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तुनिशा...श्रद्धा वॉल्कर जैसी टॉक्सिक रिलेशनशिप से कैसे निकलें बाहर?

श्रद्धा वॉल्कर की हत्या और तुनिशा शर्मा के सुसाइड केस ने टॉक्सिक रिलेशनशिप को लेकर चर्चा तेज कर दी है. सवाल उठने लगे हैं कि संबध इतने खराब हो गए थे तो साथ रहने या साथ जुड़ने की जरूरत क्या थी. आखिर क्या होती है टॉक्सिक रिलेशनशिप? कैसे पहचानें कि कोई टॉक्सिक रिलेशनशिप में है? कैसे इससे बाहर निकला जाता है.

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तुनिशा शर्मा और श्रद्धा वॉल्कर
तुनिशा शर्मा और श्रद्धा वॉल्कर

श्रद्धा वॉल्कर...एक महत्वाकांक्षी लड़की जो अपने बड़े सपने पूरे करने के लिए मुंबई आई थी. डेटिंग ऐप के जरिए आफताब से मिली, फिर प्यार हुआ, रिश्ता आगे बढ़ा और दोनों लिव इन में रहने लगे. श्रद्धा की उम्मीदें परवान चढ़ीं, शादी के लिए दबाव बनाया गया और गुस्से में आकर आफताब ने उसकी हत्या कर दी. तुनिशा शर्मा, टीवी की उभरती सितारा, सीरियलों में बेहतरीन काम किया, शीजान को दिल दे बैठी, शादी का सपना संजोया, धोखा मिला, ब्रेक अप हुआ और उसने आत्महत्या कर ली. अगर श्रद्धा मामले में उम्मीदें टूटीं थीं तो तुनिशा केस में धोखा मिला था, एक में लड़के ने एक्स्ट्रीम कदम उठाया तो दूसरे में पीड़ित लड़की ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली. लेकिन दोनों मामलों में एक ट्रेंड कॉमन रहा- टॉक्सिक रिलेशनशिप. क्या होती है ये टॉक्सिक रिलेशनशिप? कैसे पहचान करें कि कोई टॉक्सिक रिलेशनशिप में है? टॉक्सिक रिलेशनशिप से बाहर कैसे निकला जाता है? इस पर हमने कई एक्सपर्ट से बात की...

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क्या होती है टॉक्सिक रिलेशनशिप? 

साल 1995 में बॉडी लैंग्वेज एक्सपर्ट लिलियन ग्लास ने सबसे पहले अपनी किताब 'Toxic People' में टॉक्सिक रिलेशनशिप का जिक्र किया था. वे कोई मनोवैज्ञानिक या डॉक्टर नहीं थीं, लेकिन एक कम्युनिकेशन कंसल्टेंट थीं जिन्होंने इस मुद्दे पर गहन चर्चा  की थी. उन्होंने अपनी किताब में बताया था अगर कोई अपने पार्टनर के प्रति सपोर्टिव नहीं है, अगर वो उसकी सफलता से जलता है, आपके सुखी जीवन में हर बार बाधा बनने का काम करता है, ये सब टॉक्सिक रिलेशनशिप माना जाता है. किसी भी रिश्ते में कहासुनी, नाराजगी, उम्मीदें टूटना आम बात है. विचारों में मतभेद होना भी इंसानी फितरत है. लेकिन जब यही कहासुनी, यही नाराजगी, यही विचारों का मतभेद हर बार हर समय होने लगे, तब ये माना जाता है कि आप टॉक्सिक रिलेशनशिप में चल रहे हैं या फिर आपका रिश्ता टॉक्सिक हो गया है.

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अब जितनी सरल टॉक्सिक रिलेशनशिप की परिभाषा है, उसे असल में समझना उतना ही कठिन है. सबसे बड़ी चुनौती ही ये होती है कि कैसे पहचान की जाए कि आप टॉक्सिक रिलेशनशिप के शिकार हैं. भारत जैसे देश में तो समझौते के नाम पर लोग रिश्तों को कई सालों तक खींचते चले जाते हैं. ऐसे में वे सहन करते हैं, पीड़ित होते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का अहसास नहीं होता और वे इसे ही अपनी जिंदगी मान बैठते हैं. अब इसी ट्रेंड को समझने के लिए हमने एक नहीं कई मनोवैज्ञानिकों से, कपल थेरेपिस्ट से बात की है. उन नौजावनों के विचार भी समझे हैं जो इस समय रिलेशनशिप में हैं, जिन्होंने उतार-चढ़ाव देखे हैं. 

