सिक्किम में कुदरती कहर अब तक 14 लोगों की जान ले चुका, जबकि सेना के 22 जवान लापता हैं. ये आपदा मंगन जिले की साउथ लोनाक झील की वजह से आई. दरअसल हुआ ये कि वहां बादल फटने से पानी साउथ लोनाक झील में जा गिरा. ग्लेशियल झील इससे ओवरफ्लो हो गई और पानी का सैलाब तेजी से तीस्ता नदी की तरफ बढ़ गया. नदी के पास ही आर्मी बेस बना हुआ है. पानी बढ़ने का सीधा असर इस बेस पर हुआ, और नतीजा सामने है. वैसे लोनाक झील को लेकर पहले से ही वॉर्निंग दी जाती रही है.
लगातार मिलती रही वॉर्निंग
कुछ ही साल पहले इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) ने सैटेलाइट डेटा के जरिए पूरे सिक्किम में 320 ग्लेशियल झीलें खोज निकालीं. इनमें से 14 झीलें बेहद खतरनाक मानी गईं. साउथ लोनाक इनमें से एक है. इससे पहले भी कई ग्लेशियल लेक्स की वजह से तबाही मच चुकी है. वैसे पहली बार अमेरिकी वायु सेना और सीआईए ने मिलकर इस झील के सुपर ग्लेशियल होने की बात की थी.
क्या है ग्लेशियल आउटबर्स्ट?
साइंटिस्ट्स इसे GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड कहते हैं. इसमें ग्लेशियर मतलब बर्फ के पिघलने की वजह से झील का पानी खतरनाक ढंग से बढ़ता है और आसपास को पानी-पानी कर देता है. ये इतना एकाएक होता है कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिलता. साल 2021 में उत्तराखंड के चमोली में जो तबाही मची थी, उसके पीछे भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट का हाथ माना जाता है.
किसे कहते हैं ग्लेशियल लेक?
ये वो झीलें हैं, जो ग्लेशियर यानी पहाड़ों पर बर्फीली नदियों की वजह से बनती हैं. अपने फ्रीजिंग तापमान की वजह से ये पानी के बाकी स्त्रोतों से कई गुना ज्यादा खतरनाक होती हैं, लेकिन यही अकेला रिस्क नहीं. होता ये है कि जब ग्लेशियल झील तापमान या एक्स्ट्रा पानी के संपर्क में आती है, तो उसका बर्फीला पानी तेजी से पिघलता है.
इसका असर उससे जुड़ी नदी पर होता है और पानी का स्तर तुरंत बढ़ जाता है. यही मामला सिक्किम की लोनाक झील के साथ हुआ. बादल फटने से झील का स्तर बढ़ा, जिसका असर तीस्ता नदी के वॉटर लेवल में हुआ, और आर्मी बेस तबाह हो गया.
क्यों खतरनाक है साउथ लोनाक लेक?
इसे राज्य की सबसे तेजी से फैलती झील माना जा रहा है. पहले यह ग्लेशियल झील तो थी, लेकिन जलस्तर उतना ज्यादा नहीं था. बीते लगभग 5 दशकों में इसकी गहराई तेजी से बढ़ी है. फिलहाल इसकी गहराई लगभग 10 मंजिला इमारत जितनी है. यानी बढ़िया से बढ़िया तैराक भी इसमें शायद ही बच सके. साथ ही लंबाई लगभग ढाई किलोमीटर और चौड़ाई करीब 6 सौ मीटर है. एक्सपर्ट्स इसी बात को लेकर परेशान थे कि अगर कभी बादल फटे, या बारिश ज्यादा हुआ तो आपदा को संभाला नहीं जा सकेगा. यही हुआ.
कौन सी बातें बनती हैं समस्या?
समुद्र तट से करीब 5 हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित लोनाक झील को लेकर स्टडी में यह भी बताया गया कि मौसम से जुड़ा कोई भी एक्सट्रीम इसे ओवरफ्लो कर सकता है, जैसे बादलों का फटना, या फिर तैापमान के कारण झील के भीतर ठोस बर्फ का पिघलना. कई बार बर्फीले टुकड़ों का आपस में टकराव भी बर्फ पिघलने का कारण बन जाता है. लोनाक ग्लेशियल को लेकर चेतावनी भारत ही नहीं, दुनियाभर के एक्सपर्ट जारी करते आए हैं.
साल 1977 में इसका क्षेत्रफल 17.54 हेक्टेयर था, लेकिन इसके बाद 2008 में जब आकलन हुआ तो ये एरिया कई गुना तक बढ़ चुका था. चूंकि ये झील सिक्किम जैसे संवेदनशील राज्य में है, ऐसे में जाहिर है कि कुदरती आपदा का आना खतरे और बढ़ा सकता है.
अभी कैसे हैं सिक्किम में हालात
मंगलवार रात आई आपदा के बाद से 22 जवानों समेत करीब 102 लोग लापता हैं. संदेह जताया जा रहा है कि लापता लोगों की मौत हो चुकी, हालांकि अब तक इसपर आधिकारिक तौर पर बयान नहीं आया है. लेक से जुड़ी तीस्ता नदी में बाढ़ आने से आसपास से 4 हजार लोगों को रिलीफ कैंपों में शिफ्ट करना पड़ा. इसमें हजारों टूरिस्ट भी हैं. नेशनल हाईवे NH-10 भी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका, जिसकी वजह से आवाजाही बंद हो गई है. बाढ़ का असर पश्चिम बंगाल के कलिम्पोंग तक जा पहुंचा है.