scorecardresearch
 

क्या तालिबान को मान्यता देने से रुक जाएंगे रूस पर अटैक, पुतिन क्यों उसे 'आतंकी गुट' की लिस्ट से हटाने जा रहे?

साल 1999 में रूस ने तालिबान को आतंकी संगठनों की लिस्ट में डाल दिया था. अब जल्द ही मॉस्को उसे इस क्लीन करार दे सकता है. ये तब है जबकि मार्च में रूस पर चरमपंथी हमला हुआ, जिसके लिंक तालिबान से माने गए. फिर विरोधियों पर अक्सर आक्रामक रहता ये देश क्यों उसे माफ करने के मूड में दिख रहा है?

Advertisement
X
रूस तालिबान से रिश्ते सुधारता दिख रहा है. (Photo- AP)
रूस तालिबान से रिश्ते सुधारता दिख रहा है. (Photo- AP)

अप्रैल की शुरुआत में रूस के राष्ट्रपति भवन ने एलान किया कि वे अफगानिस्तान के तालिबानी नेताओं के साथ चर्चा कर रहे हैं. सबकुछ सही रहा तो जल्द ही तालिबान टैररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन की रशियन लिस्ट से हट जाएगा. क्रेमलिन के स्पोक्समैन दिमित्री पेस्कोव ने प्रेस के सामने ये बात कही. उनका कहना है कि ये हमारे करीब बसा देश है, जिससे हम किसी न किसी तरह से बात करते ही रहते हैं. अगर हमें मुद्दों को खत्म करना है तो बातचीत करनी होगी.

Advertisement

पेस्कोव ने तालिबान को आतंकी लिस्ट से हटाने की बात करते हुए 'प्रेसिंग इश्यूज' को सुलझाने की बात भी की. वे किन मुद्दों की बात कर रहे थे, सीधे न कहने पर भी ये समझा जा सकता है.

मॉस्को पर हमले के तार तालिबान से जुड़े

इसी 22 मार्च को मॉस्को के क्रोकस सिटी हॉल कॉन्सर्ट हॉल में हुए हमले में 130 से ज्यादा मौतें हुई थीं, जबकि सैकड़ों घायल हो गए थे. आतंकी गुट इस्लामिक स्टेट खुरासान ने इसकी जिम्मेदारी ली थी. ये अफगानिस्तान का टैरर गुट है, जिसकी सोच ISIS वाली है. इसका हेड क्वार्टर से लेकर मुखिया तक तालिबान से जुड़े हुए हैं. 

क्यों दिखाता रहा रूस से दुश्मनी

ये गुट पक्का रूस विरोधी है. इसके पीछे इस्लामिक स्टेट के लीडर अबू बक्र अल बगदादी का बड़ा हाथ रहा. उसने एलान किया था कि इस्लामिक स्टेट का रूस और अमेरिका से धर्मयुद्ध होगा, जिसमें इस्लामिक स्टेट को ही जीतना होगा. दरअसल आतंकियों को इस बात पर गुस्सा है कि सीरिया से इस्लामिक स्टेट को खत्म करने में रूस ने अमेरिका का साथ दिया. इसके अलावा ये गुट ऐसे आरोप भी लगाता है कि रूस में चेचन्या के मुस्लिमों के साथ नाइंसाफी हो रही है. 

Advertisement

taliban afghanistan can be removed from the list of terrorist organizations by russia photo Getty Images

रूस और तालिबान में खास अच्छे रिश्ते नहीं

- साल 1999 में यूनाइटेड नेशन्स ने माना कि तालिबान इंटरनेशनल आतंकियों को पनाह और प्रशिक्षण देता है.

- रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूएन के साथ वो डिक्री साइन कर दी, जिसके तहत तालिबान पर तमाम तरह की पाबंदियां लग गईं.

- साल 2003 में रूस की सुप्रीम कोर्ट ने तालिबान को न केवल आतंकवादी माना, बल्कि ये भी कहा कि तालिबानी टैररिस्ट उसके हिस्से आने वाले राज्यों के विद्रोहियों को उकसा रहे हैं.

मान सकते हैं कि दोनों के बीच सांप-नेवले जैसा रिश्ता दिखता था. लेकिन ये परदे के इस पार की बात है. परदे के पीछे एक और बात होने लगी. साल 2017 से मॉस्को ने काबुल की तत्कालीन सरकार और तालिबान के बीच सुलह-समझौता कराने की कोशिश शुरू कर दी. 