टॉक्सिक रिलेशन के लक्षण क्या होते हैं?

पिछले 15 सालों से साइकेट्री फील्ड से जुड़े हुए डॉक्टर नंद किशोर बताते हैं कि जब भी किसी रिश्ते में एक पार्टनर की दूसरे पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बढ़ जाती है, या फिर जब एक पार्टनर दूसरे पर हमेशा हावी होने की कोशिश करता है, जब छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगते हैं, ट्रस्ट इशू खड़े हो जाते हैं, ये सब टॉक्सिक रिलेशनशिप के संकेत हैं. इसी कड़ी में फोर्टिस अस्पताल के साथ जुड़ीं मनोचिकित्सक डॉक्टर हेमिका अग्रवाल बताती हैं कि अगर आप किसी रिलेशनशिप को जबरदस्ती लंबे समय तक ड्रैग कर रहे हैं, खुशी नहीं मिल रही है, सिर्फ साथ रहने के लिए रिश्ते में हैं, ये भी टॉक्सिक रिलेशनशिप माना जाता है. उनके मुताबिक कई मौकों पर ऐसा भी देखा गया है कि रिश्तों में एक पार्टनर बहुत Self-Centered हो जाता है यानी कि उसे सिर्फ अपनी खुशी, अपने सपनों, अपनी इच्छाओं से मतलब होता है. वो आपकी सफलता से भी जलने लगता है. ये भी हेल्दी रिलेशनशिप में ठीक नहीं है.

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क्या टॉक्सिक रिलेशन को टूटने से बचाया जा सकता है?

टॉक्सिक रिलेशनशिप को फिक्स करने के अलग-अलग तरीके होते हैं. असल में अगर एक रिश्ते में दोनों ही पार्टनर समय-समय पर एक दूसरे के प्रति टॉक्सिक व्यवहार रखते हैं, उस स्थिति में कुछ आदतों में बदलाव कर उस रिश्ते को बचाया जा सकता है. हर बार छोड़ना ही समाधान नहीं होता है. इस बारे में जब हमने मैक्स स्पेशलिटी सेंटर में कार्यरत रिलेशनशिप एक्सपर्ट और मनोवैज्ञानिक डॉक्टर निशा खन्ना से बात की तो उन्होंने कहा कि हम किसी दूसरे को ठीक नहीं कर सकते हैं, अपने आप को ठीक कर सकते हैं. वे कहती हैं कि मैं अपने तरीके से अपने हिस्से को सही करूंगा या करूंगी, खुद को खुश रखने की जिम्मेदारी हमे खुद लेनी होगी. मैं दूसरे के लिए गलत शब्दों का प्रयोग नहीं करूंगा या करूंगी, इस तरह से वो गेम वन साइडेड हो जाएगा. अगर आपको पता है कि इस समय आपके रिश्ते में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है, तो उतना ही इनवेस्ट करें जितना दूसरी तरफ से मिल रहा है. ये सभी को याद रखना चाहिए कि रिलेशनशिप भी गिव एंड टेक से चलती है. अगर इस अप्रोच पर चला जाएगा तो दोनों तरफ से उम्मीदें कम होंगी और किसी को दुख भी नहीं होगा.

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डॉक्टर निशा ये भी मानती हैं कि कई रिश्ते इसलिए बिगड़ जाते हैं क्योंकि दोनों ही पार्टनर्स में एक दूसरे को ब्लेम करने की आदत होती है. कुछ भी गलत हो जाए, या लाइफ में कुछ भी ठीक नहीं होता तो सीधे-सीधे दूसरे साथी को दोषी बता दिया जाता है. उनकी मानें तो सिर्फ कुछ शब्दों के बदल जाने से आपके कहने का तरीका भी ठीक हो सकता है और सामने वाले को बुरा भी फील नहीं होता. इस बारे में वे कहती हैं कि जब भी आप किसी टॉपिक पर अपने विचार रखते हैं तो हमेशा ऐसे बोलना चाहिए कि 'मुझे ऐसा लग रहा है', ना कि ऐसे कि 'तुम ऐसी हो या ऐसे हो'. आपका हर स्टेटमेंट 'I' से शुरू होना चाहिए. I think so, I believe so. किसी को अगर कुछ समझाना भी चाहते हैं तो उसे Suggestive फॉर्म में रखें.

