पड़ोसी देश पाकिस्तान में अंदरुनी कलह थमने का नाम नहीं ले रही. हाल में बलूचिस्तान में स्थानीय मिलिटेंट्स ने बड़े हमले को अंजाम देते हुए पुलिस स्टेशन, रेलवे लाइन और हाईवे को निशाना बनाया, जिसमें 70 से ज्यादा मौतें हो गईं. लड़ाकों ने पहचान पूछकर पंजाबी मुसाफिरों की भी हत्या कर दी. बलूच आर्मी पहले भी टारगेट किलिंग करती आई है.
सोमवार सुबह कुछ हथियारबंद लड़ाकों ने बलूचिस्तान के मुसाखेल जिले से गुजर रहे ट्रकों और बसों को रोककर उनसे यात्रियों को उतारा. उनके पहचान पत्र देखे और फिर चुन-चुनकर टारगेट किलिंग की. इस हमले में सेना, पुलिस के अलावा 23 आम नागरिक मारे गए, जो पंजाबी थे. बाद में बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इसकी जिम्मेदारी ली.
बलूचिस्तान में यह पहली घटना नहीं
- इसी साल अप्रैल में, बलूचिस्तान के नोशकी शहर के पास आतंकवादियों ने पंजाबी यात्रियों के पहचान पत्र की जांच करने के बाद गोली मारकर हत्या कर दी थी.
- पिछले अक्टूबर में केच जिले में छह पंजाबी मजदूरों को मार दिया गया, जिसे खुद स्थानीय अधिकारियों ने टारगेट किलिंग माना था.
- साल 2015 में कुछ बंदूकधारियों ने तुर्बत के पास मजदूरों के एक कैंप पर अटैक कर 20 लोगों को मार दिया, जो सभी पंजाब और सिंध से थे.
बलूचिस्तान में बलूच आतंकवादी पंजाबियों को क्यों निशाना बनाते हैं? इसका जवाब पाकिस्तान के इतिहास में है. लेकिन इससे पहले जानते हैं कि बलूच कौन हैं और क्यों भड़के रहते हैं.
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा सूबा है, जहां बलूच मेजोरिटी है. ये वे लोग हैं, जिनकी अपनी अलग बोली और कल्चर है. लंबे समय से बलूच पाकिस्तान से अलग अपने देश की मांग करते रहे. यानी कहा जाए तो ये एक तरह का अलगाववादी आंदोलन है, जो पाकिस्तान में फलते-फूलते कई चरमपंथी आंदोलनों में से एक है. अफगानिस्तान से सटे हुए इस प्रांत के लोगों का कहना है कि पाकिस्तान ने हमेशा उससे भेदभाव किया.
क्यों चाहते हैं आजादी
- बलूचिस्तान के पास पूरे देश का 40% से ज्यादा गैस प्रोडक्शन होता है. ये सूबा कॉपर, गोल्ड से भी समृद्ध है. पाकिस्तान इसका फायदा तो लेता है, लेकिन बलूचिस्तान की इकनॉमी खराब ही रही.
- बलूच लोगों की भाषा और कल्चर बाकी पाकिस्तान से अलग है. वे बलूची भाषा बोलते हैं, जबकि पाकिस्तान में उर्दू और उर्दू मिली पंजाबी चलती है. बलूचियों को डर है कि पाकिस्तान उनकी भाषा भी खत्म कर देगा, जैसी कोशिश वो बांग्लादेश के साथ कर चुका.
- सबसे बड़ा प्रांत होने के बावजूद इस्लामाबाद की राजनीति और मिलिट्री में इनकी जगह नहीं के बराबर है.
- पाक सरकार पर बलूच ह्यूमन राइट्स को खत्म करने का आरोप लगाते रहे. बलूचिस्तान के सपोर्टर अक्सर गायब हो जाते हैं, या फिर एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग के शिकार बनते हैं. एक एनजीओ बलूच मिसिंग पर्सन्स के अनुसार, साल 2001 से 2017 के बीच पांच हजार से ज्यादा बलूच लापता हैं.
कौन से संगठन कर रहे अलगाव की मांग
बीएलए की आवाज सबसे ज्यादा सुनाई देती है. पहले वे शांति से अलगाव की मांग करते रहे. बीते कुछ दशकों से आंदोलन हिंसक हो चुका. पाकिस्तान सरकार ने बलूच इलाके में स्थिति खदानों को चीनियों को लीज पर दे रखा है. इसपर भड़के हुए बलूच मिलिटेंट बम धमाके भी करते रहते हैं. पाकिस्तान ने साल 2006 में ही बीएलए को आतंकी गुट कह दिया. इसके अलावा बलोच रिपब्लिकन आर्मी और लश्कर-ए-बलूचिस्तान जैसे कई गुट हैं, जो बलूचिस्तान की आजादी मांग रहे हैं.
आजादी को लेकर ही वे लगातार हिंसक हो रहे हैं. इस्लामाबाद स्थित एक एनजीओ पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज ने बीते साल 'पाकिस्तान सिक्योरिटी रिपोर्ट 2023' जारी की थी. ये दावा करती है कि बलूच विद्रोहियों, खासकर बीएलए और बीएलएफ ने पिछले साल प्रांत में 78 हमले किए, जिनमें 80 से ज्यादा मौतें हुईं और 137 लोग घायल हुए.
ताजा हमले की जिम्मेदारी बीएलए ने लेते हुए धमकी दी कि वो आगे और भी ऐसे अटैक कर सकता है.
पंजाबियों पर क्यों हो रहे हमले
इसका बड़ा कारण जातीय और सांस्कृतिक अलगाव है. बलूचिस्तान में बहुसंख्यक आबादी वाले बलूचों की भाषा से लेकर तौर-तरीके भी अलग हैं. वे सियासत में ज्यादा तवज्जो भी चाहते रहे. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. पाकिस्तान के बनने के बाद से ही वहां पंजाबियों का दबदबा रहा. मजहब के आधार पर बने देश में जातीय फर्क के चलते गुस्सा पनपने लगा. इसी वजह से पहले बांग्लादेश बना और अब बलूचिस्तान की मांग हो रही है.
पंजाबियों का वर्चस्व बना गुस्से की वजह
दूसरी वजह से बलूचों के साथ आर्थिक भेदभाव और नाइंसाफी. पाकिस्तान का सबसे बड़ा लेकिन सबसे कम आबादी वाले इस हिस्से में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं. इसके बाद भी यहां के लोग गरीब हैं. बलूच अलगाववादियों का कहना है कि पंजाबी-वर्चस्व वाला देश उनसे सारे फायदे तो ले रहा है, लेकिन उन्हें नुकसान दे रहा है. जैसे, चीन के सपोर्ट वाले ग्वादर बंदरगाह को ही लें तो उसके लिए पाकिस्तान को अरबों डॉलर मिले, लेकिन इससे बलूचिस्तान की लोकल इकनॉमी को बहुत कम फायदा मिल सका. पढ़े-लिखे बलूची युवाओं की बजाए इस काम के लिए पंजाबी और सिंधी इंजीनियरों को नौकरियां दी गईं.