अक्सर तलाक के बीच पैसों के लेनदेन के अलावा जो सबसे बड़ा मुद्दा होता है, वो है बच्चे की कस्टडी का. भारत की अदालतों में ऐसे लाखों मामले लगातार चलते रहते हैं. माता-पिता दोनों ही जोर लगाते हैं कि संतान की देखरेख का जिम्मा उन्हें मिल जाए, लेकिन अदालत इसके लिए काफी सारे पहलू देखती है. साथ ही अगर मामला क्रॉस-बॉर्डर रिश्ते का हो तो पेचीदगी और बढ़ जाती है.
कौन सा कानून लागू होता है?
कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली के सीनियर एडवोकेट मनीष भदौरिया कहते हैं कि बच्चे की कस्टडी पेरेंट्स की इच्छा पर नहीं मिलती, बल्कि कोर्ट ये देखती है कि वो किसके साथ सुरक्षित और खुश रहेगा. इसके लिए भारतीय कानून में गार्जियनशिप एंड वार्ड एक्ट 1980 का सेक्शन 7 लागू होता है. अक्सर कस्टडी के केस भी काफी लंबे खिंचते हैं. ऐसी स्थिति को देखते हुए अदालत बच्चे को उसी के पास रहने देती है, जिसके पास वो पहले से है, बशर्ते उसके पास परवरिश के लिए सारी सुविधाएं हों.
किस आधार पर होता है फैसला?
बेटा अगर 5 साल और बेटी की उम्र 7 साल तक हो, तो आमतौर पर कस्टडी मां के हक में जाती है. लेकिन कुछ मामलों में फैसला इससे अलग भी हो सकता है.
ये तब होता है, जब पेरेंट्स में से कोई एक साबित कर दे कि कस्टडी की मांग कर रहा अभिभावक बच्चे की परवरिश ठीक से नहीं कर सकेगा. अगर अभिभावक ऐसी नौकरी में है, जहां वो लगातार घूमता रहता हो और बच्चे के लिए उसके पास बिल्कुल भी समय न हो, या फिर वो बच्चे के साथ पहले क्रूरता कर चुका हो तो अदालत फैसला उसी के मुताबिक लेगी.
बच्चे से भी होती है बातचीत
अक्सर टीवी या फिल्मों में दिखाया जाता है कि कोर्ट बच्चे से भी कस्टडी को लेकर पूछताछ करती है. ये सही है. लेकिन जज सबके सामने बच्चे से बात नहीं करते, बल्कि उसे चैंबर में ले जाकर बात की जाती है. ये सामान्य बात होती है ताकि बच्चा डरे नहीं और खुलकर सब बोल सके. अगर बच्चा मां या पिता में से किसी एक के साथ रहने की बात करता है तो भी ये नहीं होता कि कोर्ट उसकी बात मानेगी, बल्कि वो सारे ग्राउंड्स देखकर ही कुछ तय करती है.
बच्चे की परवरिश पर दावे के लिए ये बातें जरूरी
पेरेंट्स को बताना होता है कि उनके पास बच्चे के लिए पैसे हैं, समय है और उसे नैतिक तौर पर मजबूत बनाने की भी इच्छा है. अगर अभिभावकों में से कोई क्रिमिनल बैकग्राउंड का हो, या फिर उसकी दिमागी हालत ठीक न हो, तब कोर्ट दूसरे के पक्ष में फैसला देती है. कई बार दादा-दादी या नाना-नानी भी कस्टडी के लिए मुकदमा दायर करते हैं. उन्हें मिलने-जुलने की इजाजत दी जाती है.
भारत में चाइल्ड कस्टडी के मुख्य तौर पर 3 तरीके हैं
- फिजिकल कस्टडी के तहत किसी एक अभिभावक को बच्चे को घर और सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिलती है, जबकि दूसरा उससे तय समय के बाद मिल सकता है.
- जॉइंट कस्टडी में दोनों पेरेंट्स के पास बच्चा थोड़े-थोड़े समय के लिए रहता है.
- लीगल कस्टडी एक तरह का स्पेशल गार्जियनशिप होती है, जिसमें जैविक माता-पिता के अलावा किसी को बच्चे की देखरेख की जिम्मेदारी मिलती है.
क्या होता है अगर बच्चा विदेश में जन्मा हो?
अगर पेरेंट्स भारतीय हों और दोनों में से किसी एक ने भारत की अदालत में पिटीशन लगा दिया तो कानून यहीं का लागू होता है. ऐसी स्थिति में कोर्ट नोटिस भेजता है और अगली पार्टी को भारत आकर अदालत में अपनी मौजूदगी दिखानी होती है. इसके बाद बाकी की प्रोसेस कस्टडी के सामान्य मामले की तरह होती है.
हेग कन्वेंशन भी इस बारे में बात करता है
वैसे ऐसे मामले कई बार काफी पेचीदा भी हो सकते हैं. जैसे हर देश में चाइल्ड कस्टडी के अपने नियम होते हैं. ऐसे में बच्चे के पास अगर विदेशी नागरिकता हो तो वो देश कुछ बातों पर अड़ भी सकता है. इन्हीं अड़चनों को देखते हुए हेग कन्वेंशन 1980 बना था. इसके तहत कुछ कॉमन लॉ होते हैं, जो मामले को आसान बना देते हैं.
जहां तक शिखर धवन का मामला है, ये साफ नहीं है कि उन्होंने कोर्ट में अपने बेटे की कस्टडी के लिए आवेदन भी किया है, या नहीं. फिलहाल अदालत ने उन्हें ऑस्ट्रेलिया या भारत में अपने बच्चे से मिलने और वीडियो कॉल पर बात करने की इजाजत दी है.