टॉक्सिक रिलेशन से बाहर निकलना चुनौती क्यों?

अब ये सुझाव तब तक प्रभावी रहते हैं, जब तक आपके रिश्ते में सुधार की एक उम्मीद होती है. जब आपको पता होता है कि कुछ अपने में बदलाव कर भी स्थिति को काबू में किया जा सकता है. लेकिन अगर हालात हाथ से निकल रहे हैं, रिश्ता उस पड़ाव पर पहुंच रहा है जहां पर बातचीत भी संभव नहीं है, या अगर कोई एक पार्टनर हिंसक हो रहा है, उस स्थिति में रिश्ते से सही समय पर बाहर निकलना जरूरी है. आपके मन में कई तरह के सवाल जरूर आ सकते हैं, डर भी हो सकते हैं, लेकिन वो एक फैसला आपकी आने वाली लाइफ को बचा सकता है. इस बात को डॉक्टर नंद किशोर ने काफी विस्तार से समझाया है. वे कहते हैं कि कई बार लोग टॉक्सिक रिलेशनशिप से बाहर निकलना तो चाहते हैं, लेकिन ऐसा कर नहीं पाते हैं. एक उन्हें अपने साथी को छोड़ने का डर मन में काफी सताने लगता है और दूसरा ये होता है कि उन्हें अकेले होने का भी डर होता है. अगर अकेले हो गए, कोई और नहीं मिला, उस स्थिति में क्या करेंगे. ये सोच ही कई बार उन्हें और सहने पर मजबूर कर देती है. कुछ गंभीर मामलों में अगर कोई एक पार्टनर किसी तरह से दूसरे को ब्लैकमेल कर रहा हो, तब भी उस रिश्ते से बाहर निकलना चुनौती बन जाता है.

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सोशल सर्कल की मदद और आपके अपने 'Instinct'

डॉक्टर नंद किशोर मानते हैं कि अगर आपकी सेहत पर रिश्ते का असर पड़ना शुरू हो चुका है. आप लगातार डिप्रेशन में जा रहे हैं, आपको सोने में दिक्कत हो रही है, पूरे समय स्ट्रेस ले रहे हैं, उस स्थिति में उस रिश्ते से बाहर आना जरूरी है. वे कहते हैं कि अगर कोई टॉक्सिक रिलेशनशिप से बाहर निकल रहा है या फिर अभी अभी निकला है, उसे सबसे पहले अपने Social Circle से मदद मांगनी चाहिए. इस सोशल सर्कल में आपके दोस्त हो सकते हैं, आपके माता-पिता शामिल हो सकते हैं. मन में जो भी कुछ चल रहा हो, सबकुछ उनके सामने शेयर करना चाहिए. जितना शेयर करेंगे उतना हल्का महसूस होगा. अब सोशल सर्कल तो आपकी मदद करता ही है, आप खुद भी अपनी काफी मदद कर सकते हैं. अगर आप अपने मन और शरीर के संकेतों को अच्छे तरीके से समझेंगे, हर फैसला सही भी होगा और आपको कम से कम तकलीफ झेलनी पड़ेगी.

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉक्टर हेमिका अग्रवाल ने एक जरूरी बात बताई है. वे कहती हैं कि असल में कई बार आपका Conscious mind तो कहता है कि एक रिश्ते में सब ठीक चल रहा है, या आप किसी तरह से एडजस्ट कर लेंगे. लेकिन जो आपका अवचेतन मन (Subconscious Mind) होता है, वो ऐसे 'Instinct' देता कि सबकुछ ठीक नहीं है. जानवरों और इंसानों में ये समान ताकत होती है कि वे उन संकेतों को समझ सकते हैं. जरूरी ये है कि उन्हें कभी भी नजरअंदाज ना करें. डॉक्टर हेमिका इस बात पर भी जोर देती हैं कि आज के समय में कई रिलेशनशिप Superficial हो गई हैं यानी कि ऐसे रिश्ते जो दिखाने के लिए ज्यादा होते हैं और दोनों तरफ से कमिटमेंट की कमी रहती है. वे कुछ हद तक इसके लिए डेटिंग एप्स को भी जिम्मेदार मानती हैं. उनका कहना है कि इस राइट और लेफ्ट स्वाइप करने वाली दुनिया में इंसान की सही पहचान या परख करना मुश्किल हो गया है. वे हर डेटिंग एप्स को गलत नहीं मानती, लेकिन लोगों के और ज्यादा जागरूक होने की अपील करती हैं.