अब इसका अगला पड़ाव है

रूस संकेत दे रहा है कि वो तालिबान को आतंकवादी गुट की लिस्ट से हटा देगा. इसका दूसरा मतलब है कि वो इसे अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार के तौर पर मान्यता दे देगा. ये काफी बड़ी बात है. अगस्त 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन शुरू किया. इसके बाद से किसी भी देश ने उसे सीधी मान्यता नहीं दी, बल्कि डी-फैक्टो रिकॉगनिशन दिया. इसका मतलब जो फैक्ट पर आधारित है और स्थाई नहीं है. चीन अकेला देश है, जिसने तालिबान को मान्यता दी. 

Advertisement

taliban afghanistan can be removed from the list of terrorist organizations by russia photo AFP

क्यों नहीं मिल रही मान्यता

तालिबान इस्लामिक चरमपंथी गुट है. नब्बे के दशक में सुन्नी इस्लामिक शिक्षा के नाम पर ये आगे बढ़ा और जल्द ही अपना असली चेहरा दिखाने लगा. जबरन सत्ता में आने पर उसने इस्लामिक कानून शरिया लागू कर दिया. उसने महिलाओं के चलने-घूमने और कपड़े पहनने और पढ़ने तक पर पाबंदी लगा दी. नियम न मानने पर कड़ी सजा, यहां तक कि कोड़े या पत्थर मारकर जान लेने जैसी सजाएं तक हैं. इन बातों को देखते हुए सारे देशों ने तालिबान को नेचुरल रूलर के तौर पर मान्यता देने से मना कर दिया. आतंकी गुट तो वो पहले से था ही. 

क्या होता है रिकॉग्निशन से

मान्यता या आधिकारिक दर्जा देना वो कंडीशन है, जिसमें दो देश एक-दूसरे को स्वीकार करते हैं. इसके बाद वे आर्थिक और राजनैतिक रिश्ते रख सकते हैं. दोनों के दूतावास होते हैं और वहां तैनात लोगों को डिप्लोमेटिक इम्युनिटी भी मिलती है. इसके बाद ही इंटरनेशनल लोन मिल पाता है.

चीन के बाद अब रूस की मान्यता काफी मायने रखेगी. आज भी कई देश रूस को अमेरिका जितना ताकतवर मानते हैं. ऐसे में रूसी हां के बाद वे भी देर-सवेर उसे मंजूरी दे ही देंगे. इससे तालिबान के इंटरनेशनल कम्युनिटी का हिस्सा बनने के रास्ते खुल जाएंगे. फिलहाल विदेशों में स्थित उसके एसेट्स भी सीज किए हुए हैं. 

Advertisement

taliban afghanistan can be removed from the list of terrorist organizations by russia photo AP

रूस क्यों कर रहा मदद

तालिबान के लिए इंटरनेशनल मान्यता बड़ी चीज है, लेकिन रूस को भी कम फायदा नहीं. इससे वो अमेरिका को जतला पाएगा कि जहां दशकों अफगानिस्तान में रहने के बाद भी उसकी सेना नाकामयाब हुई, वहीं वो थोड़ी कोशिश से तालिबान को पटरी पर ला सकता है. तालिबान को आतंकी लिस्ट से हटाने और मंजूरी देने से मॉस्को की सेंट्रल एशिया में आवाजाही आसान हो जाएगी. व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे.

तालिबान से रिश्ते बनते ही उसकी छत्रछाया में पल रहे आतंकी गुटों जैसे ISIS-K का गुस्सा भी ठंडा पड़ जाएगा. असल में यूक्रेन से युद्ध में उलझा रूस फिलहाल अपने भीतर स्थिरता चाहता है. ऐसे में आतंकी गुटों से उलझने की बजाए वो ऐसा रास्ता चुनता दिख रहा है, जिससे मसला ही हल हो जाए. वो खासकर चेचन्या में पलती बगावत को शांत करने के मूड में हैं. ये वो हिस्सा है, जहां मुस्लिम आबादी काफी है. ऐसे में तालिबानी सपोर्ट उसके काम आएगा. 

साल 2022 में पुतिन ने कहा था कि अगर अमेरिका और EU देश के अपने रास्ते, अपना सामाजिक-राजनैतिक सिस्टम है, तो एशियाई देशों, इस्लामिक स्टेट्स और गल्फ के पास भी अपने अधिकार हैं. ये एक तरह से तालिबान समेत इस्लामिक सोच वाले सारे देशों को खुद से जोड़ने की कोशिश हो सकती है.

Live TV

Advertisement
Advertisement