लगभग चार साल पहले अफगानिस्तानी सरकार को गिराते हुए तालिबान ने देश पर कब्जा कर लिया. तब से वो कोशिश कर रहा है कि इंटरनेशनल स्तर पर उसे सरकार की तरह मंजूरी मिल जाए, हालांकि ये तो हुआ नहीं, बल्कि अपने ही देश में उसकी जमीन कमजोर पड़ रही है. दो दिन पहले राजधानी काबुल में हुए ब्लास्ट में तालिबान सरकार के मंत्री खलील हक्कानी की मौत हो गई. इसकी जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान ने ली है. क्या है ये, और क्यों तालिबान से दुश्मनी पाले हुए है?
क्या है ISIS खुरासान?
यह इस्लामिक स्टेट का ही हिस्सा है, जिसे अफगानिस्तान-पाकिस्तान के आतंकवादी चलाते हैं. इसका मुख्यालय अफगानिस्तान के नांगरहार राज्य में है. असल में सीरिया और इराक में तो इस्लामिक स्टेट का गढ़ था ही, लेकिन ये तमाम मुस्लिम बहुल देशों में भी फैल रहा था. साल 2015 में यह अफगानिस्तान आया, जिसे नाम मिला आईएसकेपी.
यह आईएसआईएस की ही एक शाखा ही है, जिसे अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों में कट्टरपंथी इस्लामिक शासन लाने के लिए बनाया गया था. खुरासान शब्द केवल जगह के लिए इस्तेमाल नहीं हुआ, बल्कि इसका ऐतिहासिक मतलब भी है. इस जगह को इस्लाम के प्रति वफादार लोगों के गढ़ की तरह बताया गया. कट्टरपंथी संगठन इसी बात के साथ युवाओं को अपनी तरफ खींचने लगा.
क्यों है यहां पर एक्टिव
- अफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थिति छिपने-छिपाने के लिए बिल्कुल सही है. यहां पहाड़ों, खंदकों में छिपना और सीमाएं पार करना आसान है.
- इस देश का कमजोर प्रशासन और लगातार होती आ रही उठापटक भी इस्लामिक स्टेट को बढ़ने के लिए मुफीद माहौल देती रही.
- ISIS-K अफगानिस्तान में उन कट्टरपंथियों को अपनी तरफ मोड़ रही है, जो तालिबान से उकताए हुए हैं.
तालिबान के साथ दुश्मनी की वजह
इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान और तालिबान दोनों ही चरमपंथी सोच वाले हैं लेकिन उनमें कट्टर दुश्मनी रही. इसकी वजह ये है कि तालिबान आईएस के मुकाबले जरा हल्का पड़ जाता है. जैसे उसने केवल अफगानिस्तान के भीतर इस्लामिक कानून लाना चाहा, जबकि आईएसआई सीधे पूरी दुनिया में यही चाहता है. इस्लामिक स्टेट तालिबान को धार्मिक तौर पर कमजोर भी मानता है क्योंकि उसने खुद को सरकार की तरह स्थापित करने के लिए पश्चिमी देशों की मंजूरी चाही. दोनों संगठन अफगानिस्तान में अपना सिक्का जमाने के लिए लड़ते रहे हैं.
ISIS-K अक्सर तालिबान के खिलाफ आतंकवादी हमलों को अंजाम देता है, मिसाल के तौर पर साल 2021 में काबुल एयरपोर्ट पर हुए अटैक को इसी ने अंजाम दिया था. अब तालिबानी मंत्री पर हमले की जिम्मेदारी भी इसी संगठन ने ली. तालिबान से भी ज्यादा हिंसक और कट्टर ये समूह स्कूलों, अस्पतालों से लेकर धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाता रहा. इसके अलावा बड़े इंटरनेशनल इवेंट्स को लेकर भी इसके धमकियां दी थीं ताकि ग्लोबल तौर पर धाक जम सके. जैसे पेरिस ओलंपिक्स से पहले इसने अटैक की बात की थी, जिसके चलते काफी सुरक्षा तैनात रही.
क्या ISIS-K तालिबान से मजबूत हो सकता है
फिलहाल इसकी संभावना कम है. तालिबान के पास इस देश का ज्यादा तजुर्बा है. नब्बे के दौर में भी उसने यहां हुकूमत चलाई थी. उसके पास ज्यादा समर्थक और ज्यादा रिसोर्सेज हैं. खास बात ये है कि गांवों में तालिबान को मानने वाले खूब हैं. तालिबान ने सरकार बनाने के बाद अफगानिस्तान के संस्थानों और ढांचों पर कंट्रोल भी काफी हद तक पा लिया.
अब केवल एक चीज बाकी है, जो उसे बाकी देशों की सरकारों की कतार में खड़ा कर सकती है, वो है इंटरनेशनल सपोर्ट. ज्यादातर देश तालिबान को आतंकी गुट मानते हैं. जब तक उसे अपनाया नहीं जाएगा, वैश्विक मदद भी उस ढंग से नहीं मिल सकेगी. इसका असर देश की जनता पर हो सकता है. इसी का फायदा इस्लामिक स्टेट को मिलेगा. वरना फिलहाल इस गुट के पास न तो ज्यादा लड़ाके हैं, न ही ज्यादा संसाधन. उसकी ताकत उसके प्रोपेगेंडा, बाहरी फंडिंग और हिंसक हमलों पर टिकी हुई है.
क्यों नहीं मिल सकी तालिबान को डिप्लोमेटिक मान्यता
तालिबान असल में इस्लामिक चरमपंथी गुट है. यह सुन्नी इस्लामिक शिक्षा के नाम पर आगे बढ़ा और जल्द ही अपना असली चेहरा दिखाने लगा. सत्ता में आने पर उसने इस्लामिक कानून शरिया लागू कर दिया. उसने महिलाओं के चलने-घूमने और कपड़े पहनने तक पर पाबंदी लगा दी. यहां तक कि उसने ज्यादातर इलाकों में टीन-एज लड़कियों के पढ़ने पर भी मनाही कर दी. इसी बात पर देशों को एतराज है.