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वैसे डेटिंग एप्स को लेकर डॉक्टर निशा खन्ना थोड़े अलग विचार रखती हैं. वे कहती हैं कि जिम्मेदार तो आप किसी भी चीज को ठहरा सकते हैं. आप इंटरनेट को जिम्मेदार बता दीजिए, बाद में किसी और टेक्नोलॉजी को जिम्मेदार बता देंगे. लेकिन असल बात ये है कि किसी को चुनने वाले तो आप खुद हैं. आप डेटिंग एप पर किसी की प्रोफाइल पढ़कर, उसकी ट्रेट समझकर उसे पसंद करते हैं. बाद में उस शख्स से बात भी तो आप खुद ही कर रहे हैं. इसलिए जिम्मेदारी आपको खुद लेनी चाहिए. इसका टॉक्सिक रिलेशनशिप से कनेक्शन नहीं है.

टॉक्सिक रिलेशन और सुसाइड का चलन

 कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इन रिलेशनशिप में रहने के बाद एक्सट्रीम कदम उठा लेते हैं, यानी कि सुसाइड जैसे तुनिशा शर्मा ने किया. आंकड़े भी बताते हैं कि कई नौजवान इन ब्रेक अप्स या कह लीजिए दिल टूटने की वजह से सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं. अब ऐसा क्यों होता है, इससे कैसे बचा जा सकता है, क्या लक्षण होते हैं, मां-बाप इसमें क्या रोल प्ले कर सकते हैं, ये सब समझना भी बहुत जरूरी है. डॉक्टर नंद किशोर बताते हैं कि सुसाइड जैसा कदम वहीं उठा सकता है जो इमोशनली ज्यादा स्टेबल नहीं है. ये कोई एक दिन का या कह लीजिए कुछ घंटो का फैसला नहीं होता है. कई दिनों तक मन में विचार आते हैं, दूसरों को भी पता चलेगा कि वो शख्स सुसाइड जैसा कदम उठा सकता है. वो अपने दोस्तों से बात बंद कर देगा, अचानक से ऑफिस या स्कूल में उसकी परफॉर्मेंस गिर जाएगी. ये भी हो सकता है कि वो कुछ ऐसे हथियार इकट्ठा करने लगे जिसके जरिए वो कोई सुसाइड जैसा कदम उठाए.

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किसी को सुसाइड करने से कैसे रोकें?

अब अगर किसी में भी ऐसे लक्षण दिखते हैं तो उन्हें अपने दोस्तों और माता-पिता से तो सबकुछ शेयर करना ही चाहिए, जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग या किसी साइकेट्रिस्ट को दिखाना जरूरी हो जाता है. दोनों डॉक्टर नंद किशोर और हेमिका मानती हैं कि लोगों को कभी भी डॉक्टरों की मदद लेने से हिचकना नहीं चाहिए. ये नहीं सोचना चाहिए कि दुनिया क्या सोचेगी, कोई आपके बारे में क्या धारणा बनाएगा. बड़ी बात ये है कि अगर समय रहते डॉक्टर की राय ली गई तो अर्ली सिम्टम्स को भी पकड़ा जा सकता है और ठीक इलाज भी संभव है. डॉक्टर हेमिका तो यहां तक कहती हैं कि आज के समय में गांव के लोग इन बातों को लेकर ज्यादा जागरूक हो चुके हैं. वे फिर भी खुलकर अपने विचार रखते हैं, अपनी समस्या बताते हैं, शहर के लोग ज्यादा हिचकते हैं. हेमिका इस बात पर भी जोर देती हैं कि एक टॉक्सिल रिलेशन नशे की तरह होता है. जब आप इससे बाहर भी निकलते हैं, विड्रॉल सिम्टम्स नजर आते हैं. बार-बार वापस उस शख्स के पास जाने का मन करता है. तब भी मेडिकल हेल्प ही ज्यादा कारगर साबित होती है.

