना की मदद के लिए बुलाया गया था. 

इसलिए रिक्रूट करता रहा फॉरेन फाइटर्स को

रूस पर पहले भी आरोप लग चुका कि वे जंग के दौरान भाड़े पर लड़ाके बुलवाया रहा. इसके अपने फायदे हैं. जैसे इसमें होस्ट कंट्री के अपने लोग सुरक्षित रहते हैं. खतरनाक हालातों में फॉरेन फाइटर्स को भेजकर अपनों को सेफ रख लिया जाता है. फॉरेन फाइटर्स चूंकि सीधे सेना से नहीं होते इसलिए देश उनकी जिम्मेदारी से जब चाहे पल्ला झाड़ सकते हैं. इसके अलावा, बाहर के सैनिकों के पास खुफिया जानकारी होने का खतरा कम से कम रहता है. यही वजह है कि रूस लगातार फॉरेन फाइटर्स को लेता रहा. उसके पास प्राइवेट आर्मी वैगनर ग्रुप भी है, जिसकी आक्रामकता हमेशा सवालों में रही. 

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russia ukraine war how indian youth deployed in war photo Reuters

पोलिश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स ने साल 2014 में हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान एक स्टडी छापी थी, जिसमें दावा था कि रूस मोटी रकम देकर दूसरे देशों के ऐसे नागरिकों को भी बुलाता है, जिनका आर्थिक स्तर कमजोर हो. इसमें बोस्नियन और सर्बियन युवा भी थे, और सीरिया-लीबिया जैसे युद्ध-प्रभावित देशों के लड़ाके भी शामिल थे. 

भारतीय कैसे फंसे रूसी सेना में काम के लिए

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में सीबीआई के हवाले से कहा गया कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क नई दिल्ली से तमिलनाडु तक फैला हुआ है. ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और लोकल एजेंटों के जरिए कमजोर आर्थिक हालात वाले युवकों से संपर्क करते और उन्हें रूस में शानदार नौकरी का लालच देते. ये युवक जैसे ही रूस पहुंचते, उनका पासपोर्ट छीन लिया जाता और हल्की-फुल्की ट्रेनिंग देकर सीधे युद्ध के लिए भेज दिया जाता. पुलिस ने रैकेट के कई लोगों को हिरासत में भी लिया. 

कितनों को मिला धोखा

सरकारी डेटा कहता है कि 30 से 40 भारतीय नागरिक फिलहाल रूसी सेना में हैं. इनमें से लगभग 4 लोग मारे जा चुके. हालांकि ये नंबर ज्यादा हो सकता है. चूंकि युवक खुफिया तौर पर सेना में गए इसलिए पक्के आंकड़े देना मुश्किल है. 

russia ukraine war how indian youth deployed in war photo AP

भारत ने कैसे सुलझाई समस्या

विदेश मंत्रालय पहले भी ये मुद्दा उठा चुका था. लेकिन अब पीएम मोदी ने रूस दौरे के दौरान इसपर बात की. रूस अब इसपर सीधा एक्शन लेते दिख रहा है. वो सपोर्ट स्टाफ के तौर पर जुड़े भारतीयों की जल्द से जल्द वापसी का वादा कर रहा है. साथ ही युद्ध में मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवजा और रूसी नागरिकता (अगर चाहें तो) भी देगा. 

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क्या भारत के अलावा किसी और देश के युवक भी पहुंचे

नेपाल पहले ही कह चुका कि उसके बहुत से युवा अवैध रूप से सेना में शामिल हुए हैं. ये संख्या 2 सौ से भी ज्यादा हो सकती है. इसी साल जनवरी में नेपाल सरकार ने अपने लोगों को रूस और यूक्रेन का परमिट देना बंद कर दिया. 

श्रीलंका ने भी ऐसा ही आरोप लगाया था. उसका कहना था कि रूस ही नहीं, यूक्रेन ने भी उसके लोगों से झूठे वादे किए और धोखे से युद्ध में झोंक दिया. कथित तौर पर ऐसे 37 श्रीलंकन युवा बुरी तरह से जख्मी हुए, जबकि कईयों की मौत हो चुकी. मौत के आंकड़े यहां साफ नहीं हैं. यहां बता दें कि नेपाल का एग्रीमेंट है कि उसके लड़ाके भारत और ब्रिटेन की सेना में शामिल हो सकते हैं. वहीं श्रीलंका में इसकी इजाजत नहीं कि वहां के लोग फॉरेन आर्मी को सेवा दें.

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