काउंसलर और मनोचिक्तसक के अलावा ऐसी स्थिति में माता-पिता भी अहम रोल निभा सकते हैं. मुश्किल समय में अगर मां-बाप बच्चों को संभालने में कामयाब हो जाएं तो किसी भी एक्सट्रीम कदम से बचा जा सकता है. इस बारे में डॉक्टर निशा खन्ना कहती हैं कि ऐसी स्थिति में माता-पिता को संवेदनशील होने की जरूरत है. उन्हें खुलकर बात करनी चाहिए, जरूरत पड़ने पर वे खुद उनके दोस्तों से बात करें, उन्हें घर बुलाएं, बचपन के पुराने किस्सों को शेयर करें, बच्चे का मन बहलाने का प्रयास करें. अब ये सारे वो प्वाइंट हैं जो तब फॉलो होने हैं जब किसी में भी सुसाइडल टेंडेंसी दिखें. लेकिन सवाल ये है कि क्या टॉक्सिक रिलेशन से बचा जा सकता है. या अगर कोई ऐसे रिलेशन का शिकार होता है, वो इससे मजबूती से बाहर निकल सकता है? डॉक्टर हेमिका अग्रवाल के पास इसका एक जवाब है. वे कहती हैं कि चाहे लड़का हो या लड़की, उन्हें रिलेशनशिप की पूरी नॉलेज होनी चाहिए. अगर तीन साल की उम्र से ही बच्चों को स्कूल में सेक्स एजुकेशन दी जाए, तो उन्हें काफी कुछ क्लियर रहता है. बड़े होकर वे मुश्किल स्थिति में ज्यादा सही फैसले लेने में सक्षम होते हैं.

लोगों की जुबानी हेल्दी रिलेशन की निशानी

अब डॉक्टरों की एक्सपर्ट राय पता चल गई, टॉक्सिक रिलेशन के हर पहलू पर भी बात हो गई. लेकिन उन लोगों के एक्सपीरियंस बहुत मायने रखते हैं जो वर्तमान में भी रिलेशनशिप में हैं, या कहना चाहिए जो लंबे समय से सफल रिलेशनशिप में हैं, जिन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन फिर भी साथ में हैं. ऐसे कुछ लोगों से बात की गई तो वो संदेश मिले हैं जो आज की पीढ़ी की काफी मदद कर सकते हैं. आस्था पिछले आठ साल साल से रिलेशन में हैं. बड़ी बात ये है कि उनका रिश्ता लॉन्ग डिस्टेंस वाला रहा है. कई महीनों तक एक दूसरे से मुलाकात नहीं होती है, लेकिन फिर भी दोनों साथ हैं और काफी खुश हैं. अपने एक्सपीरियंस के बारे में आस्था बताती हैं कि ऐसा नहीं है कि हमारे बीच में कभी दिक्कतें नहीं आईं. लड़ाई हुई हैं, कई बातें बुरी भी लगीं, लेकिन एक चीज हमने हमेशा याद रखी-कम्युनिकेशन. हम कितने भी नाराज क्यों नहीं होते, हर मुद्दे पर बात जरूर करते हैं. एक दूसरे के सामने खुलकर अपने विचार रखते हैं. इससे हम दोनों को पता रहता है कि किसके मन में क्या चल रहा है. आस्था ने एक और बात का जिक्र करते हुए कहा है कि सफल रिलेशनशिप में कभी भी पास्ट और फ्यूचर के बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. पुरानी बातों को लेकर नहीं बैठना चाहिए. पहले कोई कैसा था, अब कैसा हो गया है, इस बहस में नहीं पढ़ना चाहिए. समय के साथ बदलना दस्तूर है, एडजस्ट करना कला होती है.

अब आस्था तो एक सफल रिलेशनशिप में चल रही हैं, हमने एक और शख्स से बात की जिन्होंने सफलतापूर्वक ब्रेक अप के बाद अपनी लाइफ को आगे बढ़ाया. मयंक बताते हैं कि कोई भी ब्रेक अप लाइफ का अंत नहीं हो सकता है. आपको अपनी Self Worth पता होनी चाहिए. आपको अपने अंदर ये विश्वास होना चाहिए कि भविष्य ने आपके के लिए कुछ अच्छा सोच रखा है. मयंक एक और बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि कभी भी रिलेशनशिप में किसी तरह के झूठ की जगह नहीं होनी चाहिए, इसमें झूठी उम्मीदें भी शामिल हैं. हर किसी का अपना बजट होता है, अपनी एक लिमिट होती है, उसे वैसे ही कमिटमेंट करने चाहिए. अगर दोनों तरफ से ये क्लियर रहता है तो उम्मीदें कभी नहीं टूटतीं और रिलेशन टॉक्सिक नहीं बनता.

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